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    खेल में ध्रुवीकरण चिंताजनक

    राकेश अचल का लेख। किशनगंज जिले के बहादुरगंज विधानसभा से पूर्व विधायक तौसीफ आलम को न आप जानते होंगे और न मै जानता हूँ ,लेकिन उन्होंने जो सवाल भारतीय क्रिकेट टीम के चयन को लेकर उठाये हैं ,वे महत्वपूर्ण हैं। आलम के सवालों पर बहस भी होना चाहिए और जबाब भी मिलना चाहिए, क्योंकि सवाल देश की विविधता को लेकर उठाये गए हैं ,साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को लेकर उठाये गए हैं। 

    तौसीफ आलम ने चयनकर्ताओं पर नाराजगी जताते हुए टीम के चयन को लेकर सवाल खड़े किए हैं। तौसीफ आलम ने फेसबुक पर लिखा है कि जब तक भारतीय टीम में निष्पक्ष चयन नहीं हो जाता तब तक मैं क्रिकेट नहीं देखूंगा। आलम साहब क्रिकेट देखें या न देखें इससे क्रिकेट पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है,किन्तु उन्होंने जो बात कही है वो यदि दूर तक गयी तो क्रिकेट का खेल अवश्य प्रभावित होगा। 

    ऑस्ट्रेलिया में 16 अक्टूबर से शुरू होने वाले आगामी टी20 विश्व कप के लिए भारत की 15 सदस्यीय टीम की घोषणा की है। सोमवार को टीम इंडिया को टी20 वर्ल्ड कप के लिए चुना गया। आलम साहब चयनकर्ताओं के फैसले से स्तब्ध हैं । उन्होंने कहा कि मोहम्मद शमी, मोहम्मद सिराज, खलील अहमद जैसे खिलाड़ियों को टीम में जगह न देना चौंकाने वाला था।

    आपको याद होगा कि तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह और डेथ ओवर एक्सपर्ट बॉलर हर्षल पटेल की चोट से उबरने के बाद ऑस्ट्रेलिया में 16 अक्टूबर से शुरू होने वाले आगामी टी20 विश्व कप के लिए भारत की 15 सदस्यीय टीम में वापसी हुई है। इस विश्व कप में भारत अपना पहला मैच 23 अक्टूबर को पाकिस्तान के खिलाफ मेलबर्न क्रिकेट मैदान में खेलेगा। आवेश खान और रवि बिश्नोई हालांकि विश्व कप की 15 सदस्यीय टीम में जगह बनाने से चूक गए। बिश्नोई की जगह ऑफ स्पिनर रविचंद्रन अश्विन को तरजीह दी गयी।

    क्रिकेट के बारे में मेरी जानकारी एक आम दर्शक से ज्यादा नहीं है लेकिन एक पत्रकार के रूप में क्रिकेट की राजनीति से मै बाखूबी वाकिफ हूँ .क्रिकेट में राजनीति कोई नयी बात नहीं है लेकिन नई बात ये है कि अब क्रिकेट में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण किया जा रहा है. सत्तारूढ़ दल ने जिस तरह से संसद के दोनों सदनों को मुस्लिम शून्य कर दिया है उसी तर्ज पर अब भारतीय क्रिकेट टीम को मुस्लिम शून्य करने की कोशिश की जा रही है .आलम के आरोपण में यदि दम है तो  ये बेहद खतरनाक बात है। खेल की दुनिया में जाति-धर्म कभी देखा ही नहीं गया .लेकिन अब लगता है कि इसकी भी शुरुवात हो चुकी है। 

    लगभग 96  साल के भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष पद पर शुरू से लेकर अब तक जितने खिलाड़ी आये हैं उससे कुछ ही कम नेता आये हैं.उद्योगपतियों ने भी इस बोर्ड में अपनी जगह बनाई है,क्योंकि क्रिकेट का खेल शौहरत के साथ ही दौलत से भी बाबस्ता रहा है. माधव राव सिंधिया हों या शरद पवार या आज के अनुराग ठाकुर सभी ने क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की कमान सम्हाली है लेकिन ये आरोप तब लग रहे हैं जब बोर्ड की कमान एक अनुभवी और प्रतिष्ठित खिलाडी सौरभ गांगुली के हाथ में है। मुस्लिम खिलाड़ियों के चयन के पीछे क्या गांगुली का भी हाथ है ? 

    लगता है कि इस देश में पिछले दरवाजे से मुस्लिमों को धीरे-धीरे सियासत के बाद खेल जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों से अलग किया जा रहा है. मुस्लिमों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाने की एक अघोषित सी मुहिम चलाई जा रही है। दुर्भाग्य ये है कि इस बारे में कोई बोलने को राजी नहीं है। आलम जैसे पूर्व विधायकों की आवाज तो तूती से भी गयी -बीती है। क्रिकेट में राजनीती से नहीं खेल भावना से काम चलाता आया है. भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तानों की सूची उठाकर देख लीजिये 2014  से पहले इस देश की टीम की कप्तानी एक बार नहीं बल्कि कई बार मुस्लिम खिलाड़ियों के हाथ में सौंपी गयी,क्योंकि पूर्व में खिलाड़ियों को खिलाड़ियों की तरह ही देखा गया। हिन्दू-मुसलमान की नजर से नहीं। 

    आजादी से ठीक पहले इफ्तिखार खान  पटौदी भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान थे,उनके बाद गुलाम अहमद,मंसूर अली खान पटौदी, और मोहम्मद अजहरुद्दीन भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रहे .मुस्लिम खिलाड़ियों की संख्या तो बहुत रही .खिलाड़ियों के चयन में हिन्दू  -मुसलमान हुआ ही नहीं ,हुआ भी होगा तो उसे लेकर कभी कोई चर्चा नहीं हुई. आलम न बोलते तो मुमकिन है कि आज भी इस साम्प्रदायिक हस्तक्षेप पर कोई चर्चा न होती .लेकिन अब चर्चा शुरू हो गयी है। आज आलम बोले हैअन,कल कोई और बोलेगा,परसों कोई और .इसलिए जरूरी है कि स्थिति को स्पष्ट किया जाए। 

    दुनिया के दूसरे देशों में भी क्रिकेट की राजनीति होती रही है और इसका खमियाजा उस देश को भुगतना भी पड़ रहा है .खतौर पर ऑस्ट्रेलिया को ही देख लीजिये। दुनिया की तमाम क्रिकेट टीमों में अल्पसंख्यक ,ही नहीं बल्कि गोरों के साथ काले भी खेलते आये हैं,खेल रहे हैं.उन्हें जाति-धर्म के नाम पर नहीं चुना गया .यदि हमारे यहां आया हो रहा है तो इसे तत्काल रोका जाना चाहिए। कम से खेलों को  तो साम्प्रदायिकता की सियासत से महफूज रखा जाना  चाहिए .खेल ही हैं जो देश की प्रतिष्ठा को दुनिया में बढ़ाते हैं। आप इस बारे में क्या सोचते हैं,मुझे नहीं पता,लेकिन आपको भी इस विषय को लेकर सोचना चाहिए। इस विषय की  अनदेखी नहीं की जा सकती। 

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