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    ब्राम्हणवाद का पुनर्जागरण।

    राकेश अचल का लेख। सोये हुए ब्राम्हण जाग रहे हैं या उन्हें जगाया जा रहा है ? देश में पिछले दिनों तीन ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनसे साफ़ संकेत मिल रहे हैं कि दुनिया के नहीं तो कम से कम भारत के ब्राम्हणों में पुनर्जागरण की एक नई लहर उठी है। जातिवाद के लिए अभिशप्त देश में ब्राम्हणों का नए सिरे से एकजुट होना अच्छी बात हो सकती है ,लेकिन इसके निहितार्थ समझने की जरूररत है। 

    पिछले दिनों स्वतंत्रता की हीरक जयंती पर देश भर में कैदियों की रिहाई का अभियान चला। ये कोई नई बात नई है,ऐसे ख़ास अवसरों पर कैदियों को रिहा करने की पुरानी परम्परा है। किन्तु भाजपा ने  इसमें जो नई बात जोड़ी है, वो है एक जाति विशेष के ऐसे कैदियों की रिहाई जो हत्या के बाद दुनिया के सबसे जघन्यतम अपराध बलात्कार में सजा काट रहे थे। ये सब गुजरात के बहुचर्चित बिलकीस बानो सामूहिक बलात्कार काण्ड के अपराधी थे। सब ब्राम्हण थे और इनमें  से एक भी न उम्रदराज था और न अशक्त, फिर भी इन सभी को देश की आजादी की हीरक जयंती पर रिहा किया गया। 

    देश में ऐसी दूसरी चर्चित घटना घटी नोएडा में, यहां भाजपा के एक ब्राम्हण नेता ने अपने पड़ौस में रहने वाली एक महिला के साथ बदसलूकी की। जनाक्रोश बढ़ा तो सरकार ने आरोपी श्रीकांत त्यागी कि गिरफ्तारी पर 25  हजार का ईनाम घोषित किया,उसकी गिरफ्तारी  भी हुई और उसके द्वारा किये गए अतिक्रमण पर बुलडोजर भी चला। 

    तीसरी घटना मध्यप्रदेश की है,जहां भाजपा के नेता ने ब्राम्हणवाद ऊपर एक सामन्य टिप्पणी की। इस टिप्पणी के बाद इलाके के ब्राम्हण सड़कों पर निकल आये। दबाब में भाजपा को उस नेता से सार्वजनिक माफी मंगवाने के साथ ही उसे पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया। आरोपी के खिलाफ पुलिस थानों में दनादन माले दर्ज किये गए सो अलग। 

    इन तीनों घटनाओं में कुछ समानताये हैं। पहले आप इन पर गौर कीजिये। पहली बात तो ये है कि ये तीनों घटनाएं भाजपा शासित राज्यों की हैं। तीनों में ब्राम्हण लिप्त हैं और तीनों ही अब नए सिरे से संगठित होकर शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं। गुजरात सरकार अपने कृत्य को कुतर्कों से न्यायोचित बताने में लगी है। कहा जा रहा है कि बलात्कार के अपराधी सुसंस्कारित ब्राम्हण हैं। मध्यप्रदेश में भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष चूंकि खुद ब्राम्हण हैं इसलिए उन्हें ब्राम्हणों के तुष्टिकरण की फ़िक्र है। और अब यही नोएडा में श्रीकांत त्यागी के समर्थन में हो रहा है। 

    अब ब्राम्हणों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे तो ब्राम्हणों की अस्मिता खतरे में पड़ जाएगी। आपका वोट बैंक हाथ से निकल सकता है इसलिए ब्राम्हण चाहे कुकर्मी हो या उत्पाती ,उसे सरकार का भी संरक्षण मिलना चाहिए और संगठन का भी, समाज का संरक्षण तो मिल ही रहा है। 

    पांच सो साल पहले मेरे सर्वाधिक प्रिय कवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी यही सब किया था। वे भी पता नहीं किस पिनक में लिख गए कि -

    पूजहि विप्र सकल गुण हीना । शुद्र न पूजहु वेद प्रवीणा ।।

    ब्राम्हण होने के नाते मुझे गोस्वामी तुलसीदास का समर्थन करना चाहिए था,लेकिन मै ऐसा कभी नहीं करता। मै तुलसीकृत रामचरित मानस का दशकों पुराना नियमित पाठक हूँ लेकिन इसी मानस की इन पंक्तियों से कभी सहमत नहीं हुआ जिनका जिक्र मैंने ऊपर किया है। हमारी ब्राम्हणप्रेमी सरकारें आजकल यही कर रहीं हैं। ब्राम्हणों सकल गुण हीन हो लेकिन उसकी परवाह करो। वो बलात्कारी भी हो तो भी उसे सरकारी प्रावधानों का लाभ देते हुए सबसे पहले रिहा करो। उन लोगों को रिहा मत करो जो जेल में रहते हुए अपनी स्मृति खो चुके हैं,जिन्हें सुनाई नहीं देता,दिखाई नहीं देता, जो चल-फिर नहीं सकते। 

    ब्राम्हणों की भावनाओं का सम्मान करते हुए पिछड़ी जाति के नेताओं से ब्राम्हणों के समक्ष माफियां मंगवाओ और फिर उन्हें पार्टी से बर्खास्त भी कर दो ,क्योंकि ऐसा करना ब्राम्हणत्व  की रक्षा के लिए आवश्यक है। गुंडागर्दी करने वाले श्रीकान्त जैसे  ब्राम्हणों के लिए सड़कों पर निकलो ,क्योंकि ब्राम्हण खतरे में हैं। मुझे हैरानी होती है जब जातिवाद से बाहर निकलने के बजाय समाज और सियासत ही नहीं बल्कि हमारी मशीनरी तक उसमें उलझ कर रह जाती है। ब्राम्हणत्व अब उसी तरह उभार ले रहा है जैसे इस्लाम में कटटरता। 

    सामजिक रूप से संगठित रहना,समाज के हितों के लिए  काम करने में कहीं कोई बुराई नहीं है। ब्राम्हणों को भी ये सब करने का अधिकार है। किन्तु सिर्फ इसलिए किसी ब्राम्हण का साथ नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि वो ब्राम्हण है। उसके गुण-दोष भी देखे जाने चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो अनर्थ हो जाएगा। अनर्थ हो रहा है, ऐसी घटनाओं से देश में जातिवाद नए सिरे से सिर उठा रहा है ,जो आगे जाकर बेहद दुखदायी होगा। जातीय रूप से संगठित सिर्फ ब्राम्हण ही नहीं हो रहे। दूसरी जातियों में भी ये बीमारी तेजी से फ़ैल रही है। फिर से जाति के आधार पर सेनाएं बनाई जा रहीं हैं। फिर से जातीय संगठनों को राजनीति में स्थापित करने की मुहिम चलाई जा रही है। 

    इस संवेदनशील मुद्दे पर रायता फैलाना आसान है लेकिन समेटना कठिन। सरकारों के साथ ही समाज के संवेदनशील व्यक्तियों को इस नयी प्रवृत्ति को संज्ञान में लेना चाहिए। सबसे ज्यादा चिंता और खतरे की बात ये है कि इस तरह की प्रवृत्तियों को सत्ता का संरक्षण मिल रहा है। देश की आजादी के 75  वे वर्ष में हमने इस तरह के तमाम खतरों पर बात ही नहीं की। हम केवल तिरंगे लगवाते रह गए। अब वे ही तिरंगे कचरे में पड़े नजर आ रहे हैं। अब हमारा राष्ट्रवाद घास चरने चला गया है। हमें तिरंगे की नहीं जातीय अस्मिता की फ़िक्र है। 

    इस देश में ब्राम्हणवाद को लेकर असंतोष नया नहीं है। भृगु संहिता से लेकर तमाम वेद-पुराण निशाने पर रहे हैं।  आज भी हैं, आगे भी शायद रहेंगे। और इसकी असल वजह होगी समाज द्वारा ऐसे तत्वों क समर्थन जो अपराधी हैं,जो कुकर्मी हैं ,जो वेद विहीन हैं। इस तरह की प्रवृत्तियां किसी भी समाज के लिए घातक हैं ,फिर चाहे वो ब्राम्हण समाज हो,क्षत्रिय समाज हो,बनिक समाज हो ,अल्पसंख्यक समाज हो। हर समाज को सुचिता का ख्याल रखना चाहिए। केवल जाति के आधार पर किसी का समर्थन या विरोध करना अपने आप में एक अपराध है,भले ही उसका जिक्र भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता में हो या न हो। 

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