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    अयोध्या। कनक भवन में महाराज विक्रमादित्य द्वारा संरक्षित शिलापट्ट देते है गवाही।

    •  जरासंध के वध करने के बाद अयोध्या आये थे भगवान श्रीकृष्ण
    • महाराज विक्रमादित्य के पूर्व कनक भवन का कराया था जीर्णोद्धार

    अयोध्या। योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव रामनंगरी में हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। पूरी राम नगरी जय श्रीराम और हरे कृष्णा राधे राधे के उद्घोष से गूंज रही है। मंदिरों में जगह जगह बस एक ही स्वर सुनाई दे रहा है जग में सुंदर हैं दो नाम- चाहे कृष्ण कहो या राम’ भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भले ही मथुरा में हुआ हो लेकिन अयोध्या से  उनका काफी गहरा रिश्ता रहा है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण कनक भवन में महाराज विक्रमादित्य द्वारा संरक्षित शिलापट्टों में देखा जा सकता है। धार्मिक शास्त्रों में दर्ज है कि माता सीता को कनक भवन माता कैकई ने मुंह दिखाई में दिया था। इस मंदिर में श्रीराम और माता सीता स्वर्ण मुकुट पहने विराजित हैं। इसे सोने का घर भी कहा जाता है। यह मंदिर कुछ सौ दो सौ या हजार साल ही नहीं, बल्कि पांच हजार साल पुरानी सभ्यता का प्रतीक है।

    रामलला के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास बताते हैं कि राम और कृष्ण का एक दूसरे के साथ सास्वत संबंध है। दोनों भगवान विष्णु के अवतार के पुरुष हैं। आचार्य सत्येंद्र दास बताते हैं कि पूरे जग में दो ही नाम चलते हैं। एक तो भगवान राम और दूसरे भगवान कृष्ण। इन दोनों ने राक्षसों के नाश के लिए पृथ्वी पर अवतार लिया था।

    इतिहास बताता है कि करीब 2 हजार वर्ष पूर्व महाराजा विक्रमादित्य ने भी कनक भवन का जीर्णोद्धार कराया था। उस दौरान उन्होंने शिलापट्टों को संरक्षित करवाया था। संरक्षित शिलापट्टों को देखें तो साफ पता चलता है कि भगवान श्री कृष्ण जरासंध का वध करने के बाद पत्नी रुक्मिणी के साथ अयोध्या आए थे। इस दौरान उन्होंने कनक भवन को देखा, जो एक टीले की शक्ल में सिमट कर रह गया था। शिलापट्टों पर लिखे श्लोकों से स्पष्ट हो जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस शिला पर आनंद का अनुभव किया। इसके बाद उन्होंने कनक भवन के जीर्णोद्धार कराने का फैसला किया था।उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से यह जान लिया कि इसी स्थान पर कनक भवन व्यवस्थित था। योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने योग-बल द्वारा उस टीले से श्रीसीताराम के प्राचीन विग्रहों को प्राप्त कर वहां स्थापित कर दिया। दोनों विग्रह अनुपम और विलक्षण हैं। इनका दर्शन करते ही लोग मंत्रमुग्ध होकर अपनी सुध-बुध भूल जाते हैं।

    बता दे कि कनक भवन में जिस स्वरूप के दर्शन होते हैं  इसका पुनर्निर्माण 1891 में ओरछा की रानी ने कराया था। इसके पहले 2000 साल पहले सम्राट विक्रमादित्य ने इसका स्वरूप सुधरवाया था। जो कि हजारों साल तक यूं ही बिना किसी क्षति के खड़ा रहा। वहीं, पौराणिक मान्यता के अनुसार, कनक भवन राजा दशरथ ने रानी कैकेई को प्रदान किया था। जिसे बाद में रानी कैकेई ने यह भवन माता सीता को मुंह दिखाई में दिया था।

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