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    अनीति की राजनीति का नया अध्याय

    राकेश अचल का लेख। सत्ता हथियाने के लिए अनीति की राजनीति को प्रमुख हथियार मानने वाली भाजपा को इसी औजार ने बिहार में औंधे मुंह पटक दिया। भाजपा के लिए ये झटका भी है मुंह में फांसी छंछून्दर का अचानक मुंह से बाहर निकल जाना भी है। गठबंधन की गांठें अब धीरे-धीरे खुल रहीं हैं। गठबंधन के लिए ये कोई नयी स्थिति नहीं है। पहले भी ये होता रहा है और आगे भी ये होता रहेगा। 

    भारतीय राजनीति में अनैतिकता की बैशाखियों के सहारे लगातार आठ बार मुख्यमंत्री बनने का कमाल केवल नीतीश कुमार के खाते में दर्ज हो रहा है। वे अब ' सुशासन बाबू ' नहीं बल्कि ' अनैतिक शासन बाबू ' के खिताब से नवाजे जा सकते हैं। नीतीश को लेकर बिहार के जनमानस में कोई सम्मान न पहले था और न आज होगा। लेकिन वे मुख्यमंत्री थे ,और आगे भी बने रहेंगे ,इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। उन्होंने सत्ता के लिए रोज नए गठबंधन बनाने और तोड़ने में अपने समकालीन दलित नेता स्वर्गीय रामविलास पासवान का कीर्तिमान भी भंग  कर दिया। 

    अनैतिकता अब लज्जा का विषय नहीं है। कसी भी दल के लिए नहीं है। कांग्रेस से अनैतिकता की जो ' गुप्त गंगा '  बाहर निकली थी वो अब सार्वजनिक हो चुकी है। सबने इस अनैतिकता की पतिति पावनि गंगा में समय-समय पर डुबकियां लगाई हैं। यानि अब ' तेरी कमीज ,मेरी कमीज से ज्यादा उजली ' का विवाद हमेशा के लिए समाप्त हो गया है। अब सब हमाम में नंगे  हैं ,और इन्हीं नंगों के साथ देश,प्रदेश की जनता से निर्वाह करना है। ' लोक ' की इस खेल में कोई भूमिका नहीं बची है। एक बार जनादेश नेताओं के हाथ में आ गया तो वे इसे जब चाहे तब और जहाँ चाहे तहाँ बेच सकते हैं,खरीद सकते हैं। 

    देश की आजादी के अमृत काल में अनैतिक राजनीति के इस सबसे बड़े प्रदर्शन ने सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर बीते 75  साल में हमने लोकतंत्र की जड़ों को सींचा है या उनमने मठ्ठा डाला है ? बिहार में नीतीश के सत्ता में रहने से लोकतंत्र की सेहत पर कोई ख़ास फर्क पड़ने वाला नहीं है। कुर्सी तो चंदन का पेड़ है ,उससे चाहे जितने और चाहे जैसे भुजंग लिपटे रह सकते हैं। भुजंगों के लिपटने से कुर्सी का कुछ नहीं बिगड़ता। कुर्सी सास्वत है,सत्य है। मै इस मामले में एकदम भावुक नहीं हूँ। किसी को भी भावुक नहीं होना चाहिए ,क्योंकि अब सियासत भावुकता का नहीं बल्कि निर्ममता का खेल बन चुका है। मुमकिन है कि  बहुत से मित्र मेरी इस बात से इत्तफाक न रखते हों ,किन्तु है ये एक कड़वी हकीकत। 

    कांग्रेस के पांच दशक के अधिक लम्बे शासनकाल में अनैतिकता के ऊपर एक पारदर्शी आवरण जरूर था,अब ये पूरी तरह नग्न हो चुकी है। आठ साल में अनैतिकता ने निवस्त्र होकर रहना सीख लिया है। देश की राजनीति को नई दिशा देने का दम्भ भरने वाली  भाजपा भी अपने आपको अनैतिकता के इस मकड़जाल से बचा नहीं पायी।  नैतिकता का चमीटा तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के साथ ही कहीं खो गया। अब अनैतिक  सत्ता को छूने के लिए भाजपा ही क्या,किसी भी दल को किसी चमीटे की जरूरत नहीं है। बच्चे सवाल कर सकते हैं कि ' नैतिकता होती किस खेत की मूली है ?'

    मेरी चिंता बिहार की राजनीति नहीं ,देश की राजनीति है। देश की राजनीति को सत्तारूढ़ दल ही दिशा देते आये हैं |कल तक जो काम कांग्रेस के हाथ में था वो ही काम आज भाजपा के हाथ में है। मुझे आशंका है कि अगला आम चुनाव आने से पहले सियासत की अनैतिकता कहीं और भयावह न हो जाये। इस आशंका की वजह है, अब राजनीति में नैतिकता की बात करने वाला कोई नैतिक चरित्र दिखाई ही नहीं दे रहा। जो शेष बचे भी हैं ,उनके हाथ में कुछ बचा नहीं है। महात्मा गाँधी,से लेकर महात्मा नरेंद्र मोदी जी के देश से नैतिकता आखिर चली कहाँ गयी ? क्यों चली गयी ?

    मुझे याद आता है कि कांग्रेस के जमाने में जनादेश को खारिज करने के लिए अक्सर चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त करने के लिए राष्ट्रपति शासन का सहारा लिया जाता था। सत्तारूढ़ दल या केन्द्रीय सरकार की सलाह पर, राज्यपाल अपने विवेक पर सदन को भंग कर सकते हैं, यदि सदन में किसी पार्टी या गठबन्धन के पास स्पष्ट बहुमत ना हो, तो उस अवस्था में राज्यपाल सदन को 6 महीने की अवधि के लिए ‘निलम्बित अवस्था' में रख सकते हैं। 6 महीने के बाद, यदि फिर कोई स्पष्ट बहुमत प्राप्त ना हो तो उस दशा में पुन: चुनाव आयोजित किये जाते है. अधिकतम 3 वर्षों तक बढ़ाया जा सकता है। भाजपा ने इस तरीके का इस्तेमाल अपवाद के तौर पर किया। भाजपा ने देश के राजनीतिक दलों को सिखाया कि जनादेश को लंगड़ा करने से बैहतर है उसे जस का तस अपह्रत कर लेना। इस तरीके में संविधान का नहीं पैसे का इस्तेमाल होता है। और संयोग से आज किसी भी सत्तारूढ़ दल के पास पैसे की कमी नहीं है। 

    आजादी के 75वे साल में देश के पास एक से बढ़कर एक ' जगत सेठ ' हैं ,जो सत्ता की खरीद-फरोख्त में राजनीतिक दलों कि खुले दिल से इमदाद करते हैं। हर युग में इन जगत  सेठों का बोलबाला होता आया है ,लेकिन ये समय उनके लिए स्वर्णकाल है। जगत सेठ जिला पंचायत से लेकर केंद्र तक की सरकार के लिए खरीद-फरोख्त करते हैं। बिना व्याज का पैसा देते है  और अपने ढंग से उसकी वसूली भी कर लेते हैं। कल महाराष्ट्र में ये हो चुका है,आज बिहार में हुआ है। कल किसी और प्रदेश में होगा। कोई संविधान इसे रोक नहीं सकता। कोई अदालत इसकी मुश्कें बाँध नहीं सकतीं। 

    बिहार के घटनाक्रम का लब्बो-लुआब इतना भर  है कि अब देश में मोदी अजेय नहीं रहने वाले। उनके सामने अनैतिकता के सहारे लोहा लेने वाले लोग अभी भी हैं। अर्थात केर-बेर का संग की सियासत अभी और चलने वाली है। पिछले कुछ वर्षों में अनैतिकता की सियासत के चलते देश में विपक्ष जितना क्षीण हुआ है ,उसकी कोई मिसाल पिछले इतिहास में तो नहीं मिलती। 2014  के बाद के सियासी इतिहास में और क्या -क्या नया दर्ज होगा अभी कहा नहीं जा सकता। इस अभिशप्त देश को अब नैतिकता के बजाय अनैतिकता के सहारे जीने की आदत दाल लेना चाहिए। क्योंकि अब राजनीति की बिल्लियां ही नहीं बिलौटे भी बुरी तरह खिसियाये हुए हैं। वे खम्भा नौंचेगे ही नहीं अपितु उन्हें गिरा भी सकते हैं। 

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