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    कानपुर। भीमा गोरे गाँव "शौर्य दिवस" पर बामसेफ, दलित पैथंर एवं भीम आर्मी का संयुक्त कार्यक्रम।

    इब्ने हसन ज़ैदी\कानपुर। 11 मार्च सन 1689 को पेशवाओं ने हमारे शम्भाज महाराज को खत्म कर उनके शरीर के अनगिनत टुकड़े कर तुलापुर नदी में फेंक दिया था और कहा था कि जो भी इनको हाथ लगायेगा उसका क़त्ल कर दिया जायेगा। काफी समय तक कोई भी आगे नहीं आया पर एक महार जाति के एक पहलवान ने हिम्मत दिखाई और आगे आया जिसका नाम गणपत पहलवान था , वह शम्भाजी महाराज के सारे शरीर के हिस्सों को इकठ्ठा करके अपने घर लाया और उसकी सिलाई करके मुखाअग्नि दी ।शम्भाजी  महाराज की समाधी आज भी उसी महारवाडे इलाके में स्थित है ये सूचना मिलते ही पेशवाओं ने गणपत महार पहलवान का सर कलम कर दिया और समुची महार जाति को दिन में गाँव से बाहर निकलने पर पाबन्दी लगा दी और कमर पे झाड़ू और गले में मटका डालने का फरमान लागू कर दिया था और पूरे पुणे शहर में यह खबर फैला दी कि गणपत महार पहलवान देवतुल्य हो गया है इसलिए वो भगवान की भेट चढ़ गया। शम्भाजी महाराज की मृत्यु के बाद महार जाति के लोगों पर खूब अत्याचार इन पेशवाओं (सनातनी ब्रह्मणों ) द्वारा किये जाने लगे थे। 

    महार जाति शुरू से ही मार्शल जाति (सेना में लड़ने वाली ) थी , पर पेशवाओं ने अब इन लोगों पर मार्शल लॉ (सेना में लड़ने पर रोक ) लगा दिया था।महार अब इनके जुल्म से तंग आ चुके थे और अपने स्वाभिमान और अधिकार के लिए आंदोलन करने की सोच रहे थे .....उस दौरान अंग्रेज भारत में आये ही थे पर वो पेशवाओं की बलशाली सेना पर विजय नहीं कर पा रहे थे , तभी महार जाति का एक नवयुवक सिद्धनाक पेशवाओं से मिलने गया और कहने लगा कि वैसे तो हमारी अंग्रेजों की ओर से लड़ने की कोई इच्छा नहीं है मगर तुम हमारे सारे अधिकार और सम्मान हमें दे देते हैं तो हम अंग्रेजों को यहाँ से भगा देंगें , इस पर पेशवाओ ने कहा की तुम्हें यहाँ सुई के बराबर भी जमीन नहीं मिलेगी। यह सुनते ही सिद्धनाक ने पेशवा को चेतावनी देते हुए कहा कि अब तुमने अपनी मृत्यु को स्वयं ही निमंत्रण दे दिया है , । तब सिद्धनाक 500 महार सैनिकों के साथ शम्भाजी महाराज की समाधी पर जाता है और महाराज की समाधी को नमन करते हुए शपथ लेता है कि हम शाम्भाजी महाराज के खून का बदला जरूर लेंगे और उसके बाद केवल 24 घंटे तक चले युद्ध में भूखे प्यासे रहकर महारों के 500 वीरों ने सर्द रात को भीमा नदी पारकर पेशवाओं के 28000 सैनिकों के टुकड़े - टुकडे करके उनको नेस्तानाबूत कर दिया था ।

    वो दिन था 01 जनवरी 1818 इसलिए ये दिन "शौर्य दिवस" नाम से जाना जाता है। जहाँ स्वयं बाबा साहेब डॉ.भीमराव आंबेडकर जी हर साल  1 जनवरी को उन महान वीर सपूतो को नमन करने  जाते थे। उसी इतिहास को बामसेफ ने पुन: जिंदा किया है।

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