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    कैसे बचेगी संगीत की विरासत?

    राकेश अचल का लेख। मुद्दा सियासत का नहीं है इसलिए जाहिर है कि भक्ति काल से गुजर रही दुनिया को आज का आलेख जंचने वाला नहीं है।आज का मुद्दा है कि देश में भारतीय शास्त्रीय संगीत की विरासत आखिर कैसे बचेगी,जबकि संगीत घरानों के लोग अपनी उस जमीन से कट जाएंगे जहां उनके घराने की गर्भनाल है।

    पिछले दिनों ग्वालियर में होने वाले तानसेन समारोह में जिम्बाब्वे के नर्तक बैंड वादकों के दल को प्रस्तुति देने के बाद भी शास्त्रीय संगीत से छेड़छाड़ की बात आई थी।गत दिनों ग्वालियर के सेनिया किराना घराने के उस्ताद हाफिज अली खान की पचासवीं पुण्य तिथि पर उन्हें दिल्ली में बैठकर याद करने वाले उस्ताद अमजद अली खां साहब की भूमिका इस मुद्दे से जुड़ी नजर आती है।

    उस्ताद अमजद अली खां साहब उस्ताद हाफिज अली खां साहब के यशस्वी पुत्र हैं।वे दो दिन पहले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के जन्मदिन पर सरकार द्वारा आयोजित समारोह के लिए सहजता से उपलब्ध होते हैं किन्तु अपने पिता की पुण्यतिथि पर आने की उन्हें फुर्सत नहीं मिलती। जाहिर है कि पिता को संगीतांजलि अर्पित करने के पैसे नहीं मिलते। लेकिन यदि अमजद भाई ग्वालियर आकर अपने पिता की समाधि पर माथा टेकते तो सेनिया घराना हरिया उठता।

    आप कह सकते हैं कि क्या उस्ताद हाफिज अली खां साहब को याद करने का ठेका उनके बेटे या पौत्रों का है? तो जबाब है, बिल्कुल है। यदि वे न होते और अपने पुरखों का हवाला देकर गा-बजा न रहे होते तो बात और थी। ग्वालियर के संगीत प्रेमियों की नैतिकता तो पहले ही पतित हो चुकी है।

    जब मै ग्वालियर घराने की बात करता हूं तो मुझे स्वर्गीय पंडित कृष्ण राव शंकर पंडित जी का घराना भी याद आता है।इस घराने का प्रतिनिधित्व करने वाले पंडित जी के सुपुत्र पंडित लक्ष्मण राव पंडित भी उस्ताद अमजद अली खां की तरह दिल्ली जा बसे।उनकी बेटी मीता पंडित भी अब ग्वालियर की याद नहीं करतीं,वो तो पंडित जी के एक बेटे ने उनके नाम का एक महाविद्यालय बना दिया था जो मीता पंडित को बांधे हुए है।

    संस्थान तो उस्ताद अमजद अली खां के पिता के नाम पर भी है जो सरकारी इमदाद से बना है, यहां नाम बनाए रखने के लिए कुछ बच्चे भी सरोद सीखने आते हैं किन्तु उस्ताद के परिजनों के पास फुर्सत नहीं यहां आने की। तानसेन समारोह में भी ये दोनों घराने बिना मेहनताना लिए आने को तैयार नहीं होते। नतीजा ये हो रहा है कि ग्वालियर घराने का नाम तो डूब ही रहा है, साथ ही अब तानसेन समारोह में पंजाबी और अफ्रीकी पॉप नाच -गाना भी होने लगा है।

    संगीत के साथ वही बीमारी है जो सियासत के साथ बाबस्ता है। वंशवाद की बीमारी। ग्वालियर घराने का कोई दिग्गज बीते चार दशक में अपने बच्चों की टक्कर का एक विद्यार्थी तैयार नहीं कर सका, हालांकि चाहता तो कर सकता था। पंडित घराने के अलावा अब बाला साहेब पूंछवाले और उमड़ेकर के घराने में अंतरराष्ट्रीय स्तर की तो छोड़िए राष्ट्रीय स्तर का कोई नाम नहीं है।इन घरानों के ध्वजवाहक नौकरी के बाहर नहीं निकल सके। किसी का कोई माई -बाप जो नहीं है।

    संगीत घराने भी हिन्दू -मुसलमान हो गये हैं। ग्वालियर के उस्ताद अमजद अली खां फिल्मी संगीत सम्राट एआर रहमान की मां करीमा बेगम की स्मृति में बजाने चेन्नई जा सकते हैं किन्तु तानसेन के लिए ग्वालियर नहीं आ सकते, मजबूरी है।

    ग्वालियर घराना सोलहवीं सदी में सम्राट अकबर के समय 1542 में वजूद में आया था। तानसेन से शुरू होकर इस घराने ने मीता पंडित और अमान अली बंगस तक का सफर तय कर लिया है । ग्वालियर घराने में वो कशिश थी कि पंडित भीमसेन जोशी जैसे पुरोधा छात्र जीवन में यहां घर से भाग कर आए और उन्होंने यहां निशुल्क संगीत के गुर सीखे।

    ग्वालियर घराने को 1852 तक खान परिवार ने गति दी।1890 में वासुदेव बुवा जोशी ने ग्वालियर घराने का झंडा बुलंद किया। ग्वालियर घराने ने देश के अनेक राज्यों का भ्रमण किया। लेकिन अपने ही गढ़ ग्वालियर में ही अपने वजूद के लिए संघर्षरत है। मुमकिन है कि ग्वालियर घराने के मौजूदा ध्वजवाहकों के पास अपने बचाव में अनेक दलीलें हों, लेकिन एक संगीत प्रेमी के नाते मैं अपने लिखे से पीछे हटने वाला नहीं हूं।

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