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    भ्रष्टाचार के बाँध और जनता का सब्र।

    राकेश अचल का लेख। अंग्रेजों के बनाये पुल-पुलियाँ और बाँध डेढ़ सौ साल से ज्यादा वक्त गुजर जाने के बाद भी जस के तस हैं लेकिन मध्यप्रदेश में बनने वाले बाँध बनने से पहले ही रिसने लगे हैं। डेढ़ दर्जन से ज्यादा गावों की आबादी असुरक्षित है, सेना बुला ली गयी है। लेकिन जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने में मध्यप्रदेश की सरकार को पसीना आ रहा है ,क्योंकि ये बाँध भ्र्ष्टाचार के बाँध हैं ,और इनमें  पूरी सरकारी मशीनरी शामिल है। 

    मध्यप्रदेश में चौथी बार भाजपा का शासन है। डबल इंजिन की सरकार है। इसी शासन में धार के धरमपुरी स्थित गांव कोठीदा में कारम नदी पर निर्माणाधीन बांध के फूटने की आंशका ने दो दिन से सरकार की नींद उड़ा दी है। 304  करोड़ की लागत से बनने वाले इस बाँध में शुरू से ही भ्र्ष्टाचार का ईंट-गारा लग रहा था किन्तु स्थानीय  निवासियों की  शिकायतों के बावजूद कहीं ,कोई सुनवाई नहीं हुई। जन सुनवाई में भी नहीं |अब जब बाँध से रिसाव शुरू हो चुका है तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार के होश फाख्ता हो रहे हैं। 

    मध्यप्रदेश बांधों का प्रदेश है। यहां देश के बांधों की दूसरी बड़ी संख्या है |  मध्य प्रदेश में  906 बांध  हैं। इन बांधों की सुरक्षा केलिए बाकयदा क़ानून भी है लेकिन कानूनों से बाँध सुरक्षित होते तो कब के हो जाते ? कानून के मुताबिक बांध सुरक्षा संगठन बनाए गए हैं। इनका  प्रमुख चीफ इंजीनियर होता है जो  मानसून के पहले और बाद में बांधों की सुरक्षा के संबंध में जांच कर  हर साल अपनी रिपोर्ट देने के लिए बाध्य है | लेकिन कहीं कुछ नहीं हो रहा | सब कुछ कागजों तक सीमित है। 

    बांध सुरक्षा कानून के तहत जो बांध 15 मीटर से ऊंचे हैं , वहां जल मौसम विज्ञान केंद्र बांये जाना थे, लेकिन नहीं बने। बिना इनके बारिश और मौसमीय बदलावों की रियल टाइम जानकारी कैसे मिल सकती है ?  इसी तरह जो बांध 30 मीटर से ऊंचे हैं वहां भूकंप विज्ञान केंद्र स्थापित जाना थे ,लेकिन नहीं बनने। ये आठ माह पुरानी बात है है। 

    कारम बाँध के लिए ई-टेंडर हुए थे ,लेकिन इसके बाद भी जो पारम्परिक भ्र्ष्टाचार होता है उसे कोई नहीं रोक पाया,क्योंकि मंत्री और प्रमुख सचिव से लेकर नीयचे तक का अमला अपना-अपना हिस्सा लेकर मौज में था |  किसी को बाँध के आसपास रहने वाले लोगों के जन-धन की चिंता ही नहीं थी। वे तो पोल खुलना थी सो खुल गयी,लेकिन पोल खुलने के बाद भी सरकार चुप है। 

    कारम बाँध को लेकर गांव वालों की नहीं सुनी गयी। अब नर्मदा बचाव आंदोलन से जुड़ी मेद्या पाटकर और कांग्रेस ने भी निर्माण में भ्रष्टाचार को लेकर सवाल उठाए है। इन आरोपों पर विशेषज्ञों और अधिकारियों से बात कि तो कई स्तर पर गड़बड़ी सामने आ रही है।  जानकारों का कहना है कि बांध के स्पेशिफिकेशन के अनुसार मिट्टी की लेयर को मेंटेन  करने में ही सबसे बड़ी लापरवाही की गई है।

    बाँध को 31  मई तक तैयार होना था सो हो गया लेकिन जल्दबाजी में बांध की दीवार के निर्माण में मिट्टी में पानी का अनुपात और उसे कम्पैक्ट करने में लापरवाही की गई है। नियमानुसार मिट्टी की 15 सेंटीमीटर तक लेयर को मेंटेन करना होता है। 1 मीटर में 6 से 7 लेयर होती है। इसे रोलर चलाकर मेंटेन किया जाता है। यहां ध्यान ही नहीं दिया गया।

    बांध की दीवार बनाते समय बीच में हर्टिंग जोन में काली मिट्टी डाली जाती है। जो मिट्टी को पकड़ कर रखती है। इससे पानी लीकेज नहीं होता। इसके बाद दोनों साइट केसिंग जोन में पत्थर वाली मुरम डाली जाती है। इसका भी ख्याल नहीं रखा गया लगता है।  स्थानीय लोगों ने बांध की दीवार में मिट्टी में बड़े बड़े पत्थर डाल कर बनाने का का आरोप लगाया। निर्माणाधीन बांध में पानी रिसाव से इन आरोपों के सही होने की संभावना बढ़ाता है।

    कारम बाँध में रिसाव के कारण 18  गांवों की लगभग 40  हजार आबादी के ऊपर खतरा मंडरा रहा है। मजबूरी में मध्य प्रदेश सरकार को राहत और बचाव के लिए सेना की मदद लेना पड़ रही है। 

    भ्र्ष्टाचार के इस बाँध को लेकर सरकार  जब जांच करेगी ,तब करेगी लेकिन प्रदेश कांग्रेस ने कारम नदी पर बने बांध में भ्रष्टाचार, गुणवत्ताहीन निर्माण और अनियमितता के कारण लीकेज होने के मामले की जांच के लिए समिति का गठन किया है | इससे ग्रामीणों का क्या लाभ ? वे तो परेशान हो ही रहे हैं  | फिर विपक्ष की जांच तो राजनीति के काम आएगी,भ्र्ष्टाचारियों के खिलाफ नहीं ,क्योंकि उन्हें तो राज्य सरकार का संरक्षण पहले से मिला हुआ है। 

    भ्र्ष्टाचार के कारम बाँध में  15 मिलियन क्यूबिक मीटर (एमसीएम) पानी के बढ़ते दबाव में बांध को टूटने से बचाने के लिए इंजीनियरिंग और जल विज्ञान विशेषज्ञों को तैनात किया गया है। इसमें से एक तिहाई को तत्काल जारी किया जाना है। इस बाँध  की  चौड़ाई 590 मीटर और ऊंचाई 52 मीटर है | बीते चार साल में ये बाँध बना लेकिन किसी ने इसकी सुध नहीं ली। कारम बाँध मध्यप्रदेश में निर्माण विभागों की निकृष्टता का एक उदाहरण भर है |  बाँध हो या भवन,पल हो या सड़कें सब भ्र्ष्टाचार से बने हैं। मध्य प्रदेश में लोनिवि,सिंचाई और इन दोनों विभागों के सहयोगी संगठन केवल रूपये छपने की मशीन बने हुए हैं। लगातार शिकायतों के बावजूद सरकार कोई कारगर कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं है। 

    भ्र्ष्टाचार दाल में नमक के बराबर हो तो भी कोई बर्दाश्त कर ले, किन्तु जब पूरी दाल में दाल के बजाय नमक ही नमक हो तो बर्बादी तय है। कारम बाँध और उससे प्रभावित होने वालों का भविष्य क्या होगा,कोई नहीं जानता |लेकिन डबल इंजिन की सरकार चलने वाले प्रधानमंत्री ने यदि इस और से भी आँखें मूँद लीं तो जनता के सब्र के बाँध को टूटने से भी कोई नहीं बचा सकेगा। 

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