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    राम के बाद गणेश पर नजर।

    राकेश अचल का लेखसत्ता केलिए रामाश्रय लेने वाली भाजपा को नमन कीजिये। भाजपा अब महाराष्ट्र में स्थायी रूप से सत्तारूढ़ बने रहने के लिए देवाधिदेव भगवान गणेश ही शरण लेने जा रही है। भाजपा का अपना अनुभव है कि  सियासत तक पहुँचने के लिए जनादेश से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण देवी-देवताओं का आशीर्वाद है। 

    भाजपा की राजनीति में दूसरे सरदार बल्लभ भाई पटेल की तरह लौहपुरुष का अभिनय करने वाले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को लगता है कि अब लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का भी अभिनय करना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि महाराष्ट्र में उनकी प्रतिद्वंदी शिव सेना की असल शक्ति गणेश उत्सव हैं। इसलिए इस बार वे ग्यारह दिन तक चलने वाले इस महापर्व के मौके पर महाराष्ट्र में डेरा डालेंगे। 

    कहने को तो अमित शाह हर साल गणेश चतुर्थी समारोह के लिए मुंबई जाते हैं। इस बार भी वे 5 सितंबर को मुंबई दौरे पर जाने वाले हैं। लेकिन इस बार शाह की मुंबई यात्रा के कई मायने भी निकाले जा रहे हैं। वे इस दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक कर सकते हैं। हालांकि शाह की इस यात्रा का जो प्रमुख राजनीतिक एजेंडा होने वाला है वह है बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के आगामी चुनाव है .आपको बता दूँ कि गणेश उत्सव 31 अगस्त से 9 सितंबर के बीच मनाया जा रहा है।

    महाराष्ट्र में गणेशोत्सव मनाने की परम्परा पुरानी है। सत्रहवीं शताब्दी में शिवाजी कि शासनकाल में 1630  से 1680  तक ये उत्स्व राजाश्रय में मनाया जाता था। उन्नीसवीं सदी में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1890  में इस उत्सव कि माध्यम से अंग्रेजों कि खिलाफ एक लोक चेतना जाग्रत की थी। आजादी कि बाद शिवसेना ने इसे अपना आधार बना लिया .अब इसी उत्सव पर भाजपा की नजर है। 

     दरअसल अमित शाह जी की नजर दूर तक देखती है। शाह अगले 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव के रोडमैप पर तो अभी से मगजमारी कर ही रहे हैं ,साथ ही वे  बीएमसी चुनावों पर भी  फोकस करेंगे। बीएमसी के 227 वार्डों पर चुनाव होना है। राज्य के भाजपा नेताओं के साथ उनकी बैठक का उद्देश्य दुनिया की सबसे अमीर नगपालिका यानी बीएमसी की लड़ाई में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना का मुकाबला करने के लिए कैडर को सक्रिय करना है। ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर रुका हुआ चुनाव जनवरी-फरवरी 2023 में होने की संभावना है।

    भाजपा को लगता है कि  महाराष्ट्र  में यदि शिवसेना को कांग्रेस की तरह गहरी पैठ  बैठाना है तो प्रदेश में होने वाले गणेशोत्सवों को माध्यम बनाना ही होगा। वे खुद इस बार लालबागचा राजा [मुंबई के सबसे पुराने गणेश मंडलों में से एक] की पूजा करने के लिए जाने का कार्यक्रम बनाये बैठे हैं। गौरतलब है कि  आगामी लोकसभा चुनाव कि लिए भाजपा को महाराष्ट्र जीतना बहुत आवश्यक है,क्योंकि हाल ही में भाजपा बिहार गंवा चुकी है। भाजपा की असल ताकत हिंदी भाषी राज्यों में ही निहित है। 

    महाराष्ट्रा में बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव कि जरिये ब्राम्हणों और गैर ब्राम्हणों को अंग्रेजों कि खिलाफ एकजुट किया था। उनके प्रयासों से पूरे महाराष्ट्र में गणेशोत्सव गांव-गांव तक मनाया जाने लगा था। इस प्रयोग कि जरिये बाल गंगाधर तिलक ने अंग्रेजों की जड़ें हिला दी थीं। अब भाजपा को लगता है की वो भी इस उत्सव कि जरिये शिवसेना की जड़ें हिला सकती है। महाराष्ट्र में गणेशोत्सव एक धार्मिक त्यौहार नहीं है ,आप इसे एक लोकोत्सव कह सकते हैं। इस उत्सव कि ग्यारह दिन में महाराष्ट्र की जनता सरे भेदभाव भूलकर एक दिखाई देती है। 

    महाराष्ट्र का इतिहास गवाह है कि  यहां बीएमसी किसी भी राजनीतिक दल कि लिए कामधेनु की तरह काम आती है। शिवसेना ने पिछले 30 वर्षों भाजपा के साथ गठबंधन में और बाद में स्वतंत्र रूप से बीएमसी का नियंत्रण  अपने पास रखा है। अब महाराष्ट्र सीएम एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद शिवसेना काफी कमजोर हो गयी है, ऐसे में उद्धव ठाकरे के लिए बीएमसी की राह आसान होने वाली नहीं है। भाजपा इसका पूरा लाभ उठाने के प्रयास में है। बीएमसी को हासिल किये बिना शिवसेना को समूल नष्ट नहीं किया जा सकता। 

    राजनीति में धार्मिक स्वरूप  में छिपी शक्ति का इस्तेमाल सबसे पहले भाजपा ने ही किया था. 1990  से पहले इस देश में केवल भगवान जगन्नाथ की यात्रा को जानते थे किन्तु 1990 में पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा (जिसे बिहार में ही रोक दिया गया था) ने देश की राजनीति की तस्वीर ही बदल दी थी | सत्ता हासिल करने  के भाजपा के  आंदोलन का 'टर्निंग प्वाइंट' थी ये रथ यात्रा । इस यात्रा ने न सिर्फ भाजपा को फर्श से अर्श तक पहुंचाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई बल्कि राम मंदिर के निर्माण का पथ भी प्रशस्त किया।

    अब लगता है कि इसी अतीत का सहारा लेकर भाजपा महाराष्ट्र में गणेशोत्सव को अपना हथियार बनाकर मानेगी। भाजपा ने इसी तर्ज पर पिछले दिनों उड़ीसा में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा कि दौरान शाह को उड़ीसा भेज चुकी है। खैर अब जो होगा,सो होगा। हम भी शाह कि पीछे-पीछे महाराष्ट्र जाकर इस बात पर नजर रखेंगे कि  क्या वास्तव में राम कि बाद गणेश जी को राजनीति कि लिए इस्तेमाल किया जा सकता है ? क्योंकि गणेश तो गणेश हैं। देश में उनके मंदिर को लेकर कहीं कोई विवाद नहीं है। वे हर रूप में पूज्य हैं,चाहे मिटटी कि हों या गोबर के , गणेश अहमन्यता से दूर रहने वाले देवता हैं। दुनिया जानती है कि गणेश परिक्रमा का आशय क्या होता है ? 

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