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    प्रतापगढ़। प्रतापगढ़ के छोटे से गांव में हुआ था स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जन्म, बचपन मे ही बन गए थे सन्यासी।

    प्रतापगढ़। आठ साल की उम्र में दीक्षा लेने वाले अविमुक्तेश्वरानंद को वैदिक मंत्रोच्चार के साथ सोमवार को ज्योतिषपीठ की कमान मिली है । वह जिले के पट्टी तहसील के बाभनपुर गांव के रहने वाले हैं।  2 दिन पहले द्वारका शारदा और ज्योतिर्मठ बद्रीनाथ पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद उनके पार्थिव शरीर के समक्ष ही यह ऐलान किया गया कि अविमुक्तेश्वरानंद जी ज्योतिषपीठ बद्रीनाथ के कमान संभालेंगे ।

    पट्टी तहसील के बाभनपुर गांव के निवासी स्वर्गीय राम सुमेर पांडे के दो बेटे गिरजा शंकर पांडे व उमा शंकर पांडे तथा छह बेटियां हैं।  उमाशंकर पांचवे नंबर पर थे उनका जन्म 15 अगस्त 1969 को हुआ था । वह बचपन से ही बहुत कुशाग्र बुद्धि के थे कक्षा 6 तक की पढ़ाई गांव से ही किया।  उनकी माता का नाम अनारा देवी था ।

    राम सुमेर पांडे ने आगे की पढ़ाई के लिए उमाशंकर को बाहर भेजने का निर्णय लिया इसी बीच उनका निधन हो गया । यहां उनका संपर्क गुजरात स्थित काशी मंदिर में रहने वाले रामचैतन्य  से हुआ । कई बार उनके साथ बैठकर पंडित राम सुमेर सत्संग किया करते थे । एक बार उमाशंकर को भी लेकर मंदिर पहुंचे कई दिनों तक वहां रहे । फिर बेटे उमाशंकर को राम चैतन्य के पास छोड़ दिया, यहीं रहकर उमाशंकर पूजन पाठ और पढ़ाई करने लगे। 5 साल तक पढ़ाई करने के बाद वह काशी पहुंचे। काशी में ही उमाशंकर स्वामी करपात्री महाराज जी के संपर्क में आए और उन्हीं के पास रहने लगे यही उनकी भेंट स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी से हुई इसके बाद उन्होंने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से पढ़ाई किया वर्ष 2000 में उन्होंने स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से दीक्षा ली और उनके शिष्य बन गए फिर उमा शंकर पांडे से वह स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बन गए।

    108 घंटे ज्ञानवापी परिसर में किया था आमरण अनशन

     स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के ज्योतिष पीठ की कमान मिलने के बाद ग्रामवासियों में काफी हर्ष देखा जा रहा है । इसके पहले 4 जून 2022 को ज्ञानवापी परिसर में उन्होंने पूजा का ऐलान किया था और जब पुलिस प्रशासन ने उन्हें ऐसा करने के लिए रोक दिया तो वह 108 घंटे तक अनशन करते रहे और अन्न जल त्याग दिया था उसके बाद जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी के कहने पर उन्होंने फिर से अन्य जल ग्रहण किया था।

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