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    मोहर्रम पर खास रिपोर्ट। धैर्य, शौर्य, साहस और पराक्रम का नाम है हजरत इमाम हुसैन।

     अतुल कपूर (स्टेट हेड)

    मोहर्रम पर खास रिपोर्ट। अनीति से लोहा लेने की गौरव-गाथा है मोहर्रम की जंग-ए- कर्बला। आदर्शों और सिद्धांतों के खिलाफ आवाज बुलंद करना, सच को स्वीकार करने और असत्य के खिलाफ बगावत का बिगुल बजाने की कहानी कर्बला की जंग है। हजरत इमाम हुसैन तप, त्याग बलिदान के लिए करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गए। आज भी वे श्रद्धा से याद किए जाते हैं। खासतौर से शिया समुदाय के लोग उन्हें याद कर उनके साथ हुई बेइंसाफी और उनके परिवार के साथ किए गए निर्मम व्यवहार को याद कर मातम करते हैं व आंसू बहाते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी की यह चौपाई उनके अमर बलिदान पर सटीक बैठती है।

    "परहित लागि तजहिं जे देही।

    संतति संत सराहहिं तेही।"

    जो लोग दूसरों के भले के लिए अपने प्राण न्योछावर करते हैं, उनकी सज्जन लोग निरंतर सराहना करते रहते हैं। मर कर भी अमर हो गए हजरत इमाम हुसैन।

    आपको बताते चलें कि हजरत इमाम हुसैन पैगंबर ए इस्लाम हजरत मुहम्मद साहब के नवासे थे। इमाम हुसैन के वालिद यानी पिता का नाम मोहतरम 'शेरे-खुदा' अली था, जो कि पैगंबर साहब के दामाद थे। इमाम हुसैन की मां बीबी फातिमा थीं। हजरत अली मुसलमानों के धार्मिक-सामाजिक और राजनीतिक मुखिया थे। उन्हें खलीफा बनाया गया था। कहा जाता है कि हजरत अली के निधन के बाद लोग इमाम हुसैन को खलीफा बनाना चाहते थे लेकिन हजरत अमीर मुआविया ने खिलाफत यानी शासन-सत्ता पर कब्जा कर लिया। मुआविया के बाद उनके बेटे यजीद ने खिलाफत अपना ली। सरल शब्दों में कहें तो शासन की बागडोर हथियाने के बाद यजीद क्रूर शासक बना। उसे इमाम हुसैन का डर था। इंसानियत को बचाने के लिए यजीद के खिलाफ इमाम हुसैन ने कर्बला की जंग लड़ी और शहीद हो गए।

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