Header Ads

  • INA BREAKING NEWS

    पुस्तक समीक्षा। ब्रज की भूमि आगरा।

    शाह प्रीत 

    पुस्तक समीक्षा। आगरा मुगल नहीं ब्रजभूमि है' अपने शीर्षक में ही सारतत्व दर्शाने वाली पुस्तक है। इसे मैंने न केवल प्रकाशित होने के बाद पढ़ा है। बल्कि जब इस पर शोधकार्य चल रहा था, तब से ही इससे बिंदुवार जुड़ाव है मेरा। कहना न होगा कि पुस्तकबद्ध करने वाली लेखनी को थामने वाला हाथ मेरी परमप्रिय सखी सुश्री भावना वरदान शर्मा जी है। जो कि आगरा में निवास करती हैं। बल्कि उनका ननिहाल भी आगरा में रहा है। जिस कारण उनका बाल्यपन भी आगरा के भौगोलिक, सामाजिक एवं ऐतिहासिक ज्ञान से समृद्ध हुआ है। 

    जैसा कि लोक में व्याप्त है। ताजमहल और लाल किला आदि तमाम धरोहरों को लेकर बात की जाती रही है। कुटिलता से आगरा को मुग़लों की देन घोषित कर दिया गया। यह न केवल लोक में बल्कि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में, डॉक्यूमेंट्री कार्यक्रमों में, सोशल मीडिया में एवं जितने भी प्रचार-प्रसार के माध्यम हो सकते थे; भलीभाँति इसे जनमानस में व्याप्ति दी गयी। 


    इस भ्रांति को दूर करने का दुस्साहस भावना वरदान शर्मा ने किया, वह सराहनीय है। अपने व्यवसायिक व व्यवहारिक जीवन के बाद लेखिका का रुझान अपनी जानकारी को शब्दबद्ध कर प्रकाशित करने का मन हुआ। परिणामस्वरूप यह पुस्तक आज हम सबके सामने है। प्रथम शताब्दी के दृढ़ प्रमाण देते हुए आगरा के स्वरूप का वर्णन किया। कनिष्क के शासनकाल की। जिसमें ब्राह्मी लिपि के अभिलेख प्राप्त हुए।

    द्वितीय व तृतीय शताब्दी में शताब्दी में पुरातत्वविदों द्वारा मौर्यकाल के मिट्टी के पात्रों का प्रमाण ज्ञात हुआ। चतुर्थ शताब्दी में गुप्त वंश के शासनकाल में चौकोर जलारूधारी शिवलिंग की प्राप्ति बहुत कुछ सोचने पर विवश कर देती है। 

    आगरा के चारों कोनों पर शिवालय स्थापित होना बिना कहे ही सब कुछ कह जाता है। स्वामी वल्लभाचार्य की जीवनयात्रा में आगरा विशेष महत्व रखता है। सनातन के ध्वजवाहक चैतन्य महाप्रभु ने कृष्णलीलाओं के विस्तार में आगरा को चिन्हित किया। यमुना नदी जिसे भगवान श्री योगेश्वर कृष्ण के जुड़ाव को भारत का जन-जन जानता है। कितने ही आक्रमण हुए किन्तु अब भी ऐसे स्थल शेष थे जिन्हें मुगल छू नहीं पाए और वे अपनी संस्कृति की पताका लहराते हुए अक्षुण्ण रहे। 

    अकबर, जहांगीर, शाहजहां, बाबर, हुमायूं, सिंकदर लोदी, अब्राहिम लोदी, सैयद वंश के ख़िज्र ख़ां, बहलोल लोदी, निज़ाम खां सबने अपने-अपने शासनकाल में आगरा की पुण्यभूमि को क्षति पहुंचाई और अपने सत्ता का परचम लहराकर भारतीय संस्कृति का मूल उखाड़ने की हरसंभव कोशिश की। 

    लेखिका स्पष्ट रूप से कहतीं हैं कि आगरा ब्रज की संस्कृति में रचा-बसा नगर है। जिसे लोक स्वीकारना तो दूर, सोचना भी नहीं चाहता। यही पीड़ा लेखिका के मन में जन्मीं और वे इन तथ्यों को पुस्तकबद्ध करने को प्रेरित हुयीं। 

    पुस्तक में लेखिका ने ११वीं, १२वीं, १३वीं शताब्दी के मन्दिरों का प्रमाण चित्रित किया है। ततपश्चात महमूद ग़ज़नवी के आक्रमण व रज़िया सुल्तान की बात कही। प्रमाणिकता के लिये इब्नबतूता की भारत यात्रा का संदर्भ लिया गया है। 

    लेखिका ने बात की है प्राचीन निर्माण की, जिनमें मन्दिर, घर, छत, कंगूरे, द्वार, आंगन, खम्बे, गलियां व गौशाला सहित कई बनावट पर मात्र और मात्र शुद्ध भारतीयता के वास्तुकला का ही चिन्ह मिला। सनातनी पर्वों पर द्वार पर तोरण बांधने के भी खूंटे देखे गए। जो कि भारतीय परंपरा का ही अंश हैं। 

    पुस्तक में कई जानकारियां लेखिका ने कठिन शोध के बाद जुटाई हैं। और भी जो पुस्तक पढ़ने से रुचिकर लगेगी। अवश्य ही इसे पढ़ना चाहिए। 

    पुस्तक प्रकाशित की है डायमण्ड बुक्स प्रकाशन ने। पुस्तक की कीमत है कुल 150 रुपया जो कि एक पाठक की जेब से मेल खाती है। पुस्तक का संपादन श्री गौरव शर्मा ने किया है। स्वयं लेखिका सोशल एक्टिविस्ट हैं। कवयित्री हैं। उनकी कविताएं आकाशवाणी व प्रिंट मीडिया से प्रकाशित-प्रसारित होतीं हैं। पुस्तक ऐतिहासिक ज्ञान संजोने वालों के लिये उत्तम है। एक भारतीय के लिये अपरिहार्य पुस्तक भी कहूँ तो अतिश्योक्ति न होगी। 

    इसलिये अपनी प्रति बुक करके पढ़िए। पढ़कर मित्रों को अग्रेषित कीजिये। अपनी पुस्तकालय को समृद्ध कीजिये। अपने ज्ञान को समृद्ध कीजिये। 

    और हाँ! 

    कहीं भी परिचर्चा में यह कहने में सकुचाईयेगा नहीं कि,

    आगरा मुगल नहीं ब्रजभूमि है। 

    वंदेमातरम!  जयहिंद!

    Post Top Ad


    Post Bottom Ad


    Blogger द्वारा संचालित.