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    पितृपक्ष पर विशेष: मृत्यु के बाद भी आत्माएं रखती हैं अपने प्रिय लोगों से संपर्क।

     अतुल कपूर (स्टेट हेड)

    विशेष रिपोर्ट। भारतीय संस्कृति में आत्मा को अजर अमर माना गया है। पितृ पक्ष में श्रद्धालु अपने पितरों को तर्पण व पिंडदान आदि से संतुष्ट करते हैं। परंतु विदेशों में भी अनेक घटनाएं तर्क और तथ्य की कसौटी पर यह सिद्ध करती हैं कि वास्तव में मृत्यु के बाद भी आत्मा का अस्तित्व रहता है तथा पितर अथवा अशरीरी आत्माएं अपने वंशजों व पूर्व जन्म में संपर्क में रहे लोगों की सहायता भी करती हैं।

    हम ऐसी ही एक सत्य घटना का उल्लेख कर रहे हैं जो कि आज भी विदेशों में प्रामाणिक मानी जाती हैं।

    सन् 1958 की घटना है। अमेरिका के प्रसिद्ध पत्रकार एवं लेखक बर्नाड हटन ने स्वयं पर घटित इस घटना का उल्लेख अपनी 'हीलिंग हैंड्स' नामक पुस्तक में किया है। हटन न्यूराइडिटिस रोग से पीड़ित थे। साथ ही उनके आंखों में देखने की क्षमता भी लगभग नष्ट हो चुकी थी। नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉक्टर हडसन उनकी चिकित्सा कर रहे थे। उन्होंने उनके आंखों के इलाज को असाध्य बता दिया और कहा कि दूसरा ऑपरेशन करने पर आंखों की बची हुई रोशनी भी चली जाएगी। उसी समय हटन की पत्नी पर्ल को मालूम हुआ कि बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध के सुविख्यात नेत्र चिकित्सक स्वर्गीय डा० लैंग की प्रेतात्मा 'एलिसबरी' शहर के मिस्टर चैपमैन पर आती है और वह चैपमैन के माध्यम से सैकड़ों नेत्र रोगियों की चिकित्सा सफलतापूर्वक कर चुकी है। पर्ल ने अपने पति से एलिसबरी जाने के लिए आग्रह किया तो बर्नाड हटन ने उसको भ्रांति व अंधविश्वास कहा। परंतु पर्ल ने कहा कि यह समझ लीजिएगा कि हम लोग एलिसबरी घूमने जा रहे हैं। हटन अपनी पत्रकारिता वाली बुद्धि के साथ एलिसबरी पहुंच गए। मिस्टर चैपमैन के यहां उन्हीं की प्रतीक्षा की जा रही थी। उस समय युवक चैपमैन पर डा० लैंग की आत्मा का स्पष्ट प्रभाव दिखाई दे रहा था। उसका चेहरा, हाव-भाव बिल्कुल वृद्ध जैसा लग रहा था। उसने हटन को गाड़ी से उतरते ही अपने कक्ष में बुलाया और कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, आइए मिस्टर हटन, आप नेत्र रोग से पीड़ित हैं। मैं डा० लैंग हूं, आपकी हर संभव सहायता करूंगा। हटन यह देखकर आश्चर्यचकित हुए कि युवक चैपमैन के व्यक्तित्व में आकस्मिक परिवर्तन कैसे हो गया। मिस्टर चैपमैन यह सब कुछ आंख बंद किए तंद्रा जैसी अवस्था में कह रहे थे। पत्रकार हटन की तर्क बुद्धि कभी से सम्मोहन सोचती, कभी टेलीपैथी कभी थाट ट्रांसफेरेन्स,कभी दिव्य दृष्टि आदि। मन में विचार आ-जा रहे थे। चैपमैन के माध्यम से डॉक्टर लैंग हटन की कुर्सी के पास पहुंचे और अपनी आंखों को हटन की आंखों के पास ले जाकर कर देखा और बोले तुम्हें माइनस 18 नंबर का चश्मा लगता है। उस समय वास्तव में हटन माइनस 18 लेंस का चश्मा लगाते थे। आंखों को दो-तीन बार उंगलियों से स्पर्श करके लैंग की आत्मा ने चैपमैन के माध्यम से  बताया कि तुम्हारी आंखों में बचपन का जो ऑपरेशन हुआ था, बिल्कुल ठीक था। हटन खुद भूल चुके थे कि कभी उनकी आंख का ऑपरेशन हुआ था परंतु जब याद आया तो उन्होंने भी हामी भरी कि 6 वर्ष की अवस्था में  ऑपरेशन हुआ था और अब उस डॉक्टर की मृत्यु हो चुकी थी। आंखों को दोबारा उंगलियों से स्पर्श करके डॉक्टर लैंग की आत्मा ने चैंपमैन के माध्यम से  कहा, तुम्हारी आंखों का लिम्फ ड्रेनेज सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा है।  ग्लाकोमा हो गया है। उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। वह तो डॉक्टर लैंग की जानकारी से च हतप्रभ हो गए थे। डॉक्टर लैंग ने बताया कि जिस बीमारी के वायरस तुम्हें कष्ट दे रहे थे, वह तो तुम्हारे डॉक्टर के उपचार सही नष्ट हो गए हैं।  हटन की पत्रकार बुद्धि को कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था। लैंग ने कहा कि मैं तुम्हारी आंखों का एक ऑपरेशन कर दूंगा, जिसमें तुम्हें कोई कष्ट नहीं होगा क्योंकि ऑपरेशन सूक्ष्म शरीर का होगा। स्थूल का नहीं। तुम हमारी बातें, उपकरणों का प्रयोग अनुभव करोगे, पर देख नहीं सकोगे। मेरे साथ अन्य सहायक प्रेत आत्माएं भी हैं। इतना कहकर डॉक्टर ने अपना काम शुरू कर दिया। लैंग बीच में ही बोलते जा रहे थे, मैं तुम्हारे सूक्ष्म शरीर को स्थूल शरीर से थोड़ा सा अलग कर रहा हूं। फ्लुइड की जांच कर रहा हूं। क्रिस्टल लेंस, रेटिना आदि। कुछ मिनट बाद उन्होंने कहा अब ऑपरेशन पूरा हो गया। तुम्हारी सिलियरी मसल्स अत्यंत कड़े हो गए थे। अब आपकी नेत्र ज्योति पुनः वापस आ जाएगी और आपका जीवन सुख में भी चलेगा।

    • रोम में है एक पितरों से संबंधित संग्रहालय 'हाउस आफ शैडोज'

    रोम में विश्व का एक ऐसा अनोखा संग्रहालय है, जिसमें पितरों से संबंधित वस्तुओं के अनेक प्रमाण संग्रहित है। इसमें तरह-तरह के छायाचित्र, तैलचित्र, वस्त्र, आभूषण तथा मूर्तियां आदि रखी हुई हैं, जिन्हें मरने के बाद वापस आई हुई सूक्ष्म शरीरधारी आत्माओं की निशानी कहा जाता है। इसी संग्रहालय में मदाम  लीलियो नामक एक महिला के पुत्र की शर्ट भी रखी है। जिसकी आस्तीन पर सूक्ष्म शरीरधारी मृतआत्मा मां की हथेली का जला हुआ निशान भी है। घटना 21 जून सन 1987 की है, जब मृत्यु के 27 वर्ष बाद मदाम की दिवंगत आत्मा अपने बेटे से मिलने और उसकी सहायता करने आई। मदाम ने अपने लाडले बेटे को बड़े अरमानों से पाला-पोसा, पढ़ाया और योग्य बनाया था। पर दुर्भाग्यवश मां की मृत्यु के बाद वह बुरी संगत में फंसकर  जुएं और शराब जैसी बुरी आदतों में लिप्त हो गया। कोशिश करने पर भी छुटकारा नहीं मिल रहा था। इन परिस्थितियों में उसे अपनी मां की बराबर याद आया करती थी। उसकी स्थिति देखकर मां की आत्मा को बड़ा कष्ट हुआ। उसने सूक्ष्म शरीर से आकर अपने बेटे को इन बुराइयों से बचने के उपाय बताए।  उसने मां के सामने दोबारा गलत संगत में न पड़ने का संकल्प लिया। दिवंगत मां की आत्मा ने विदा होते समय प्रमाण के लिए बेटे की शर्ट  पर अपने हाथ का जला हुआ चिन्ह भी छोड़ दिया, जिससे उसका साक्षात्कार हुआ था। इस घटना ने बेटे की दिनचर्या तथा आचरण में आमूलचूल परिवर्तन कर दिया। धीरे-धीरे उसने अपनी बुरी आदतों से छुटकारा पा लिया। इसी तरह एक प्रार्थना पुस्तिका को इस संग्रहालय में 1920 में रखा गया। जिस पर पितर आत्माओं की उंगलियों के प्रतीक के चिन्ह हैं, जिसकी वजह से पुस्तक के पन्नों में जलने के छेद जैसे हो गए हैं। इसकी घटना भी बड़ी ही विचित्र है मार्गेरीटा नाम की एक महिला की सास को मरे करीब 30 वर्ष हो चुके थे। अचानक ही उसकी आत्मा आत्मा बहू के पास आई और कहने लगी मेरी शांति और सद्गति के लिए तुम्हें एक तीर्थ यात्रा तथा दो प्रार्थना सभाओं का आयोजन करना चाहिए।  बहू ने उनकी इच्छाएं और आकांक्षाओं के अनुरूप ऐसा ही किया। आत्मा प्रसन्न चित्त होकर बोली मैंने अब सांसारिक बंधनों को पार कर लिया है और मुक्ति पा चुकी हूं। लंबे वार्तालाप के बाद सास की आत्मा विदा होने लगी तो मार्गेरीटा ने जाने से पहले उससे कोई स्मृति चिन्ह छोड़ जाने का अनुरोध किया, जिसे वह हमेशा देखती रहे। सास ने बहू के निवेदन को स्वीकार किया और पास में रखी प्रार्थना पुस्तिका पर हाथ रख दिए, जिससे वह झुलस गई और उसके कुछ पन्नों में सुराख भी हो गए। संग्रहालय में ऐसी ही अनेक वस्तुओं का संग्रह है।

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