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    करवटें लेती देश की ' पालटिक्स '

    राकेश अचल का लेख। करवट हम और आप ही नहीं लेते,पालटिक्स को भी करवट लेना पड़ती है, अन्यथा तकलीफ होने लगती है। पिछले दिनों जब से देश में टूटी-फूटी कांग्रेस की ' भारत जोड़ो यात्रा ' शुरू हुई है,देश की पालटिक्स तेजी से करवटें ले रही है। करवटें बदलने से पालटिक्स बदल जाएगी ये कहना कठिन है ,लेकिन हाँ कुछ उम्मीद तो बंधती ही है। 

    देश की राजनीति में करवटें बदलना आसान काम नहीं है. कुछ करवटें स्वेच्छा से बदली जातीं हैं और कुछ मजबूरी में, मजबूरी में बदली जाने वाली करवटों के परिणाम भी अप्रत्याशित  होते हैं। भाजपा की पुरानी बगलगीर रही शिव सेना को मजबूरी में करवट बदलना पड़ रही है ,क्योंकि पार्टी में विभाजन के बाद चुनाव चिन्ह विवाद ने पार्टी का चुनाव चिन्ह ही फ्रीज करा दिया। ये कार्रवाई हालाँकि केंचुए ने की है ,लेकिन इसके लिए जिम्मेदार एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे हैं। 

    भारत में कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दल ऐसे हैं जो कभी न कभी इस तरह की त्रासदी के शिकार हुए हैं और जो नहीं हुए हैं उन्हें आप भाग्यशाली कह सकते हैं। दरअसल चुनाव चिन्ह फ्रीज होने के बाद नए चुनाव चिन्ह को रातों-रात जनता के बीच पहुँचना आसान काम नहीं होता .कांग्रेस के चुनाव चिन्ह बार-बार बदले गए। पहले दो बैलों की जोड़ी चुनाव चिन्ह था,फिर गाय -बछड़ा हुआ और बाद में हाथ का पंजा, कम्युनिष्ट पार्टियों के चुनाव चिन्ह भी बदले गए। समाजवादियों के भी, अब देखिये की शिव सेना का क्या होता है ? बिना तीर-कमान की शिव सेना भविष्य में किस चिन्ह के साथ जनता के बीच आएगी ?

    शिव सेना के बाद नई करवट लेने वाली पार्टी ' आप ' है। इस पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने गुजरात विधानसभा चुनाव जीतने के लिए अंतत: राम का सहारा ले ही लिया। उनकी पार्टी को जब भाजपा की बी टीम कहा जाता था तो वे लाल-पीले हो जाते थे,लेकिन राम जी ने उनकी असलियत जनता के सामने ला दी है। गुजरात में यदि भाजपा सत्ता से बेदखल होती है तो वो अपना राजपाठ कांग्रेस के बजाय आप को सौंपने में कोई संकोच नहीं करेगी .अब जिम्मेदारी राम भक्तों की है कि वे किसे चुने,और किसे छोड़ें .क्योंकि अब उनके सामने राम-राम करने वाले एक जैसे दो चेहरे हैं। 

    कांग्रेस के सड़कों पर आने के बाद लगभग  सभी दल तेजी से करवट बदलते दिखाई दे रहे हैं .कांग्रेस की काशी करवट ने सभी दलों को विवश कर दिया है करवटें बदलने के लिए,क्योंकि कांग्रेस के सड़कों पर आने के बाद देश की सियासत का रंग तो बदलता सभी को दिखाई दे रहा है। सड़कों पर उतरी कांग्रेस पटरी पर आये न आये लेकिन देश की सियासत जरूर पटरी पर आ सकती है, क्योंकि सभी राजनीतिक दलों पर बदलाव का चौतरफा  दबाब है। ये दबाब आप राजनीतिक दलों में ही नहीं अपितु राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में भी देख रहे हैं। 

    हमारे एक दूरदृष्टा मित्र कह रहे थे कि करवटें बदलने पर मजंबूर लोग आने वाले दिनों में और करवटें बदलेंगे .उनका दावा है कि हाफ पेण्ट से फुल पेण्ट पर आये संघ में भी यदि कल को आप किसी महिला को सर संघ चालक की कुर्सी पर बैठा देखें तो चौंकें नहीं ,क्योंकि ऐसा कर जनता की आँखों में धूल झौंकने के अलावा अब इन संगठनों और राजनीतिक दलों के पास कोई विकल्प बचा नहीं है। जनता से दूर भगने वालों को कांग्रेस ने जनता के साथ सीधा संवाद करने की विवशता खड़ी कर दी है। 

    करवटें बदलने का असल सिलसिला तो बिहार से शुरू हुआ था,जब नीतीश कुमार ने अचानक भाजपा से छोड़-छुट्टी कर राजद के साथ सात फेरे ले लिए थे। भाजपा के लिए ये जोर का झटका धीरे से था। इस झटके के बाद भाजपा तेजी से करवटें बदल रही है. मुमकिन है कि कल को भाजपा मध्यप्रदेश में भी गुजरात,उत्तराखंड  और कर्नाटक की तरह अपना मुख्यमंत्री बदल दे। आज बदलाव की जितनी जरूरत कांग्रेस को है उससे ज्यादा जरूरत सत्तारूढ़ भाजपा को है. देश की पोलटिक्स में करवटें बदलने से देश की किस्मत भी बदले तब तो कुछ मजा आये। 

    देश की राजनीति को करवटें दिलाने का दम्भ  भरने वाले प्रशांत किशोर उर्फ़ पीके भी इन दिनों करवटें बदल रहे हैं ,लेकिन बेचारे को चैन नहीं है. पीके ने घाट-घाट का पानी पिया किन्तु अब कोई घाट उन्हें पानी पिलाने के लिए तैयार नहीं है। सबको पता चल चुका है कि देश की सियासत करवट पीके की जुगत से नहीं बल्कि देशकाल और परिस्थितियों के चलते बदलती है। राजनीति के बनारसी बाबू पीके का क्या होगा भगवान ही जाने ,क्योंकि देश की पोलटिक्स है ही भगवान के भरोसे, हम तो आरम्भ से ही देश की जनता को जनार्दन मानते और कहते आये हैं .जनता जब जाएगी देश की सियासत ने तब करवट बदली। 

    देश के इस सदी के सरदार शाह भी करवटें बदलते दिखाई दे रहे हैं। उन्हें असम में हितेश्वर सेकिया के जमाने में हुई अपनी पिटाई की याद आ रही है। इसी का बदला लेने के लिए वे अब आपने तमाम प्रतिद्वंदियों को पीटने पर आमादा हैं .मजे की बात ये है कि उन्हें फिलहाल अपने इस अभियान में कामयाबी भी मिल रही है। शाह साहब जितनी मेहनत करते हैं,भाजपा में शायद ही कोई  दूसरा नेता करता हो। कांग्रेस के जमाने में शाह साहब की जगह बैठने वाले पाटिल साहब तो कपड़े बदलने में ही बिजी रहते थे। हाँ यदि वे आज कहीं  होते तो उनका मुकाबला हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी के साथ हो सकता था .मोदी जी भी पाटिल की तरह करवटें कम कपड़े ज्यादा बदलते हैं। 

    सियासत के साथ देश की जनता भी करवटें बदले तो बात बने। वैसे लगातार बढ़ती मंहगाई और लगातार लुढ़कते रूपये को देखकर भी यदि जनता करवट न बदले तो समझ लीजिये कि देश में राम राज की स्थापना हो चुकी है।  मान लेना चाहिए कि भारत की जनता की सहनशीलता दुनिया के किसी भी हिस्से की जनता से कहीं ज्यादा है।  

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