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    महाकाल की ठेकेदार सरकार।

    राकेश अचल का लेख। मध्य्प्रदेश में ये तय करना कठिन हो रहा है कि सरकार भगवान के भरोसे चल रही है या भगवान सरकार के भरोसे हैं ? मामला उज्जैन के महाकाल मंदिर को ' महाकाल लोक ' में तब्दील करने का है। उज्जैन में महाकाल आदिकाल से विराजते हैं। वे अपने भरोसे जहां थे,वहां हैं ,किन्तु प्रदेश की सरकार का महाकाल प्रेम अचानक इतना जाएगा कि उसने महाकाल के लिए एक पृथक 'लोक' बनाने के लिए सरकारी खजाने के सभी दरवाजे खोल दिए। 

    मध्यप्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य है जहां महाकाल मंत्रिमंडल की बैठक की अध्यक्षता करते हैं। मध्यप्रदेश ऐसा भी पहला राज्य है जहां मुख्यमंत्री कोई डीपी पर राजचिन्ह नहीं बल्कि महाकाल की तस्वीर शोभायमान होती है। भगवान के भरोसे तो मध्य्प्रदेश की सहोदर उत्तर प्रदेश की सरकार भी है लेकिन  वहां के मुख्यमंत्री इस मामले में न जाने क्यों पिछड़ गए हैं। उत्तर प्रदेश में बाबा विश्वनाथ विराजते हैं और मध्यप्रदेश में बाबा महाकाल। दोनों एक ही हैं ,लेकिन नाम अलग-अलग। 

    बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है ,इसलिए उसे केंद्र सरकार ने जापान के शहर 'क्वेटो' की तरह विकसित करने के लिए केंद्र सरकार के खजाने खोल दिए। काशी की पुरानी बनावट को जमीदोज करते हुए काशी में में बाबा विश्वनाथ के नाम से एक विशाल गलियारा बना दिया गया। अंग्रेजी में गलियारे को ' कॉरिडोर 'कहते हैं। इसमने शायद कोई डोर होता ही नहीं है। कॉरिडोर बना और माँ गंगा के एक ही विस्तार में जल प्लावित हो गया। शायद माँ गंगा  को कॉरिडोर पसंद नहीं आया। 

    बहरहाल प्रधानमंत्री की देखादेखी मध्यप्रदेश में भी महाकाल कॉरिडोर के सपने देखे जाने लगे। शुरुवात हुई कमलनाथ की सरकार के समय ,किन्तु कमलनाथ की सरकार को बिभीषणों ने गिरा दिया और प्रदेश में बिना जनादेश के भाजपा की सरकार बन गयी। मुख्यमंत्री बनाये गए जनता द्वारा ठुकराए गए शिवराज सिंह चौहान . महाकाल के वैसे ही भक्त हैं जैसे प्रधानममंत्री बाबा विश्वनाथ के भक्त हैं, चौहान साहब ने बाबा को खुश करने के लिए पहले तो बाबा से मंत्रिमंडल की अध्यक्षता कराई और साथ ही उनके लिए लोक बनाने का संकल्प लेकर सरकारी खजाने के दरवाजे खोल दिए। 

    सरकारी खजाने के दरवाजे खुले तो जाहिर है की महाकाल लोक के नाम पर लूटमार भी शुरू हुई। जिससे जितना बना महाकाल का प्रसाद समझकर समेत लिया और जब पोल खुली तो ऐसे अफसरों को हटा दिया गया .अफसर तो बलि का बकरा या मुर्गा शुरू से होता ही आया है ,भले ही प्रसाद पचाने में दूसरे लोग भी शामिल हों। मुख्यमत्री शिवभक्ति के जरिये महाकाल के साथ इस युग के अवतार बाबा नरेंद्र मोदी जी को भी खुश करना चाहते हैं, और इसमें कोई बुराई भी नहीं है। 

    दरअसल महाकाल लोक एक ऐसी दीवार ( म्यूरल स्टोन वॉल)  है, जिसमें बाबा से जुड़ी कहानियों को दर्शाया गया है। पत्थरों पर नक्काशी करने वाले कलाकारों ने इसे बड़े ही सुंदर तरीके से बनाया है। महाकाल लोक की तैयारी से जुड़े लाेगाें के अनुसार यहां टीम ने महाकाल लोक में अब तक कि सबसे बड़ी म्यूरल वॉल बनाई है, जिसपर शिव को विवाह के लिए मनाने और विवाह पूर्ण होने तक कि कहानी को उकेरा  गया है। 

    'महाकाल लोक' की म्यूरल वॉल अब तक कि सबसे बड़ी म्यूरल वॉल है, इसे करीब 9 माह में 50 कारीगरों ने मिलकर तैयार किया है। इसके लिए 132 फुट लंबे व 6 फुट चौड़े राजस्थान से मंगावाए गए म्यूरल पत्थर की खासियत है कि यह हजार  वर्ष तक चमकता रहता है, यहां तक की पानी पड़ने पर भी इस पत्थर की चमक ज्यादा दिखाई देती है। ये लोक 20 हेक्टेयर भूमि पर फैला है। इस पर केंद्र और राज्य सरकार ने लगभग 793 करोड़ खर्च किए गए हैं। ये लोक काशी विश्वनाथ कॉरिडोर  से चार गुना बड़ा है क्योंकि काशी के कॉरिडोर का क्षेत्रफल मात्र 5 हेक्टेयर है।आगामी 11 अक्टूबर को प्रधानमंत्री  इस लोक का लोकार्पण करेंगे। 

    महाकाल के लोक बने और इसके जरिये नेताओं के साथ ही यदि जनता का लोक-परलोक भी सुधर जाये तो किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। मुझे भी इस लोक को लेकर कोई आपत्ति नहीं है। मै तो खुश हूँ कि प्रदेश के निकम्मे नेताओं के बजाय अब बाबा महाकाल इस सरकार का नेतृत्व कर रहे है। अगले विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा के पास वैसे भी कोई चेहरा नहीं है इसलिए बाबा की तस्वीर को सामने रखकर वोट मांगे जाने चाहिए ,ताकि फिर से शिवराज बनाम महाराज के पोस्टर न छपवाने पड़ें। भगवान भरोसे चलने वाली सरकार ये मान चुकी है कि सरकार चलाना उसके बूते की बात नहीं है .बिना जनादेश की सरकार तो महाकाल ही चला सकते है ,क्योंकि वे सबके है .उन्हें किसी जनादेश की जरूरत नहीं है। 

    लोकतंत्र में भाजपा ने आजादी के बाद जिस तरिके से भक्तिभाव का मुजाहिरा किया है वो स्तुत्य है। पुराने भक्तिकाल के मुकाबले भाजपा द्वारा रचा गया भक्तिकाल ज्यादा प्रभावी है .इस भक्तिकाल में भी लोग ' मेरो तो गिरधर गोपाल ' की तर्ज पर एकमेव मोटा भाई के नाम की माला जपते दिखाई दे रहे है। भाजपा के भक्तिभाव का ही असर है कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को सड़कों पर कदमताल करना पड़ रही है। काश कि कांग्रेस को भी भक्ति की शक्ति का अनुमान होता ! हम सभी मध्यप्रदेश वालों को उम्मीद करना चाहिए कि ११ अक्टूबर 2022  के बाद जैसे ही  महाकाल का नया लोक लोकार्पित होगा  प्रदेश की दशा और दिशा अपने आप बदल जाएगी भले ही प्रदेश की सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहे। 

    मेरा तो सुविचार ये भी है कि प्रदेश सरकार  को उज्जैन में बाबा महाकाल के  लोक-परलोक के लिए स्कूल,शिक्षा,महिला बाल विकास ,स्वास्थ्य जैसे विभागों का बजट भी समर्पित कर देना चाहिए। पुण्य कमाने के लिए कुछ भी किया जा सकता है .इसे आर्थिक अपराध नहीं माना जा सकता .आर्थिक अपराध दूसरी चीज होती है .महाकाल लोक बनने के बाद महाकाल की साख भी बढ़ेगी.भी उज्जैन में रोजन 20 से 25  हजार भक्त आते है ,अब मुमकिन  है कि ये संख्या  दोगुना  हो जाये .उज्जैन के महँ सम्राट विक्रमादित्य भी आज हाथ मॉल रहे होंगे कि जो ख्याल शिवराज सिंह चौहान की सरकार को आया वो उन्हें क्यों नहीं आया? उज्जैन यानि अवंतिका ने मौर्य,गुप्त,मुगल मराठों और अंग्रेजो का शासन  भी देखा है लेकिन आजादी के बाद कांग्रेस का शासन भी देखा किन्तु उसे जो हासिल  भाजपा के राज  में हो रहा है ,वो पहले कभी नहीं हुआ। 

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