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    स्मृति शेष। रामलाल वर्मा की याद।

    राकेश अचल का लेख। बेहद अंतर्मुखी भाप्रसे के सेवानिवृत्त अधिकारी रामलाल वर्मा और ग्वालियर एक दूसरे के पर्याय रहे। 84 साल के रामलाल वर्मा से मेरी पहली मुलाकात तब हुई थी जब वे लश्कर के सीएसपी थे। बात चार दशक से ज्यादा पुरानी है। तब शहर में एक सीएसपी होता था। वर्मा जी का इकबाल ऐसा था कि पूरे शहर को वे अकेले सम्हाल लेते थे। एडीशनल एसपी और एसपी को तो मैदान में बहुत कम आना पड़ता था।

    वर्मा जी ग्वालियर में सीएसपी से लेकर भाप्रसे में शामिल होने के बाद सभी उच्च पदों पर रहे। ग्वालियर के अलावा इंदौर में उन्हें खासा मान और सम्मान मिला, लेकिन ग्वालियर,चंबल उनकी शिराओं में बहते रक्त में शामिल हो गया था। वे विवादों से हमेशा बचते रहे, हालांकि उनके साथ भी अनेक विवाद बाबस्ता हुए, किंतु कोई विवाद उनकी बदनामी की वजह नहीं बना।

    आम आदमी की सुनवाई करना और उस पर त्वरित कार्रवाई करना वर्मा जी की विशेषता थी। अपराधियों के लिए वे काल थे। जिसने भी ज्यादा सिर उठाया,मारा गया। वे आसपास के अनेक जिलों में पुलिस अधीक्षक रहे।हर जिले में दस्यु उन्मूलन के क्षेत्र में वर्मा जी का नाम शामिल हुआ। वे बहादुर थे, इसीलिए दो बार राष्ट्रपति के वीरता पदक से सम्मानित हुए, हालांकि उस दौर में पदकों और डाकुओं का परस्पर रिश्ता था।

    सेवा निवृत्त होने के बाद वर्मा जी ने छत्तीसगढ़ सरकार को अपनी सेवाएं दीं क्योंकि उनके साथ इंदौर में कलेक्टर रहे अजित जोगी छग के मुख्यमंत्री बन गये थे,जोगी का आग्रह वर्मा जी टाल नहीं सके। एक ईमानदार अफसर के रूप में चर्चित रामलाल वर्मा खेलों के प्रति समर्पित रहे। वे खुद अच्छे खिलाड़ी थे। उनका छरहरा शरीर इस बात का प्रमाण था।

    समय पर खाना,खेलना,सोना उन्होंने कभी छोड़ा नहीं। वे ग्वालियर के एक ग्रामीण क्षेत्र में भीड़ से दूर बसे। उनका छोटा और सुखी परिवार रहा, लेकिन चौथेपन में बेटे की असामयिक मृत्यु ने उन्हें तोड़ दिया। शारीरिक व्याधियां भी बढीं बावजूद इसके वे जीवन पर्यन्त सक्रिय रहे। शहर में अक्सर सार्वजनिक कार्यक्रमों में मिलते तो मुस्कुरा कर अपना हाथ बढ़ा कर हालचाल पूछते। वे ठहाके नहीं लगाते थे लेकिन एक स्निग्धा मुस्कान उनके पास हमेशा रहती थी। यही उनकी पहचान भी थी।

    आज जब नौकरशाही राजनीति के सामने घुटनों के बल बैठती है ऐसे में रामलाल वर्मा जी का जाना अखरता है। वे उन्नाव के थे लेकिन ग्वालियर उनकी अंतिम यात्रा का पड़ाव बना। मुझे अफसोस है कि अपने विदेश प्रवास की वजह से मैं वर्मा जी के अंतिम दर्शन नहीं कर सका। विनम्र श्रद्धांजलि।

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