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    पराजय का परिहास और हम।

    राकेश अचल का लेख। टी-20 खेलों में भारत को इंग्लैंड से मिली पराजय कोई ऐसी बड़ी ऐतिहासिक घटना नहीं है जिसका शोक मनाया जाए। दुर्भाग्य ये है कि हमारी सरकार का इकबाल इस पराजय से जोड़कर अब चुटकुलेबाजी चल रही है। मै क्रिकेट का अंधभक्त नहीं हूं लेकिन मुझे क्रिकेट बुरी भी नहीं लगती। क्रिकेट और सियासत में दो बातें एक जैसी हैं और वो है सामूहिक उत्तरदायित्व की। ताज़ा खेल का नतीजा इसी सामूहिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। खेल में हार जीत चलती रहती है, उसे खेल भावना से ही लिया जाता है। ऐसे नतीजों पर राजनीति नहीं की जाती।

    टी-20के इस खेल के बहाने अब पूरी सरकार निशाने पर है।वजह है वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की एक बचकानी टिप्पणी। निर्मला जी संयोग से देश की वित्त मंत्री अवश्य हैं लेकिन उन्हें जमीनी सियासत का ककहरा तक नहीं आता, यदि वे जमीन से जुड़ी नेता होतीं तो मुमकिन है कि ऐसी टिप्पणी न करतीं कि पूरी सरकार की जगहंसाई न होती। 

    क्रिकेट में हार जीत का सरकार से वैसे कोई रिश्ता नहीं होता किन्तु अब जब देश में श्रेय लूटने की होड़ मची हो तो फिर जो हो रहा है, उसे होना ही है। खेल में राजनीति का जो विष कांग्रेस ने डाला था उसे भाजपा ने और ज्यादा विषाक्त बना दिया है। बीसीसीआई की कमान जिस बेशर्मी से केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बेटे को दी गई,वो किसी से छिपा नहीं है।बोर्ड में क्या हो रहा है, ये भी देश, दुनिया को पता है। इसलिए निर्मला सीतारमण जी की प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रियाएं भी स्वाभाविक है। सियासत में खेल भावना का अंतिम झंडाबरदार मै पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई को मानता था।वे राजनेता के साथ कवि भी थे, उन्होंने खुद शिवमंगल सिंह सुमन की कविता-''क्‍या हार में क्‍या जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं संधर्ष पथ पर जो मिले ,यह भी सही वह भी सही।

    वरदान माँगूँगा नहीं।' को अपनी राजनीति का ध्येय बना रखा था।अटल जी के बाद भाजपा का जो नेतृत्व हमारे सामने है उसके पास खेल भावना है ही नहीं। पिछले आठ साल से देश में अदावत की सियासत चल रही है। खेलकूद भी इससे अछूते नहीं रह गये हैं। 

    हमारी सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में पडौसी मुल्कों के साथ जिस तरीके से व्यवहार किया है उसका असर कूटनीति के साथ ही खेलनीति पर भी पड़ा है।हाल ही में इंग्लैंड में ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बनने पर भारत में जिस तरह की प्रतिक्रिया हुई थी, सीतारमण की प्रतिक्रिया को उसी से जोड़कर देखा जा रहा है।बेहतर होता कि सीता जी यदि भारत की पराजय को खेल भावना से लेकर टिप्पणी करतीं या मौन रहतीं।

    भारत की आजादी के 75 साल में भारत न जाने कितने क्रिकेट मैच हारा और जीता है, लेकिन कभी नतीजों को लेकर परिहास कभी नहीं हुआ। सीता जी की टिप्पणी पर टिप्पणियां करने वालों को भी सोचना चाहिए कि सीता जी देश नहीं है।देश बहुत बड़ा है,ऐसी हारजीत से देश के भविष्य पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है। खेल होते रहेंगे,हार- जीत चलती रहेगी, इसलिए हमें परिहास छोड़कर अपने खेल को और उन्नत करने के बारे में सोचना चाहिए।

    टी20 वर्ल्ड कप 2022 के सेमीफाइनल में करारी हार के बाद  टीम इंडिया के ओपनिंग बल्लेबाज केएल राहुल को रिटायर होने की सलाह को भी मै खेलभावना के विपरीत मानता हूं। राहुल खेल में फ्लॉप होने वाले पहले खिलाड़ी नहीं है। यदि टीम जीत गई होती तो आलोचक ह राहुल क लिए पलक पांवड़े बिछाए खड़े होते।

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