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    बिहार\पटना। पटना उच्च न्यायालय का अहम फैसला बिहार में निकाय चुनाव पर लगी रोक, उहापोह में प्रत्याशी।

     संवाददाता, प्रमोद कुमार यादव गया बिहार

    बिहार\पटना। बिहार उच्च न्यायालय ने बिहार में 10 अक्टूबर को होने वाली प्रथम चरण के नगर निकाय चुनाव ओबीसी आरक्षण मामले पर फिलहाल रोक लगा दी गई है । आरक्षण के खिलाफ दायर याचिका पर पटना हाईकोर्ट ने यह अहम फैसला सुनाया है अदालत ने फैसले में कहा कि ओबीसी के लिए आरक्षित सीटों को सामान्य में अधिसूचित कर चुनाव कराया जाएगा। साथ ही राज्य निर्वाचन आयोग से कहा कि वह मतदान की तारीख आगे बढ़ाना चाहते तो बढ़ा सकते हैं। 

    राज्य निर्वाचन प्राधिकार एवं राज्य सरकार की ओर से अति पिछड़े समुदाय के उम्मीदवारों के लिए निकाय की कुछ मुख्य पार्षद उप मुख्य पार्षद एवं पार्षद की सीटें आरक्षित की गई थी तथा निर्वाचन की प्रक्रिया अधिसूचना नामांकन, सिंबल एलॉटमेंट एवं प्रचार प्रसार तक आगे बढ़ जाने के पश्चात माननीय पटना उच्च न्यायालय के द्वारा निरस्त कर दी गई है . गया नगर निगम के वार्ड संख्या 38 के पार्षद पद के उम्मीदवार संतोष सिंह ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है। उन्होंने बयान जारी कर कहा है कि फैसला बिहार के अति पिछड़े जनता के लिए बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है .माननीय उच्च न्यायालय के द्वारा अपने फैसले में कहा गया है कि राज्य सरकार को ऐसे आंकड़े जुटाने चाहिए ,जिससे पता लग सके की राज्य में पिछड़े अति पिछड़ों की कितनी आबादी है और उनका पिछड़ेपन का स्तर क्या है। तथा आरक्षण देने से किस प्रकार उनमें बराबरी का अवसर प्राप्त होगा?

    इन सभी बिंदुओं पर विचार करने के लिए एक 'डेडीकेटेड आयोग' के गठन का भी प्रावधान करने के लिए निर्णय में कहा गया है. इन प्रक्रियाओं को पूरा करने के पश्चात 50% की सीमा में आरक्षण देने के प्रावधानों पर विचार करने के लिए कहा गया है। जाहिर सी बात है कि आरक्षण के प्रावधान को लागू करने के पूर्व इन आंकड़ों को जुटाने के लिए जातीय जनगणना की तैयारी सरकार को करनी चाहिए . परंतु केंद्र सरकार हमेशा से जातीय गणना नहीं कराने के पक्षधर रही है .और यह साफ है कि केंद्र सरकार की मंशा यही है कि जातीय जनगणना से विभिन्न जातियों की जो पिछड़े हैं और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े हैं ,उनके वास्तविक आंकड़ों का पता चल जाएगा .विभिन्न इंडिकेटर के द्वारा उनके पिछड़ेपन का पता चल जाएगा और राजनीतिक एवं सामाजिक रूप से उनकी कम भागीदारी का भी पता चल पाएगा। 

    जब केंद्र सरकार ही यह नहीं करना चाहती है तो किस प्रकार माननीय सर्वोच्च न्यायालय एवं माननीय राज्यों के उच्च न्यायालयों का आदेशों का अनुपालन हो पाएगा ? इससे स्वता स्पष्ट है कि आज भी हमारी न्यायपालिका कार्यपालिका चीजों को उलझा कर रखना चाहती है. सवर्ण मानसिकता के लोग बिना किसी ठोस समाधान के पिछड़ों एवं अति पिछड़ों को उनके हक से मरहूम रखना चाहते हैं। संतोष सिंह  ने कहा कि केंद्र सरकार के जाति गणना पर पिछड़ा विरोधी रवैया का हर एक स्तर पर विरोध किया जाएगा तथा राज्य सरकार जो जाति जनगणना के पक्ष में है से अपील किया कि वे तुरंत ही आगामी नगर निकाय चुनाव एवं पिछड़े वर्गों एवं अति पिछड़े वर्गों के हक में आवश्यक कदम उठाते हुए अध्यादेश लेकर आए एवं जरूरत पड़े तो डबल बेंच तथा सर्वोच्च न्यायालय इस फैसले के विरुद्ध रुख करें। 

    संतोष सिंह ने यह भी कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से इस फैसले को चुनौती देने के लिए अधिवक्ता गणों से परामर्श ले रहे हैं और जरूरत पड़ी तो देश में इस फैसले के विरुद्ध माननीय उच्च न्यायालय में अपील दायर करेंगे और अति पिछड़ों के हक में लड़ाई लड़ते रहेंगे ताकि एक समृद्ध समाज की स्थापना की जा सके और उसमें मेरा भी कुछ योगदान रहे। 


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