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    पद्मश्री है या मिसरी की डली

    राकेश अचल का लेख। भारत में वर्ष 2022 के पद्म पुरस्कार घोषित कर दिए गए हैं और इसी के साथ दो अमरीकी भारतीयों को पद्म भूषण पुरस्कार देने को लेकर चर्चा भी शुरू हो गई है। अमेरिका में रहने वाले  वे असंख्य प्रवासी भारतीय इस बात को लेकर खुश हैं कि उन्हें भी पद्म पुरस्कार मिल सकता है बाशर्ते कि वे भारतीय बाजार को अपने कब्जे में ले लें।

    पद्म पुरस्कारों के लिए बाकायदा आवेदन आमंत्रित किए जाते हैं लेकिन पुरस्कार उन्हें ही मिलता है जिसे सरकार चाहती है। सुंदर पिचाई और सत्य नारायण नाडेला को निश्चित ही आवेदन करने पर पद्म पुरस्कार नहीं मिला होगा। क्योंकि बेचारे के पास फुर्सत कहां है?

    सुंदर पिचाई की सबसे बड़ी उपलब्धि ये है कि उनकी गर्भनाल भारत में है, अन्यथा उन्होंने भारत के लिए क्या किया है ये सिर्फ भारत की जनता जानती है।एक दर्जन बाथरूम वाले 40 मिलियन अमरीकी डालर के घर में रहने वाले पिचाई पर भारत सरकार की कृपा क्यों है ये पता लगाने में लिंक्डइन से जुड़े असंख्य पिचाई जुटे हुए हैं।वे जानना चाहते हैं कि पिचाई हों या नाडेला उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान आखिर क्यों दिए जाते हैं।

    किसी विदेशी को भारतीय नागरिक सम्मान हालांकि पहली बार नहीं दिया जा रहा। इससे पहले भी प्रवासी भारतीयों के अलावा अन्य विदेशियों को भी पद्म पुरस्कार दिए जा चुके हैं। जिन्हें ये पुरस्कार दिए गए या भविष्य में दिए जाएंगे तो देश को पता होना चाहिए कि ये सब किन आधारों पर किया जा रहा है। इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं है कि नाडेला और पिचाई जैसे नौजवान प्रेरणा के स्रोत हैं, लेकिन वे उस जमीन से कितने जुड़े हैं जो उन्हें सम्मानित कर रही है। नागरिक सम्मान पात्रता के साथ ही राजनीतिक आधार पर भी दिए जाते रहे हैं। पुरस्कार देने से पहले संबंधित की पूंछ उठाकर देखी जाती है। कांग्रेस ने भी यही किया और भाजपा भी कांग्रेस से सीखकर यही सब कर रही है, बल्कि इस मामले में कांग्रेस से दो कदम आगे है।

    जिस समय पिचाई को पद्मभूषण देने का ऐलान किया गया है तब संयोग से मै पिचाई के देश अमरीका में ही हूं। यहां अधिकांश का मानना है कि पिचाई की तमाम उपलब्धियां उसकी निजी हैं। उसने अपनी उपलब्धियां भारत को समर्पित नहीं की। इन उपलब्धियों के लिए पिचाई ने भारत की नागरिकता तक छोड़ दी। लेकिन भारत और भारत की सरकार सुंदर पिचाई को नहीं छोड़ा।

    मै उन तमाम 128 सौभाग्यशाली लोगों को बधाई देता हूं जिन्हें पद्म पुरस्कार देने की घोषणा की गई है।मै पात्र, अपात्र की तो बात ही नहीं कर रहा, क्योंकि अब पुरस्कारों का कोई पैमाना है ही नहीं। मुमकिन है कि इस मुद्दे पर एक भी मित्र मुझसे सहमत न हों, लेकिन मैं अपने आप से सौ फीसदी सहमत हूं कि देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों को मिसरी की डली या भैरव जी की सिन्नी बनने से रोका जाए। देश में 1954 से ये पुरस्कार दिए जा रहे हैं।अब तक 3200 से ज्यादा लोग ये पुरस्कार हासिल कर चुके हैं। कुछ साहसी लोगों ने इसे ठुकराया भी है। कुछ ने विरोध स्वरूप लौटाया भी है।

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