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    वाराणसी। पिशाच मोचन कुंड पर किन्नरों ने किया मृत साथियों का पिंडदान, देशभर से काशी पहुचे किन्नर समाज के लोग।

    वाराणसी। काशी के पिशाचमोचन में पिंडदान की प्रथा बहुत पुरानी है लेकिन मंगवार को यहां का नजारा कुछ अलग रहा। क्योंकि पिशाच मोचन कुंड में किन्नर समाज ने अपने पूर्वजों का पिंडदान किया।महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के नेतृत्व में घाट के पास श्राद्ध कर्म हुआ। इसमें देश भर से आए किन्नर समाज के संत और साधुओं ने जोर-जोर से डमरू बजाकर पूजा की प्रकिया पूरी की। हवन कुंड में आहुतियां भी डाली गईं। उज्जैन के किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर भवानी मां ने कहा सनातन धर्म किसी के बाप का नहीं है। मुगल काल में किन्नर समाज को हिजड़ा समाज बना दिया गया था। लोगों ने कहा कि किन्नर को सनातन धर्म में जगह नहीं मिलनी चाहिए। ये लोग मुसलमान होते हैं। 2014 में हमें सुप्रीम कोर्ट से कामयाबी मिली। तब हमें वोट डालने का अधिकार मिला और हिंदुस्तानी होने का अधिकार मिला। इसके बाद हमने धार्मिक कामों में भी प्रवेश किया। जिस किन्नर ने मुस्लिम धर्म स्वीकार किया उन्हें कब्र में दफनाया जाता होगा। मगर हिंदुओं में जिस किन्नर की मौत होती है। उनका विधिवत श्राद्ध किया जाता है। हमने प्रण लिया है कि हर दूसरे साल बनारस में आकर पिंडदान करेंगे। 

    कई किन्नर प्राकृतिक मौत मर जाते हैं और उनको सिर्फ जलाकर आ जाते हैं। उनका कोई श्राद्धकर्म नहीं होता। इसलिए हम लोग हर दूसरे साल अज्ञात और ज्ञात किन्नर जिनकी मौत हो चुकी है उनका पिंडदान करते हैं। हम लोग साल 2016 से सामूहिक पिंडदान करते हैं। हर किन्नर मोक्ष की ओर बढ़े। हमारा धर्म है कि हर आत्मा को सद्गगति मिले। वो शांत रहे इसलिए पिंडदान करते हैं। किन्नर अखाड़े की प्रमुख व महामंडलेश्वर आचार्य पंडित लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने बताया कि 2015-16 से जब से धर्म की गद्दी पर बैठी हूं तब से धर्म का कार्य किन्नर समाज के लिए हो रहा है। हर दूसरे साल सामूहिक पिंडदान और त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है। 2020 में कोरोना में मरे लोगों की मुक्ति के लिए भी कर्मकांड किया गया था।

    उन्होंने बताया कि किन्नरों की जिंदगी बहुत दुखभरी होती है। जब परिवार के लोगों को पता चलता है कि ये किन्नर है तो उसे घर से निकाल दिया जाता है। इसके बाद इतनी परेशानी झेलनी पड़ती है कि घर का भी त्याग करना पड़ता है। समाज ने हम लोगों को ऐसा कर दिया है कि हम लोगों को अंतिम संस्कार तक करने में परेशानी आती है। निधन के बाद अगर किसी की अस्थि लेकर उसके घर जाते हैं तो परिजन अस्थि लेने से भी इंकार कर देते हैं। इसलिए किन्नरों के भटकती आत्माओं को मोक्ष देने के लिए यह आयोजन करते हैं। यह परंपरा कोई नई नहीं है। महाभारत काल में भी शिखंडी ने किन्नरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया था। तब से यह परंपरा चली आ रही है।

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