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    नगरी -नगरी,द्वारे -द्वारे ढूंढें क्या सांवरिया?

    राकेश अचल का लेख। सांवरिया पर दया आ रही है। बात ही कुछ ऐसी है कि सांवरिया को देखकर दिल भर आता है। सांवरिया के ऊपर कोई तो बोझ है। कोई तो संकट है कि बेचारे को नगरी -नगरी द्वारे -द्वारे भटकना पड़ रहा है। आदमी जब पूरी तरह से घिर जाता है ,तब उसे भगवान की याद आती है। आदमी कम मेहनत में खुश होने वाले भगवान की तलाश करता है। हमारे मुल्क में केवल शिव को आशुतोष माना जाता है। वे धतूरे और बेलपत्र से ही खुश हो जाते हैं। वे दुग्धाभिषेक से खुश हो जाते हैं। वे नहीं पूछते कि दूध गाय का है,भैंस का है या बकरी का है। 

    इतने भोले भाले भगवान को यदि कोई जनधन खातों में जमा रकम के ब्याज से भी ' लोक' बनवा कर दे दे तो आशुतोष का प्रसन्न होना स्वाभाविक है।

    सांवरिया ने विश्वनाथ बाबा को पहले ही इंगेज कर लिया था, फिर उज्जयिनी में एक लोक बनाकर दे दिया। और आखिरी मे बाबा केदारनाथ के मंदिर पर भी माथा टेक दिया। सांवरिया कमजोर हो रहे रुपए के मामले में डालर के सामने पहले ही टेक चुके हैं। सांवरिया घुटने टेकने में भी विश्वगुरु हैं। भूखमरी के मामले में तो 107 वे स्थान पर पहले से ही हैं।

    समस्याओं को हल करने के बजाय फेंशीड्रेस में मंदिर - मंदिर जाना आसान काम है। सांवरिया कठिन काम करने में यकीन नहीं रखते। रखना भी नहीं चाहिए, क्योंकि यकीन काफिरों का काम है न कि सांवरिया का। सांवरिया ने भले प्राथमिक स्कूलों और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के लिए बजट की व्यवस्था न की हो किन्तु भोले नाथ के मंदिरों में कोरीडोर बनाने के लिए धन का इंतजाम प्राथमिकता के आधार पर जरूर किया है। भोले को खुश करने के लिए रावण बाबा को अपना शीश काटने का अभिनय करना पड़ा था,तब कहीं अमर होने का वरदान प्राप्त हुआ था। लेकिन बिभीषण साहब को यही दौलत राम जी की कृपा से सहज ही मिल गई थी। मैं तो अक्सर कहता हूं कि मित्रों, देशवासियों मंहगाई, बेरोजगारी जैसे मसलों को लेकर सरकार को कोसने के बजाय हर सोमवार को भोले बाबा की सेवा करना चाहिए।

    भोले बाबा, यानि काशीनाथ, केदारनाथ, महाकाल कोई भी हो सबके लिए सहज उपलब्ध हैं, वे ही हैं जो बीते आठ साल से सरकार के तारणहार बने हुए हैं।बाबा की कृपा न होती तो सरकार कब की चारों खाने चित हो चुकी होती। हम सांवरिया के आभारी हैं, क्योंकि वे जो करते हैं देश की 130 करोड़ अवाम के लिए करते हैं।उन अस्सी करोड़ बदनसीबों के लिए करते हैं जो दो जून रोटी के लिए जून में ही नहीं बल्कि बाकी के महिनों में भी सरकार के भरोसे रहते हैं। भूखे सरकार के भरोसे और सरकार भगवान के भरोसे है ये भरोसा कभी टूटना नहीं चाहिए।

    मुझे कभी कभी उन लोगों पर भारी गुस्सा आता है जो सांवरिया की ड्रेस को लेकर टीका टिप्पणी करते हैं। हमारी अम्मा कहती थी कि खाओ अपने मन का और पहनो सबके मन का। सांवरिया सबको साथ लेकर ही नहीं चलते, सबके मन का ही पहनते, ओढ़ते, बिछाते और खाते हैं। फ़ालतू की चीज न वे खुद खाते हैं और न किसी को खाने देते हैं। सांवरिया का अभियान राष्ट्रीय अभियान है। हमें इसका समर्थन करना चाहिए।

    हमने एक जमाने में मदर इंडिया को नगरी -नगरी द्वारे -द्वारे सांवरिया को ढूंढते देखा है।आज हालात बदल चुके हैं। सांवरिया खुद बाबरिया को खोजते फिर रहे हैं। भगवान से प्रार्थना है कि सांवरिया की खोज जल्द से जल्द पूरी हो। ताकि विश्वगुरु बनने का हमारा ख्वाब सन 2024 तक पूरा हो सके।

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