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    सम्भल। स्वतंत्रता सैनानी इस्हाक़ सम्भली दो बार गए जेल, 11 वर्ष की उम्र में सम्भल थाने के सामने की अंग्रेजों के विरुद्ध तकरीर।

    ......डिप्टी स्पीकर के पद तक पहुंचकर किया सम्भल का नाम रोशन। 

    उवैस दानिश\सम्भल। आज हम आपको सम्भल की एक ऐसी शख्सियत से रूबरू कराने जा रहे हैं जिनका देश की आजादी में योगदान रहा साथ ही राजनीति में भी लोकसभा डिप्टी स्पीकर के पद तक पहुंचे और लगभग 56 देशों का दौरा कर राजनीति को बारीकी से परखा।

    आज हम बात कर रहे हैं एक मुस्लिम दीनी घराने से ताल्लुक रखने वाले मौहम्मद अहमद हसन के पुत्र मौलाना इस्हाक़ सम्भली की। इनके पिता दारुल उलूम देवबंद में हदीस के अध्यापक थे। 6 अक्टूबर 1921 को जिला मुजफ्फरनगर में जन्मे मौलाना इस्हाक़ सम्भली को एक और मुस्लिम विद्वान मौहम्मद अशरफ अली थानवी की दूसरी पत्नी ने गोद ले लिया था, क्योंकि मौहम्मद अशरफ अली थानवी के कोई संतान नहीं थी। उन्होंने दारुल उलूम देवबंद से शिक्षा हासिल कर लखनऊ विश्वविद्यालय से सन 1948 में अरबी में एमए किया। इनकी तीन बेटियां सलमा बी उर्फ बबली, आमना बी, आयशा बी और दो बेटे मौहम्मद सुलेमान सम्भली व मौहम्मद इमरान सम्भली आज भी उनकी विरासत को सम्भल में संभाले हुए है।

    मौलाना इस्हाक़ सम्भली आजादी के दीवाने थे वह बचपन से ही अंग्रेजों के विरुद्ध चल रहे आंदोलन में भाग लेते रहे। सन 1930 में 11 वर्ष की उम्र में सम्भल थाने के सामने मौलाना इस्हाक़ सम्भली ने अंग्रेजों के विरुद्ध तकरीर की। उच्च स्तरीय नेताओ ने इनकी तकरीरों से प्रभावित होकर सन 1936 में मौलाना इस्हाक़ सम्भली को सबसे कम उम्र में प्रदेश कांग्रेस का सदस्य बनाया। 6 मार्च 1941 को गोंडा में अंग्रेजो के खिलाफ तकरीर करने पर उन्हें गिरफ्तार किया गया ओर तीन दिन तक कोतवाली गोंडा रखा गया। 22 दिसंबर 1942 को रायबरेली में भारत छोड़ो आंदोलन में गिरफ्तार कर लिया गया। 3 फरवरी 1943 को आप को रिहा कर दिया गया। मौलाना इस्हाक़ सम्भली की तकरीरों के कारण उन्हें क्रांतिकारी मौहम्मद कहा जाने लगा। आखिर वह दिन भी आया जिसके लिए बेशुमार इंसान शहीद हो चुके थे। 15 अगस्त 1947 को आधी रात के समय मौहम्मद इस्हाक़ सम्भली ने सम्भल में यादगार भाषण दिया जिसकी चर्चा महीनों तक आवाम की जबान पर रही। स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद मौहम्मद इस्हाक़ सम्भली ने पेंशन तथा किसी भी प्रकार का ताम्र पत्र लेने से इनकार कर दिया। इन पैसों को लोगो की खिदमत में लगाने को कहा। 11 जून 1950 को कांग्रेस में पहले बगावत हुई। पटना के एक अजीमुलशान ऑल इंडिया कन्वेंशन में एक तंजीम का कयाम हुआ। मौलाना मौहम्मद इस्हाक़ सम्भली इसके प्रांतीय सचिव नियुक्त किए गए फिर सोशलिस्ट पार्टी इसमें शामिल हो गई। वे सच्चे धर्मनिरपेक्ष मुजाहिद थे। उन्हें इन पार्टियों में इत्मीनान नहीं मिला। 28 जुलाई 1952 को कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गये। मौलाना मौहम्मद इस्हाक़ सम्भली 1957 से 1963 तक विधान परिषद के सदस्य रहे तथा 1962 में उन्होंने भाकपा के टिकट पर पीलीभीत से चुनाव लड़ा जो चुनाव वो हर गये। 1967 से 1977 तक अमरोहा निर्वाचन क्षेत्र से सांसद रहे। तीन वर्ष तक लोकसभा के पैनल ऑफ चेयरमैन रहे। मौहम्मद इस्हाक़ सम्भली अपनी सियासी सरगर्मियां के बावजूद दीनी और तालिमी सैकड़ों संस्थाओं से हमेशा जुड़े रहे। 7 जनवरी 2000 को सुबह 4 बजे दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में उनका निधन हुआ।

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