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    कानपुर। नकदी फायदे के लिए करें,अलसी की वैज्ञानिक खेती:- डॉक्टर नलिनी तिवारी

    इब्ने हसन ज़ैदी\कानपुर। चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर के कुलपति डॉक्टर डी.आर. सिंह द्वारा जारी निर्देश के क्रम में आज विश्व विद्यालय की अलसी अभिजनक डॉक्टर नलिनी तिवारी ने किसान भाइयों हेतु अलसी की वैज्ञानिक खेती के बारे में एडवाइजरी जारी की। उन्होंने बताया कि भारतीय अर्थव्यवस्था में क्षेत्रफल एवं उत्पादन की दृष्टि से तिलहनी फसलें खाद्यान्न फसलों के बाद दूसरा महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। भारत में जलवायु की विभिन्नता के कारण कई तिलहनी फसलें उगाई जाती हैं। इन तिलहनी फसलों में राई एवं सरसों के बाद अलसी का प्रमुख स्थान है। अलसी एक प्रमुख रवी तिलहनी फसल है जिस का उत्पादन बीज एवं रेशा प्राप्त करने के लिए किया जाता है। 

    डॉक्टर तिवारी ने बताया कि अलसी के क्षेत्रफल एवं उत्पादन की दृष्टि से भारत का विश्व में क्रमशः तृतीय एवं पंचम स्थान है क्षेत्रफल में भारत का स्थान चीन के साथ एवं कनाडा व कजाकिस्तान के बाद आता है। जबकि उत्पादन में कनाडा,कजाकिस्तान, चीन एवं यूएसए के बाद आता है। हमारे देश की अलसी का कुल क्षेत्रफल 2.94 लाख हेक्टेयर तथा उत्पादन 1.54 लाख टन एवं उत्पादकता 525 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है।उत्तर प्रदेश में अलसी का क्षेत्रफल उत्पादन एवं उत्पादकता क्रमश: 0.32 लाख हेक्टेयर ,0.17 लाख टन एवं 531 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। उत्तर प्रदेश में अलसी की खेती बुंदेलखंड क्षेत्र जालौन,हमीरपुर, बांदा, झांसी,ललितपुर एवं कानपुर नगर, कानपुर देहात, बस्ती,प्रयागराज, वाराणसी, मिर्जापुर आदि में सफलतापूर्वक की जाती  है। 

    उन्होंने बताया कि अलसी की खेती जैविक एवं अजैविक दोनों प्रकार से की जा सकती है। इस समय अलसी की बुवाई का समय चल रहा है किसान भाई 20 नवंबर तक अलसी की बुवाई कर सकते हैं। किसान भाई इसे असिंचित, सिंचित दशा में अलसी के बीज की बुवाई कर दें। अलसी के बारे में गांधी जी ने कहा था कि जिस घर में अलसी का सेवन होता है वह घर निरोगी होता है। अलसी के बीज में तेल 40 से 45%, प्रोटीन 21%,खनिज 3%, कार्बोहाइड्रेट 29%,ऊर्जा 530 किलोग्राम कैलोरी, कैल्शियम 170 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम, लोहा 370 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम इसके अलावा कैरोटीन, थायमीन,राइबोफ्लेविन एवं नाएसीन भी होता है। उन्होंने बताया कि अलसी के छिलके में मुएसिटेड होता है जिससे सर्दी, जुखाम,खांसी एवं खराब में फायदा होता है। अलसी में लिगनेन नामक एंटीऑक्सीडेंट होता है जो कि एक प्लांट एस्ट्रोजन होता है  यह कैंसर रोधी होता है तथा ट्यूमर की ग्रोथ को रोकता है। अलसी के बीज में खाद्य रेशा भी होता है जिसके कारण कब्ज एवं शरीर के रक्त में शर्करा के स्तर को नियमित करने में सहायक एवं कोलेस्ट्रॉल को कम करने में सहायक होता है। अलसी से प्राप्त प्रोटीन में सभी एमिनो एसिड पाए जाते हैं इसके बीज में ओमेगा 3 एवं ओमेगा 6 वसा अम्ल भी होते हैं omega-3 हमारे शरीर में संश्लेषित नहीं होता है अतः हमें अलसी खाकर इसकी आपूर्ति करनी पड़ती है ओमेगा 6 से बुद्धि एवं स्मरण शक्ति, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती हैl  यह कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल कर हृदय घाट रोकने एवं गठिया के निदान में उपयोगी हैl खिलाड़ियों के मांस पेशियों के खिंचाव एवं दर्द में भी अलसी के तेल का प्रयोग किया जाता है हमारे देश में अलसी की खेती मुख्य  बीज से तेल प्राप्त करने के लिए की जाती हैl कुल तेल उत्पादन का 80% भाग औद्योगिक कार्यों हेतु पेंट चमड़ा, छपाई, स्याही आदि के रूप में प्रयोग की जाती है बाकी 20% तेल खाने में इस्तेमाल होता हैl बीज से तेल निकालने के बाद 18 से 20% प्रोटीन व 3% तेल बचता है जो कि जानवरों के लिए पौष्टिक एवं भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के भी काम आती हैl अलसी की दो उद्देश्य प्रजाति से रेशा प्राप्त किया जाता है यह रेशा मजबूत टिकाऊ एवं चमकदार होता है इससे मजबूत रस्सी एवं कपड़े बनाए जाते हैं चमकदार रेशा होने के कारण इसे सूती, रेशमी कपड़ों के साथ मिलाकर वस्त्र बनाए जाते हैं। इसके साथ ही इसका उपयोग फौज में विभिन्न कार्यों हेतु किया जाता हैl इसकी लकड़ी के टुकड़ों से लुगदी बनाकर अच्छी गुणवत्ता वाले कागज तैयार किए जाते हैं। विश्वविद्यालय ने अलसी की बीज वाली प्रजातियां एवं दो उद्देश्य प्रजातियां विकसित की गई हैंl किसान भाई इनका प्रयोग अपने खेत में करके अपनी आय को पढ़ा सकते हैं। उन्होंने किसान भाइयों को सलाह दी कि बीज उद्देश्य प्रजातियां इंदु,उमा, सूर्या,शेखर,अपर्णा,शीला, सुभ्रा,गरिमा,आदि है जबकि दो उद्देश्य हेतु शिखा, रश्मि, पार्वती, रुचि, राजन एवं गौरव हैं।

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