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    खपरैल: भारत से अमेरिका तक।

    राकेश अचल का लेख। पाठकों के जायके में तब्दीली लेखक की जिम्मेदारी है, इसीलिए आज न सियासत पर बात होगी न नाकामियों पर।आज बात होगी मिट्टी से बनी उस खपरैल पर जो भारत के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर महाबली अमेरिका तक की जरूरत है।

    हम देश की उस पीढी से ताल्लुक रखते हैं जिसने कच्चे घर की छप्पर वाली छत पर मिट्टी की खपरैल बनाने के लिए भूमिहीनों को जमींदारों की चिरौरियां करते देखा है। जमींदार दया करके अपने खेत की मिट्टी भूमिहीन किसान को देता लेकिन बदले में अपने लिए भी खपरैल बनवा लेता था। खपरैल तब सांचे से नहीं तजुर्बे से बनाई जाती थीं।एकभाग चपटा दूसरा मुड़ा हुआ। चपटा भाग जिससे नाली बनती उसे खपरा और दूसरे भाग को घुड़िया कहते थे। पहले कच्ची मिट्टी को गूंथना फिर एक समान लोई बनाकर उसके खपरे और घुड़िया बनाना, सुखाना फिर सिलसिले से जमाकर आग में पकाना बेहद श्रमसाध्य कार्य होता था। ये सालाना कारोबार था।

    हर साल वर्षा से पहले अरहर की सूखी डालियों से छत बनाना और फिर उस पर खपरैल बिछाना आसान काम नहीं होता। गांव के कुत्ते, बिल्लियां और मोर हर साल खपरैल को नुक्सान पहुंचाते हैं,सो हर साल टूटी खपरैल बदलना पड़ती है। खपरैल गर्मी में ठंडक देती है और वर्षा में पानी से बचाती है। खपरैल की उम्र लंबी होती है। हमारे बुंदेलखंड की तो पहचान ही खपरैल थी।

    खपरैल उतनी ही पुरानी है,जितनी कि मानव सभ्यता। मोहनजोदड़ो में भी खपरैल के अवशेष मिले हैं। भारत के मैदानी हिस्से से लेकर पहाड़ी भाग तक में खपरैल अलग अलग आकार में उपलब्ध है। मैदान में खपरैल का वजूद ख़तरे में है, लेकिन अब खपरैल नये संस्करण के रुप में सामने है।

    जब मैं पहली बार अमेरिका आया तो यहां खपरैल देखकर दंग रह गया। यहां खपरैल बिछाना उतना ही श्रमसाध्य है जितना कि हमारे यहां है। फर्क सिर्फ इतना है कि अमेरिका में खपरैल नट बोल्ट से कसे जाते हैं। खपरैल मिट्टी, कंक्रीट और प्लास्टिक तक के बनने लगे हैं। खपरैल की जरूरत पिछले हजार साल में भी नहीं बदली। दुर्भाग्य ये है कि किसी जमाने में भारतीय वास्तु शास्त्र में शामिल खपरैल अब गरीब की पहुंच से बाहर हो गयी।

    खपरैल एशिया में ही है नहीं बल्कि पूरे योरोप और मध्य एशिया में भी प्रचलित है। मैंने चीन, नेपाल, भूटान, में भी खपरैल देखी और अमेरिका में तो देख ही रहा हूं।मै जिस घर में जन्मा था उसकी अटारी भी खपरैल की ही थी।अब मिट्टी का घर जमींदोज हो गया है लेकिन एक हिस्से मे खपरैल अभी भी मौजूद है। खपरैल के वजूद और उसे गरीब की पहुंच तक बनाए रखने के लिए हमारी सरकारों और वैज्ञानिकों को मिलकर काम करना चाहिए।

    आधुनिक दुनिया खपरैल को रूफ टाइल्स कहती हैं।भारत में जहां खपरैल लुप्त हो रही है कि वही अमेरिका में खपरैल बनाने से लेकर बनाने, बिछाने और मरम्मत करने का एक व्यवस्थित कारोबार है। भारत में भी ये मुमकिन है यदि सरकार भवन निर्माण सामग्री में कंक्रीट के बजाय खपरैल को प्रोत्साहित करे। ऐसा करने से पहाड़ों का अवैध खनन रुकने के साथ ही प्रदूषण पर भी काबू पाया जा सकता है। गौरतलब है कि इस सबके बावजूद भारत में खपरैल के अलावा दूसरे तरह की टाइल्स का कारोबार 8 हजार करोड़ से भी ज्यादा का है। अमेरिका में तो इस धंधे में डालर बरसते हैं। मप्र स्थापना की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई 

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