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    अयोध्या। निर्मली कुंड:वृत्रासुर को मारने के बाद इंद्र ने इसी कुंड में किया था स्नान।

    अयोध्या। रामनगरी की पौराणिकता विवेचित करते ग्रंथों में भले निर्मली कुंड की महिमा का बखान हो पर इस कुंड की जमीनी हकीकत निराशाजनक है। कैंट क्षेत्र में 14 कोसी परिक्रमा मार्ग पर स्थित कुंड के नाम पर जलकुंभी से पटा चार-पांच एकड़ का रकबा भर रह गया है। कुंड की सीढि़यां एवं बुर्ज मिट्टी एवं झंखाड़ से पटकर ओझल हो गए हैं। जिस निर्मली कुंड के बारे में वर्णित है कि वृत्रासुर को मारने के बाद इंद्र ने इसी कुंड में स्नान कर प्रायश्चित किया, वहां स्नान करना असंभव हो गया है। सरयू में बाढ़ के कुछ महीनों को छोड़ दिया जाय तो यहां स्नान के लिए जल ही नहीं रहता और यदि जल हुआ भी तो जलकुंभी के चलते इसमें स्नान करना कठिन है। कुंड की पहचान एडवर्ड तीर्थ विवेचनी सभा की ओर से 1902 में लगाए गए शिलापट से होती है। इसी शिलापट से जानकारी मिलती है कि यहां प्रत्येक वर्ष सावन पूर्णिमा को मेला लगता था। इसी शिलापट के बगल 1905 का एक और शिलापट है, जिस पर ब्रिटिश सरकार की ओर से 'फि¨शग नाट एलाउड' का आदेश अंकित है।

    • भगवान राम ने किया था कुंड में स्नान

    जनश्रुति के अनुसार एक किलोमीटर से भी कम के फासले पर स्थित गुप्तारघाट में जल समाधि लेने से पूर्व भगवान राम ने इसी कुंड में स्नान कर अपने लोक में गमन के लिए समुचित निर्मलता हासिल की और इसी वजह से इस कुंड को निर्मली कुंड के नाम से जाना गया।

    • युगलानन्यशरण की विरासत भी नदारद

    19वीं शताब्दी के आखिरी एवं 20 वीं शताब्दी के शुरुआती दशकों में अयोध्या की संत परंपरा के पर्याय एवं सुप्रसिद्ध पीठ लक्ष्मण किला के संस्थापक आचार्य युगलानन्यशरण के चलते भी इस कुंड को याद किया जाता है। उन्होंने यहां कई वर्षों तक तपस्या की और अपनी अलौकिक सिद्धियों का परिचय दिया पर आज उनकी विरासत के अवशेष ढूंढ़ना कठिन है।

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