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    सम्भल। हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक शेर जंग मियां का मजार।

    उवैस दानिश\सम्भल। सांप्रदायिक तनाव को लेकर संवेदनशील जिलों की श्रेणी में सम्भल आता है। शहर की बात-बात पर सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने की साजिश भी की जाती है। लेकिन, तनाव भरे इस माहौल में शेर जंग रहमतुल्लाह आलैह साहब का मजार सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश कर रहा है। शेर जंग मियां मजार पर प्रत्येक दिन हिंदू-मुस्लिम समुदाय के दर्जनों लोग एक साथ मत्था टेकते हैं और मन्नते मांगते हैं। मियां साहब किसी को अपने दर से निराश होकर लौटने नहीं देते हैं। इस दर पर आते ही मजहब का भेद-भाव मिट जाता है।

    आज हम आपको हजरत शेरजंग वली रहमतुल्लाह आलैह साहब के बारे में बताने जा रहे हैं। इनका मजार सम्भल मुरादाबाद रोड पर सम्भल से चार किलोमीटर दूर शहजादी सराय में स्थित है। जो करीब 900 साल पहले हजरत सय्यद सालार मसूद गाजी रहमतुल्लाह आलैह के साथ सम्भल तशरीफ़ लाए थे। कहते हैं कि हजरत शेर जंग वली मियां के मजार पर शेर हाजिरी देने आया करता था वही शेर हज़रत शेर जंग मियां की सवारी भी था और वो अपनी पूछ से यहां की झाड़ू लगाया करता था। यह मजार हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक है। 

    यहां आज भी सैकड़ों हिंदू मुस्लिम दूरदराज से अपनी अपनी मुरादे लेकर आते हैं और उनकी मुरादें पूरी भी होती हैं। यहां सही तरीके से न बोलने वाले बच्चो के लिए भी मुरादे मांगी जाती है मुराद पूरी होने पर यहां चांदी की जीभ चढ़ाई जाती है। होली पर्व के बाद यहां एक दिवसीय मेले का भी आयोजन किया जाता है।

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