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    सिकंदराराऊ। अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति हेतु करें यम दीप पूजन : स्वामी पूर्णानंदपुरी जी

    रिपोर्ट- नीरज चक्रपाणि

    सिकंदराराऊ। धनतेरस पर मां लक्ष्मी, कुबरे देवता और भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है।शास्त्रों के अनुसार धनतेरस की पूजा प्रदोष काल यानी  की शाम के समय की जाती है, जब स्थिर लग्न प्रचलित हो। वृषभ लग्न को स्थिर माना गया है, इस वर्ष धनतेरस तिथि भी संशय में पड़ी हुई है।

    वैदिक ज्योतिष संस्थान के अध्यक्ष एवं महामंडलेश्वर स्वामी श्री पूर्णानंदपुरी जी महाराज ने धनत्रयोदशी के बारे में स्पष्ट जानकारी देते हुए बताया कि कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि 22 अक्टूबर को सांय 6:02 मिनट से प्रारंभ होकर 23 को सांय 06:03 मिनट तक रहेगी। अतः शनिवार सांय 07:10 मिनट से 08:24 मिनट तक पूजा कर सकते हैं साथ ही प्रदोष काल सांय 5:52 मिनट से 8:24 मिनट तक रहेगा।वृषभ काल सांय 7:10 मिनट से रात्रि 09:06 मिनट तक रहेगा।

    स्वामी पूर्णानंदपुरी जी ने बताया कि 22 अक्टूबर सांय 06:02 मिनट से 23 अक्टूबर को सांय 06:03 मिनट तक खरीददारी की जा सकेगी,धनतेरस पर सोना, चांदी, वाहन, संपत्ति, जमीन, बर्तन आदि खरीदना शुभ होता है।इस बार धनतेरस पर पूरे दिन सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है जो खरीदारी के लिए बहुत शुभ होता है।
    पूजा विधि एवं विधान के बारे में स्वामी जी ने बताया कि धनतेरस पर प्रदोष काल या वृष लग्न में कुबेर और लक्ष्मी का पूजन करना उत्तम रहेगा क्योंकि प्रदोष काल में धनतेरस के दिन भेंट की हुई सामग्री से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। सनातन धर्म में भगवान धन्वंतरि देव वैद्य के रूप में जाने जाते है इसलिए बेहतर स्वास्थ्य के लिए धन्वन्तरि पूजन अमृत चौघड़िया, लाभ चौघड़िया, वृष लग्न में करना चाहिए अतः इस दिन प्रातः काल सूर्योदय के पूर्व स्नान करने के पश्चात शुद्ध होकर एक चौकी के ऊपर लाल वस्त्र बिछाकर भगवान गणेश, कुबेर, धन्वंतरि और लक्ष्मी जी को विराजमान करें तथा साथ ही साथ एक करमांग घी का दीपक प्रज्वलित करे।  हाथ में सुपारी चावल, अबीर गुलाल,सिंदूर,हल्दी और एक पुष्प हाथ में रखे भगवान का संकल्प ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: कहकर करें। तत्पश्चात भगवान कुबेर, लक्ष्मी, गणेश और धनवंतरी जी को 4 बार स्नान कराकर पंचामृत से स्नान कराकर भगवान धन्वंतरी और भगवान गणपति पर जनेऊ जोड़ा चढ़ाएं और अपनी सामर्थ्य अनुसार गुड़ या मिष्ठान का भोग लगाकर बाद में 13 मिट्टी के दीपक जलाकर उनकी अबीर गुलाल चावल से पूजा करें, अंत में महालक्ष्मी जी की आरती कर शाम के समय एक भोग की थाली मिट्टी के दीपक के साथ घर की मुख्य देहली पर रखें और दीपक का मुंह दक्षिण में रखें। मान्यता अनुसार देहली पर इस दिन भोग की थाली और दक्षिण मुख दीपक रखने से पूरे वर्ष अकाल मृत्यु का भय नहीं होता है।

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