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    भक्त वत्सल ,कमलदल

    राकेश अचल का लेख। सत्तारूढ़ दल कोई भी हो मेरे निशाने पर रहता है। आज भाजपा है ,इससे पहले कांग्रेस थी।  सत्ता प्रतिष्ठान और आश्रम के बीच का ये पुराना रिश्ता है। इस रिश्ते से तमाम भरम भी पैदा होते हैं ,मसलन कि  मै इस दल का समर्थक हूँ या उस दल का विरोधी, हकीकत ये है कि  मै तो आश्रम संस्कृति से आता हूँ, जिसका काम ही राजसत्ता से मुठभेड़ करने का है। बहरहाल आज बात कर रहा हूँ भाजपा की भक्त वत्सलता  की। 

    देश में आज भाजपा के जैसा कोई भक्त वत्सल राजनीतिक दल नहीं है। वैसे भी किसी और राजनीतिक दल के पास भक्त ही नहीं हैं तो किसी और दल का भक्त वत्सल होने का सवाल ही नहीं उठता। भाजपा में चूंकि भक्त हैं इसलिए भाजपा का नेतृत्व भक्त वत्सल है ,और ये स्वाभाविक भी है। भक्त वत्सल होना आसान काम नहीं है। ये रघुवंशियों का गुण है। सबसे पहले त्रेता युग में इसके दर्शन होते हैं। आज कलियुग में तो किसी राजनीतिक दल का भक्त वत्सल होना न केवल अविश्वसनीय है बल्कि प्रशंसनीय भी है। 

    मै भाजपा की रीति-नीति का लाख विरोधी माना जाता होऊं लेकिन हकीकत ये है कि मै भाजपा की भक्त वत्सलता के सामने सदैव नतमस्तक रहता हूँ। हर भारतीय को होना चाहिए। मेरा भाजपा के प्रति आदर कल से और बढ़ गया है जब भाजपा ने 80  साल के धुर कांग्रेसी कैप्टन अमरिंदर सिंह को अपनी पनाह में ले लिया। जाहिर है कि  भाजपा नेतृत्व पर बड़े-बूढ़ों को मार्गदर्शक मंडल में धकेलने का आरोप कैप्टन प्रसंग से मिथ्या प्रमाणित हो जाता है। मुझे लगता है कि  कैप्टन को भाजपा में शरण दी ही इसी वजह से है। 

    इस दशक में कांग्रेस से हताश ,आजिज आये नेताओं को शरण की जरूरत है लेकिन भाजपा को छोड़ किसी दूसरे दल ने कांग्रेसियों के लिए अपने दरवाजे नहीं खोले, या खोले भी तो कोई उन दलों में गया नहीं, शायद किसी के पास पतित पावन होने का फार्मूला नहीं है। कांग्रेस में भष्टाचार से लथपथ रहे तमाम नेता जैसे ही भाजपा में शरणार्थी बन कर आते हैं उन्हें फौरन एक दुपट्टा डालकर शुद्ध कर दिया जाता है। युवा ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया से लेकर बुजुर्ग कैप्टन अमरिंदर सिंह तक के लिए भाजपा का वात्स्लय एक जैसा है। 

    भाजपा की सबसे बड़ी खासियत ये है की वो शरणार्थियों की जाति,उम्र और अतीत पर नहीं जाती। जाना भी नहीं चाहिए. शरणार्थी को शरणार्थी की तरह लिया जाना चाहिए और सम्मान दिया जाना चाहिए। शरणागत का मान -सम्मान करना हमारी सनातन परम्परा है। मर्यादा पुरषोत्तम राम जी ने तो अपनी पत्नी के अपहरणकर्ता रावण के सहोदर भाई बिभीषण तक को शरण दी थी ,शरण ही नहीं दी बल्कि उनका राजतिलक तक कराया था। 

    कलिकाल में किसी भी दल का कोई भी दुखी नेता बिभीषण बनकर भाजपा की शरण में जा सकता है। उससे कोई आधार कार्ड नहीं माँगा जाएगा और शरण दे दी जाएगी। शरणार्थी को संरक्षण बोनस में मिलता है। तोते-मैंने और चीतों से मुक्ति मुफ्त में मिलती है ,अन्यथा श्रीमती सोनिया गाँधी से लेकर तेजस्वी यादव तक इन सबसे नहीं बच पाए। 

    राजनीति में पतित -पवन होने और तोतों-चीतों से मुक्ति पाने के लिए भाजपा की शरण में जाना सबसे सुरक्षित और आजमाया हुआ फार्मूला है। इस फार्मूले का मूल ही है ये है कि आर्तनाद करते हर दल के नेता को दुपट्टा डालकर अपना बना लो ,इससे कम से कम सामने वाले दल की ताकत तो कम होती ही है .इससे सांप भी मरता है और लाठी भी नहीं टूटती, यानि शरणागत को अपनाना परम गांधीवादी रास्ता है .इन दिनों भाजपा से बड़ी गांधीवादी कोई पार्टी मुझे तो देश में दिखाई नहीं देती। 

    भाजपा से चिढ़ने वाले लोग आरोप लगते हैं कि  भाजपा दल-बदल को प्रोत्साहित कर रही है. लेकिन मै कहता हूँ कि  भाजपा का नेतृत्व शरणागत भाव को पाल-पोस रही है। मान लीजिये यदि भाजपा शरणदाता न होती तो बेचारे कैप्टन जैसे लोग चौथेपन में कहाँ भटकते फिरते ? उनकी गति भी लाल कृष्ण आडवाणी जैसी न हो जाती ! कांग्रेस ने यदि भाजपा की तरह भक्त वत्सल होने की कोशिश की होती तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं है की आज कांग्रेस में भी आधे से ज्यादा भाजपाई शामिल हो चुके होते .कम से कम उन्हें एक अनुशासित और कठोर प्रशासक से तो मुक्ति मिलती। 

    बहरहाल मुझे लगता है कि  आने वाले दिनों में तीसरी बार सत्ता कि सिंघासन तक पहुँचने कि लिए भाजपा में शरण ले रहे तमाम दलों कि नए-पुराने आजाद और गुलाम किस्म कि नेता ही सत्ता की सीढ़ी बनेंगे। इन्हीं भगोड़ों की पीठ पर अपने कमलपद रखकर भाजपा कि अवतारी नेतृत्व को सत्ता सिंघासन तक जाने का सुख प्राप्त होगा .इस मामले में कांग्रेस कि नेता वाकई पप्पू हैं ,वे सत्ता सिंघासन तक पहुँचने कि लिए पैदल यात्रा कर रहे हैं .ये उनका तरीका है ,अपुन क्या कह सकते हैं। वे नहीं जानते की सत्ता सिंघासन तक पहुँचने कि लिए पदयात्रा नहीं रथयात्रा करना पड़ती है। 

    लौटकर मूल बात पर आता हूँ कि भाजपा जैसा भक्त वत्तस्ल दुनिया में कोई भी नहीं, न अमेरिका में ,न चीन में और न रूस में, दूसरे लोकों का मुझे पता नहीं ,क्योंकि अभी मै दूसरे लोकों की यात्रा का सुख पा नहीं सका. मुझे लगता है जो कुछ है इसी लोक में है. दूसरे लोकों को जब देखा ही नहीं तो उनका जिक्र भी क्या करना ? आने वाले दिनों में आप देखेंगे कि शरणार्थियों की संख्या में और ज्यादा इजाफा होगा। जिन नेताओं का दम अपनी पार्टी में घुट रहा है वे ऑक्सीजन पाने कि लिए भागते हुए भाजपा में आ ही जायेंगे .'तो कों और ,न मो कों ठौर ' वाली बात है। 

    काश ! भाजपा जैसा विशाल समंदर जैसा दिल दूसरे राजनीतिक दलों का भी होता। राजनीतिक दलों से इस काल में सहृदयता ,सौजन्य और मैत्री भाव तो जैसे तिरोहित ही हो गया है। मैंने वर्षों से सत्ता पक्ष और विपक्ष कि बड़े नेताओं को आपस में गलबहियां डालकर हँसते-खिलखिलाते नहीं देखा। अब ' अहो रूपम .अहो ध्वनि 'का कहीं जिक्र ही नहीं होता। 

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