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    बेनीगंज/हरदोई। कूड़े-कचरे के ढेर में अपना भविष्य तलाशते नौनिहाल।

    बेनीगंज/हरदोई। जिस देश में किसान मुंशी प्रेमचंद की कहानी पूस की रात के पात्र हल्कू बनने को मजबूर हो उसके नौनिहाल कचरे के ढेर में अपना भविष्य तलाश रहे हो वह देश कैसे विश्व गुरु बन पायेगा अपने आप में यक्ष प्रश्न है। तमाम नेता, तमाम तिजारती ऊंचे ऊंचे मंचो से उच्च स्वर में शिक्षा चिकित्सा विकास को लेकर घड़ियाली आंसू बहाते दिखाई देते है लेकिन सच्चाई कोसों दूर नज़र आ रही है। जहां तक शिक्षा की बात की जाय तो जिले में हजारों विद्यालय संचालित हो रहे हैं साथ ही जागरूकता के लिये सर्वशिक्षा अभियान के तहत रैली निकाली जाती है लेकिन व्यवस्था जस की तस ही बनी रहती है। ग्रामीण परिवेश में आज भी बच्चे स्कूल नहीं जाते।

    आखिर व्यवस्था में छेद नहीं है तो क्या है। शिक्षा क्षेत्र की व्यवस्था का नजारा शनिवार को कस्बे के दुर्घटिया मोड़ सड़क मार्ग के पास एक खाली प्लाट में नजर आया, जहां कई मासूम कचरे में अपना भविष्य तलाशते हुए दिखाई दिए।बात की गई तो ज्ञात हुआ इस कचरे से इन मासूमों के घर का चूल्हा जलता है।इन बच्चों का लक्ष्य रोजाना अधिक से अधिक कचरा चुनना है।समझ नहीं आता ऐसे में सर्वशिक्षा अभियान कैसे सफल होगा।जबकि प्रवासियों के नाम तमाम योजनाओं को रोज अमलीजामा पहनाया जाता है।दरअसल सरकार द्वारा हर वर्ष 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को स्कूल भेजने के लिए सर्व शिक्षा अभियान भी चलाया जाता है।अभिभावकों को जागरुक करने के लिए रैली निकालकर जागरुक किया जाता है। ताकि सभी बच्चों को शिक्षा मिल सके।उच्च अधिकारियों के आदेशों की औपचारिकता तो हुई होगी लेकिन अभी भी पढ़ने की उम्र में क्षेत्र के अधिकांश बच्चे स्कूल जाने से वंचित हैं।खैर उपरोक्त मासूमों का पता नहीं चल सका।पर कस्बे से सटी झुग्गी बस्ती में पन्नी तानकर झोपड़ी बना जीवन यापन कर रहे लालजीत पुत्र स्वर्गीय चोटकन, सोहन पुत्र राजा, राम जीवन पुत्र नत्था, रंजीत पुत्र सुरेश, ऊदल पुत्र प्रधान, सुब्बा, इद्रीश पुत्र महिपाल, आसिब पुत्र कृष्ण पाल, कल्लू पुत्र चिटकन, सेफ पुत्र सूरत के पास पहुंचने मात्र से ही इन लोगों को जैसे नई जिंदगी मिल गई हो अपने अपने दर्द लेकर मौके पर इकट्ठा हुए तमाम महिला पुरुषों ने बताया कि साहब आप यहां तक आ गए ये हमारी किस्मत यहां बच्चों की शिक्षा छोड़िए हम सभी के पास समुचित छत तक नहीं है, ना किसी प्रकार की सरकारी योजनाओं का लाभ मिलता है और ना ही पेट पालन का कोई समुचित जरिया बच्चे कूड़ा कचरा बीनते हैं हमारे पति गुब्बारे और बाल बदल कर परिवार में सब्जी तेल की रोजाना व्यवस्थाएं करते हैं।

    कुछ महिलाओं ने बताया कि वह दिनभर बच्चों के साथ कचरा एकत्र करती है।जिसे बेचकर दो वक्त के खाने का रथ इंतजाम हो पाता है। उन्होंने बताया कि उनका न तो राशन कार्ड बना है और न ही उन्हें सरकार की किसी योजना का लाभ मिल रहा है।ऐसे में सरकार व सरकारी सिस्टम पर यह एक सवालिया निशान तो खड़ा ही कर रहा है कि लाख दावे करने वाले प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री की योजनाओं का जमीन पर कोई असर नहीं हो रहा है।

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