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    अयोध्या। अयोध्या में सावन झूला मेला चल रहा हैं, किंतु सावन में लोग झूला झूलने को तरस रहे हैं।

    ......... नाग पंचमी के अवसर पर भी पारंपरिक कजरी गीत गायब, नहीं पड़े डालो पर झूले

    देव बक्स वर्मा\अयोध्या। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की धर्मनगरी अयोध्या का सावन झूला मेला बहुत प्रसिद्ध  है! जो सावन के शुक्ल पक्ष तृतीया से मणि पर्वत से विभिन्न मंदिरों के विग्रह रूप में भगवान राम और सीता झूला झूलने के साथ  अयोध्या का प्रसिद्ध झूला मेला चल रहा है उसी रामनगरी में अब सावन के कजरी गीत गायब होते जा रहे हैं। यहां तक की नाग पंचमी के अवसर पर भी पारंपरिक कजरी गीत और डालो के झूले विलुप्त से लग रहे हैं गांव और शहर में पड़ने वाले डालो पर झूले भी नदारद लग रहे हैं। 

    झूलों के नदारद होने से और कजरी गीत गायब होने से अब पारंपरिक सावन महीने का एहसास नहीं हो पा रहा है! वहीं दूसरी तरफ सावन के महीनों में खेतों में ताल तलैया सूखे पड़े हैं खेतों में धान की फसलें पानी मांग रही है ! एक दौर था जब सावन शुरू होते ही बारिश की फुहारों के संग पेड़ों पर झूले व कजरी गीतों की मिठास पूरे वातावरण में गूंज जाया करती थी! लगता था कि सावन आ गया है लेकिन अब ऐसा नहीं है  सावन बीत  रहा है लेकिन ना कहीं झूला पड़ा और ना ही कहीं कजरी के गीत सुनाई दे रहे हैं !यानी प्राचीन रीति रिवाज व परंपराएं विलुप्त होती जा रही है! पहले गांव की लड़कियां सावन लगते का इंतजार करती थी! सावन आते ही हर घर बाग में झूला डाल कर सब झूला झूलती थी और कजरी के गीत गाती थी! महिलाएं गाती थी !

    झूला पड़ा मनी पर्वत पर !

    झूले जनक दुलारी नाय!!

    समय बदलता जा रहा है  परंपराएं बदलती जा रही है  शिष्टाचार खत्म होता जा रहा है  संस्कार विलुप्त होता जा रहा है  ऐसे में अब  पुरानी परंपराओं की आस रखना  बेईमानी जैसी लग रही है। परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है पहले देखा जाता था की रस्सी के सहारे पाटा लगाने वाले  हैंग रखकर महिलाएं उस पर बैठती थी और दो पुरुष दोनों तरफ रस्सी के सहारे  पेग  मारते थे और झूला काफी ऊंचाई तक जाता था! गांव की लड़कियां नई नवेली दुल्हन हास परिहास के साथ मनोरंजन किया करती थी। 

    यही नहीं खेतों में काम करने वाली महिलाएं मजदूर भी कजरी गीत गाकर  बैरन लगाती थी धान की निराई करती थी कजरी गीत गाती थी आज झूला और कजरी बीते जमाने की बात लग रही है! ननंद भौजाई का रिश्ता भी नदी के दो किनारों की तरह हो गया है!  पहिले प्रेम घर में ही नहीं आस-पड़ोस में हुआ करता था! टोला भर की लड़कियां एक जगह इकट्ठा होकर झूले पर झूलते समय कजरी गीत गाती थी! आज यह प्रेम और झूला कहीं नहीं दिखाई पड़ रहा है! कजरी तो दूर कई घरेलू परंपराएं भी विलुप्त होती जा रही है! पहले संयुक्त परिवार था एक परिवार में 10 लोग थे! सब एक जगह मिलकर बैठकर बातें करते थे! हास परिहास करते थे! अब संयुक्त परिवार टूट रहा है! एकांगी परिवार के पास लोक परंपराओं को निभाने का समय ही नहीं है! हर कोई नमक तेल लकड़ी में फंसा हुआ है! 99 का चक्कर उसे दबाए है! उसे खंजड़ी ढोल बजाकर भजन गीत गाने की फुर्सत नहीं है! भागम भाग जीवन में मचा है तो गांव में कजरी के लिए माहौल कैसे बन पाएगा यह सोचने की बात है! गांव की परंपराएं जिस तरह से गायब होती जा रही है आने वाले समय के लिए बहुत शुभ संकेत नहीं है। 

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