Header Ads

  • INA BREAKING NEWS

    गुजरात:चुनाव और पराठा

    राकेश अचल का लेख। हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तिथियों का ऐलान कर दिया गया लेकिन गुजरात विधानसभा के चुनावों की तिथियां घोषित नहीं की गयीं। इससे न गुजरात का महत्व कम हुआ और न चुनाव आयोग का क्योंकि गुजरात तो हमेशा की तरह बिना चुनावी हलचल के सुर्ख़ियों में हैं। गुजरात के एक अपीलीय अधिकरण ने फ्रोजन पराठें पर 18  फीसदी जीएसटी लगाने को जायज बताकर सुर्खियां बटोर ही लीं। 

    बिहार में विधानसभा के चुनाव हों ,न हों या कब हों ? ये केंद्र सरकार जाने ,केंद्र सरकार का केंचुआ जाने ,हमें क्या ? जब चुनाव होंगे तब हो जाएंगे ,कौन सा पहाड़ टूट रहा है चुनावों के बिना। सबको पता है कि ऊँट किस करवट बैठेगा ? दरअसल आजकल ऊँट अपनी मर्जी से करवट नहीं लेता,फिर चाहे वो ऊँट केंचुआ प्रजाति का हो या प्राधिकरण प्रजाति का, आजकल हर ऊँट दिल्ली का इशारा पाकर करवट लेते हैं। अब देखिये न गुजरात के अग्रिम निर्णय अपीलीय प्राधिकरण (एएएआर) ने एक आदेश में कहा है कि परांठे बनाने में बेशक गेहूं के आटे का इस्तेमाल किया जाता है लेकिन यह सामान्य रोटी की तरह नहीं है और 5 प्रतिशत माल एवं सेवा कर (जीएसटी) वाले उत्पादों की श्रेणी में नहीं आता। इसपर 18 प्रतिशत जीएसटी लगेगा।

    प्राधिकरण को पता है कि केंद्र की माली हालत खराब है इसलिए उसे राजस्व की जरूरत है ,सो उसने फ्रोजन पराठें से जीएसटी हटाने से इंकार कर दिया .मुझे लगता है कि प्राधिकरण के अध्यक्ष या तो पराठें खाते नहीं है ,या उन्हें फ्रोजन पराठों से चिढ है ,अन्यथा वे ऐसा फैसला न सुनाते. आज महानगरों में रहने वाली कामकाजी पीढ़ी फ्रोजन पराठे पर ही निर्भर है। घर में परांठे बनाने का समय किसके पास है ? लेकिन अब यही फ्रोजन पराठा 18  फीसदी मंहगा हो जाएगा। 

    आपको बता दें कि एएआर ने अपने आदेश में परांठे पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगाने की कवायद करते कहा था कि परांठा खाखरा या सादी रोटी की तरह नहीं है, जो खाने के लिए सीधा तैयार हो। इससे पहले एएआर की कर्नाटक पीठ ने इसी तरह के एक मामले में कहा था कि ‘फ्रोजन परांठे' को खाने से पहले गरम करने जैसी आगे की प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। इसलिए इस पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगाया जाना चाहिए। इस नए आदेश के बाद फ्रोजन पराठे पर जीएसटी को लेकर राष्ट्रव्यापी बहस होना चाहिए .पराठा फ्रोजन हो या सादा है तो पराठा आखिर।

    फ्रोजन पराठा बनाने में  मिश्रित सब्जी, प्याज, मेथी, आलू, लच्छा, मूली, गेहूं के आटे के अलावा नमक, तेल, आलू, मटर, फूलगोभी, धनिया पाउडर, ब्रेड इम्प्रूवर और पानी जैसे तत्व शामिल होते हैं, जो इसे सादा  रोटी से ‘अलग' बनाते हैं। लेकिन पराठा बनाने की तमाम सामग्री पर पहले से जीएसटी लगती है ,इसलिए पराठे को जीएसटी मुक्त रखा जा सकता था ,लेकिन सरकार के लिए निर्मम तो होना ही पड़ता है प्राधिकरणों को .अगर वे उदार हो जायेंगे तो सरकार का भट्टा न बैठ जाएगा ?

    सरकार का भट्टा ने बैठे इसीलिए तो जीएसटी का दायरा सुरसा मुख की तरह लगातार बढ़ता जा रहा है। अब देश में दही और मही तक जीएसटी के दायरे में है। जीएसटी के दायरे में अब केवल आदमी की साँसें बचीं हैं। यदि केंद्र का खजाना मौजूदा रफ्तार से खाली आता रहा तो  मुमकिन है कि आने वाले दिनों में सांस लेने पर भी जीएसटी आरोपित कर दी जाये। विपक्ष को चाहिए कि वो फ्रोजन पराठे पर जीएसटी के खिलाफ भी एक पदयात्रा करे .फ्रोजन पराठे के समर्थन में जनमत बनाये .आखिर ये भी एक चुनावी मुद्दा हो सकता है। हाल-फिलहाल  हिमाचल विधानसभा चुनावों में फ्रोजन पराठे को चुनाव घोषणा पत्र का हिस्सा बनाकर ' पराठा ' सियासत की जा सकती है।

    सरकार को अधिकार है कि वो जिसके ऊपर चाहे जीएसटी लगाए और जिस पर न चाहे न लगाए। जनता को भी अधिकार है कि वो या तो जीएसटी युक्त फ्रोजन पराठा खाये या उसका बहिष्कार कर दे। जब आप फ्रोजन पराठा कहएँगे ही नहीं तो सरकार को ख़ाक जीएसटी मिलेगी ? आप अपने-अपने शहर की पराठा गलियां खोजिये और वहां जाकर ताजा पराठा खाइये न ! क्या जरूरी है फ्रोजन पराठा खाने की। इस मामले में दिल्ली और पंजाब वालों को पहल करना चाहिए ,क्योंकि यहां के लोग ही पराठों के ज्यादा शौकीन हैं। 

    वैसे पराठा भारत से लेकर दुनिया में जहाँ भी भारतीय है वहां लोकप्रिय है और उपलब्ध है। मै तो जब भी देश के बाहर होता हूँ तो सबसे पहले फ्रोजन पराठा तलाश करता हूँ ,क्योंकि इसे तवे पर डालकर गर्म करो,ऊपर मख्खन पेलो और मसक लो.हो गयी पेट पूजा, न बीबी को परेशानी और न आपको .हाँ हर पराठे पर  जीएसटी तो यहां भी देना है और कहीं भी देना है .हकीकत तो ये है कि अब हिन्दुस्तानियों को जीएसटी देने की आदत बना लेना चाहिए, बेहतर हो कि हम भारतीय उन सामग्रियों पर भी जीएसटी स्वेच्छा से दें जिन पर अभी नहीं ली  जाती। जीएसटी राष्ट्र नर्माण की दिशा में जनता का सीधा -सीधा योगदान है। मै तो कहता हों कि अबकी हर चुनाव में मतदान पर भी जीएसटी लगा देना चाहिए .भले ही ये जीएसटी मतदाता खुद दे या राजनीतिक दल चुनाव नतीजे  आने के बाद दें। 

    पराठा और उसका सहोदर फ्रोजन पराठा कहाँ से आया,ये देशी है या मुगलिया या ब्रितानी या इस्लामी या हिन्दू ,मै नहीं जानता। मुझे तो इतना पता है कि पराठा भारत के तो हर हिस्से में मौजूद है। चाहे गर्मागर्म ले लीजिये चाहे  फ्रोजन ले लीजिये। उत्तरी भारतीय उपमहाद्वीपीय कलेवे में सबसे लोकप्रिय खाद्य  यदि कोई है तो वह परांठा ही है। कचौरी,समौसा और पोहा पराठे से पीछे ही रहते हैं। इसे आप  पराठा, परौठा, परावठा, परांठा और परांवठा कुछ भी कह सकतें हैं। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक  भारतीय रसोई में  नित्य सवेरे तवे पर सेंके जाते परांठे की लुभावनी सुुुगन्ध भूख बढ़ा देती है. मुझे तो पंजाब के परांठे सबसे अच्छे लगते हैं। 

    आकार को लेकर पराठें ने कभी ,कोई शिकायत नहीं की. आप इसे गोल, तिकोना, चौकोर चाहे जैसा बना सकते हैं। पराठों को लेकर जितने आविष्कार भारत और विदेशों में हुए हैं उतने शायद नासा में भी नहीं किये गए होंगे। आप लच्छा परांठा,लवण, अजवायन का परांठा,पुदीना परांठा, मेथी, पालक, बथुआ आदि किसी को आटे में मिलाकर पराठें बना सकते हैं .पराठा सबके साथ निभाने के लिए तैयार रहता है .हमारी दादी पराठा विशेषज्ञ थीं। वे भरवां परांठा बनाने के लिए आलू,मूली,गोभी और प्याज के अलावा दाल यहां तक कि सत्तू का पराठा बना देती थीं. पनीर के पराठे तो बनते ही हैं संभ्रांत घरों में, पराठों की दुनिया में बड़ी क्रान्ति हो चुकी है। अब लच्छा पराठे के अलावा नवरत्न पराठा ,कीमा पराठा ,अंडा पराठा, शक़्कर का,गुड़ का पराठा बनवा और खा सकते हैं। महाराष्ट्र की पूरन पोली भी पराठे की ही सगी बहन है। बहरहाल बात यही समाप्त करते हैं और केंद्र सरकार से गुहार लगते हैं कि देश के परमप्रिय पराठें को जीएसटी से मुक्त कर दीजिए प्लीज।

    Post Top Ad


    Post Bottom Ad


    Blogger द्वारा संचालित.