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    सम्भल। ऐतिहासिक किले का खतरे में अस्तित्व।

    रिपोर्टर : उवैस दानिश

    सम्भल। मुगलकालीन युग दिल्ली और आगरा के सल्तनत के बीचो बीच बसे सम्भल रियासत अपने अंदर ऐतिहासिकता समेटे हुए हैं सम्भल के विभिन्न जगहों पर मौजूद टीले, किले सहित तमाम ऐसे बुजुर्ग व जगाहे हैं जो एक सशक्त सम्भल की कहानी बयां करते हैं इन्हीं में से एक सय्यद फिरोज शाह का किला भी है जो वर्तमान सम्भल शहर से सात किलोमीटर की दूरी पर अब जल विहीन हो चुकी सोत नदी के किनारे पर एक खंडहर के रूप में स्थित है स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि जल्द ही इस खंडहर किले में चार चांद लगेंगे व किले की जमीन पर हुए अवैध कब्जे जल्द से जल्द हटेंगे।

    अदब और सियासत का गहवारा कहा जाने वाला शहर सम्भल जिसे राजा, महाराजाओं और मुग़लिया दौर में दारूल सल्तनत का खिताब मिल चुका है। सम्भल से सात किमी. दूर मुरादाबाद मार्ग पर मुगल बादशाह शाहजहां के दौर में  सन् 1643 में सम्भल की सोत नदी के किनारे सय्यद फिरोज़ ने ये किला बनवाया था।  फिरोजशाह, शाहजहां के शासनकाल में सम्भल क्षेत्र के गवर्नर रहे रुस्तमखां दक्खिनी के फौज़ी हुआ करते थे। उन्हें शाहजहां ने सोत नदी के किनारे सम्भल में एक हजार बीघा ज़मीन तोहफे मे दी थी। उसी जमीन पर किला बनाया गया था, जिसे पुराने किले के नाम से जाना जाता है। गांव में सय्यद फिरोज शाह द्वारा बनवाया किला उनकी याद को ताजा करता है। बताया जाता है आगरा में दुश्मनों की घेराबंदी किए जाने के बाद शाहजहां के सेनापति फिरोज़शाह इसी किले मे आकर रूके थे। इसीलिए  फिरोज शाह के ही नाम से इस गांव का नाम फिरोजपुर रखा गया। किले के भीतर भूमि पर एक बुर्ज और कुआं बना है। ग्रामीणों का कहना है कि देखरेख न होने की वजह से किले की हालत जर्जर बनी हुई थी। पुरातत्व विभाग की अनदेखी के चलते किला खंडहर बन चुका है। फिरोजपुर के प्राचीन किला लंबे समय से जर्जर हालत मे है। किले के द्वार की ईंटें लगातार गिरती रहती हैं। पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित इस किले का द्वार यहां आने वाले पर्यटकों को मुग़लिया दौर की तहज़ीब और हुनर की याद दिलाता है। यहां नदी पर पुल का निर्माण भी सय्यद फिरोज ने कराया था किले के अंदर एक मस्जिद का निर्माण कराने के साथ ही जमीन के अंदर बीच सुरक्षित आरामगाह का निर्माण हुआ था। यही ग्राम फिरोजपुर में सय्यद फिरोज शाह ने अपने जीवन काल में ही अपना मजार तैयार कराया था। यही इनके परिवार वाले दफन हैं फ़िरोज़ शाह ने यहां कहीं से खिन्नी के पेड़ लाए थे जो आज भी यहां मौजूद है। अफसोस है कि इस ऐतिहासिक विरासत का अस्तित्व खतरे में है स्थानीय लोग किले की विरासत को कब्जा करने में लगे हुए हैं। 97 साल के बुजुर्ग स्थानीय निवासी हाजी साबिर शेख बताते हैं कि 35-36 बिगे में यह किला बना हुआ है। वह चाहते हैं कि यहां अच्छा स्टेडियम या पार्क बन जाए जिससे यहां के लोगों को कुछ फायदा मिल सके साथ ही उनका कहना है कि किले के गेट पर कुछ लोगों ने अवैध निर्माण कर रखा है जिसका मुकदमा चल रहा है जल्द ही मुकदमा जीतकर वह अवैध निर्माण हटेगा।

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