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    झंडे का फंडा या डंडा ही डंडा

    राकेश अचल का लेख। ये राजनीति की बात नहीं है ,लेकिन इस पर राजनीति हो रही है। देश आजादी की 75 वीं सालगिरह का समापन देश व्यापी तिरंगा अभियान से करेगा। इस अभियान के तहत देश में 20 करोड़ घरों पर तिरंगा ध्वज फहराने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन इस लक्ष्य की पूर्ती के लिए जो तिरंगा घर-घर पहुंचाया जा रहा है उसे देखकर आंसू आते हैं। सरकार ने जो तिरंगे खरीदे हैं वे झन्ने [ बुंदेली में कहें तो एकदम झिरझिरा यानी पारदर्शी कपड़ा ,जिसे टूल भी कहा जाता है ] की तरह हैं। यकीन नहीं होता कि कोई राष्ट्रध्वज के निर्माण और आपूर्ति में मुनाफे की बात भी सोच सकता है। 

    हर देश का झंडा और झंडे में डंडा होता है। जब देश आजाद नहीं था तब देशी रियासतों,राज्यों-रजवाड़ों के अपने झंडे थे। सबका अपना रंग और आकार था। सामान्य चीज सिर्फ एक थी वो था झंडे में लगने वाला डंडा। हर झंडा आन,बान,शान का प्रतीक होता है। झंडा चाहे राजनितिक हो,धार्मिक हो या राष्ट्रीय हो उसके लिए लोगों का अभूतपूर्व समर्पण होता है और होना चाहिए। लेकिन जिस देश में आजादी के 75 साल बाद भी रहने के लिए घर,खाने के लिए रोटी और दवा तथा शिक्षा और सुरक्षा न हो उस देश में झंडा को घर-घर फहराने का आग्रह या अनुष्ठान कुछ अजीब सा लगता है। 

    भारत तो उन देशों में से है जहां आजादी के 75 वे साल में भी राष्ट्र ध्वज को लेकर विवाद हैं। कुछ लोग हैं जो राष्ट्रध्वज  को कांग्रेस का ध्वज मानते हैं। कुछ संगठन हैं जिन्होंने ध्वज संहिता की मनमानी परिभाषा कर पिछले पांच दशकों में कभी अपने मुख्यालयों पर तिरंगा  नहीं फहराया ,लेकिन अब वे सब अपनी राजनीतिक जमीन को खिसकने से बचाने के लिए पहले घर-घर मोदी करते थे और अब घर-घर तिरंगा कर रहे हैं। तिरंगे को लेकर राजनीति करने वाले राजनीति करें इससे आम आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ता। भक्तों को तो बिलकुल भी नहीं पड़ता। हम भी एक दर्जन तिरंगे ध्वज ले आये हैं। हमारे पत्रकार संगठन ने तो तय समय 11  से 15  अगस्त के पहले 7  अगस्त को ही शहर में तिरंगा यात्रा निकाल दी। 

    हैरानी की बात ये है कि जो सरकारें पंचायत चुनाव से लेकर लोकसभा,विधान सभा चुनावों तक में घर-घर मतदाता पर्चियां नहीं पहुंचा पातीं, वे घर-घर तिरंगा ध्वज पहुंचा रहीं हैं। खंड स्तर के चुनाव ड्यूटी करने वाले शिक्षक घर-घर तिरंगा बाँट रहे हैं ,वो भी मुफ्त, लेकिन वितरित किये जाने वाला तिरंगा ऐसा है कि उसे देखकर रोना आ जाए। वितरित किये जाने वाले तिरंगे का कपड़ा इतना झीना है  कि  पानी का एक प्रहार नहीं झेल सकता। उसकी सिलाई इतनी काम चलाऊ है कि तुरपन हाथ लगते ही खुल रही है। लगता है जैसे सरकार ने भाड़ा टाल दिया है। तिरंगा  बनाने वालों का समर्पण वितरित किये जाने वाले तिरंगों  में दिखाई ही नहीं देता। 

    घर-घर तिरंगा अभियान के लिए बेचारे रेलवे कर्मचारियों से जबरन चौथ वसूली कर ली गयी। स्थानीय निकायों पर झंडा खरीदने और वितरित करने की जिम्मेदारी डाल दी गयी। जो रेडक्रास जरूरतमंदों की मदद के लिए हैं उसके कोष से झंडे खरीद कर वितरित करा दिए गए। आखिर इस सबकी क्या जरूरत थी ? क्या ये राष्ट्रीय अभियान स्वेच्छिक नहीं हो सकता था ? क्या कोरोना काल में ताली और थाली बजवाने का आव्हान करने वाले पंत प्रधान जनता से अपने पैसे से घर-घर तिरंगा फहराने की अपील नहीं कर सकते थे ? क्या तिरंगे के उत्पादन और खरीद के लिए कुछ पसंदीदा संस्थानों को ही उपकृत किया जाना जरूरी था ? 

    हम और आप में से बहुत से उस पीढी के हैं जो एक झंडे को लेकर पूरे गांव,कस्बे और मुहल्ले में प्रभात फेरी निकाल लेते थे। अब कोई प्रभातफेरी नहीं निकलती | अब जब सरकार कहती है ,कोई दल सरकार के पीछे खड़ा होकर लाभान्वित होना चाहता है तो देश को तिरंगे से पाट देने के अभियान शुरू कर दिए जाते हैं। भारत में तिरंगा 75  साल बाद भी घर-घर की जरूरत क्यों महसूस नहीं किया गया ? क्यों तिरंगा स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर ही निकाला और फहराया जाता है ? क्या इसके लिए राजनीतिक और सामाजिक दल जिम्मेदार नहीं हैं ? आज ये नौबत क्यों है कि सरकारों को घर-घर तिरंगा फहराने के लिए मुफ्त अनाज की तरह मुफ्त में तिरंगा बांटना पड़ रहा है ? 

    अमेरिका में स्वतंत्रता दिवस पर नेवी मशीन नाम की एक कम्पनी राष्ट्र ध्वज के चिन्ह वाली टी शर्तें केवल एक डालर में बनाकर बेचती हैं। जनता टूट पड़ती है उन्हें लेने के लिए ,क्योंकि वे बेहतर गुणवत्ता के साथ ही आन,बान,शान की प्रतीक होती हैं। अमेरिका में ये काम सरकार के कहने से नहीं स्वस्फूर्त तरीके से होता है और न जाने कब से हो रहा है। भारत में ये काम सरकार खुद कर रही है ,लेकिन दुसरे तरीके से। 

    मुझे अफ़सोस होता है कि इस देश में सरकारों ने [ अकेली भाजपा ने नहीं ]देश को मुफ्तखोरी की आदत डाल दी है। देश की 80  करोड़ आबादी पिछले कितने साल से मुफ्त के अनाज पर ज़िंदा है। देश कब से मुफ्त में बिजली ,रेल,बस में मुफ्त यात्रा,मुफ्त इलाज ,मुफ्त शिक्षा का लालच देकर वोट की राजनीति की जा रही है। दुर्भाग्य से देश में न मुफ्त देने वाले समाप्त हो रहे हैं और न मुफ्त देने वाले, राष्ट्रीयता के प्रदर्शन के लिए भी तिरंगों की मुफ्तखोरी हैरान करने वाली है। मुफ्त का  माल किसी को बुरा नहीं लगता। मुफ्त का राशन हो या झंडा सबको अच्छा लगता है। मै भी मुफ्त का माल लेकर सुखानुभूति करता हूँ। लेकिन सवाल ये है कि ये मुफ्त का माल आता कहाँ से है ? क्या किसी सरकार की अपनी फैक्ट्री है ,या ये मुफ्त का माल देश के उस करदाता का पैसा है जो दही और मही  के इस्तेमाल तक पर  कर अदा करता है। 

    सवाल कड़वे हैं और कोई उनके जबाब नहीं देगा ,किन्तु सवाल तो सवाल रहेंगे। मत दीजिये जबाब, कब तक जबाब नहीं देंगे ? एक दिन तो जबाब देना पड़ेगे। जबाब देने ही पड़ते हैं। सवालों का जबाब देने वाली सरकारें और राजनीतिक दल जबाबदेह और जिम्मेदार माने जाते हैं। अफ़सोस की बात ये है कि स्वतंत्रता के अमृत महोत्स्व के लिए बनाई गयी राष्ट्रीय आयोजन समिति कागजों पर है, न कोई बैठक ,न कोई सामूहिक निर्णय,न कोई सामूहिक आयोजन, जो हो रहा है वो सब या तो सरकारी है या फिर राजनितिक |सार्वजनिक \ सामूहिक कुछ है ही नहीं,  मरी,दबी ,कुचली पड़ी कांग्रेस में इतनी तथा नहीं बची कि वो इस अमृत महोत्स्व के आयोजन में सरकार से दो कदम आगे रहती। 

    स्वतंत्रता का अमृत महोत्स्व तब कारगर होता  जब सरकार घर-घर तिरंगे के साथ उन बेघरों को भी घर देने की कोई योजना शुरू करती जो आज भी फुटपाथों,रेन बसेरों या छप्पर \ छांव में रहते हैं। आनंद तब आता जब घर-घर तिरंगे के साथ हर हाथ को रोजगार की कोई योजना सामने आती। लेकिन आनद आये कहाँ से ? सरकार तो कंगाल हो रही है। सरकार मनरेगा के मजूरों का पैसा देने की स्थिति में नहीं है। सरकार को अपना खर्च चलाने के लिए ' सीनियर सिटीजन 'को रेल यात्रा में दी जाने वाली रियायत बंद करना पड़ी है। सरकार सामाजिक सुरक्षा की बात तब करे ,योजना तब बनाये जब उसके पास पैसा हो। सरकार का खजाना तो मुफ्तखोरी पर लुटाया जा रहा है।  विधायकों \सांसदों के वेतन \भत्ते दो से चार गुना बढ़ने में खर्च करना पड़ रहा है। 

    इस सबके बावजूद मै चाहता हूं कि सरकार घर-घर तिरंगा भी पहुंचाए और स्वतंत्रता के अमृत महोत्स्व का शानदार आयोजन भी करे। ऐसा आयोजन करे जिसमें दुनिया के तमाम राष्ट्रध्यक्षों को आमंत्रित किया जाये।  सरकार को झंडे के फंडे को केवल राजनीति बनाकर नहीं रखना चाहिए। ये अपराध की श्रेणी में आता है। अब ये आर्थिक अपराध है या सामाजिक या राष्ट्रिय  या नैतिक ,ये आप तय करें। सभी पाठकों और मित्रों को अमृत काल की शुभकामनाएं। 

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