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    देश को रौनक लौटने का इन्तजार।

    राकेश अचल का लेख। कहीं नूपुर तो कहीं महुआ धुन के फेर में देश के भीतर और बाहर की रौनक कहीं जा छुपी है, पूरे देश को उसके लौटने का इन्तजार है। रौनक गायब होने से बेजार शेयर बाजार वेंटिलेटर पर था लेकिन सुना है कि अब धीरे-धीरे शेयर बाजार की रौनक लौटने लगी है। कहते हैं कि हफ्ते के तीसरे कारोबारी दिन यानी बुधवार को शेयर बाजार में दमदार तेजी देखने को मिली और  ट्रेडिंग सेशन में सेंसेक्स और निफ्टी दमदार तेजी के साथ बंद हुए। 

    अब शेयर बाजार में रौनक लौटी है तो जाहिर है और जहाँ-जहाँ से रौनक वापस गयी होगी, वहां भी वापस लौटेगी ही। राज्य सभा की सदस्य्ता का नवीनीकरण न होने की वजह से मुख्तार अब्बास नकवी के चेहरे से गायब हुई रौनक भी वापस लौटती दिखाई दे रही है। उन्होंने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया है, खबर है कि वे अब उप राष्ट्रपति बनने वाले हैं। उन्हें बनना चाहिए क्योंकि उनके उप राष्ट्रपति बनने से मुल्क के अल्पसंख्यकों के लटके हुए चेहरों की रौनक वापस आ सकती है। 

    रौनक जाती तौर पर भी सबकी जरूरत है और वैसे भी ,जिस मुल्क में रौनक न हो वहां आवाम भी परेशान ही रहता है। अवाम तो सीतारमण जी द्वारा छाछ से लेकर दीगर 18  जिंसों पर जीएसटी लगाने से बेरौनक है ,लेकिन सीता जी को कोई फ़िक्र नहीं, सीता जी को क्या, किसी को अवाम की फ़िक्र नहीं, सब बेफिक्र हैं। जाहिर है कि आगे-पीछे सब अपने आप अपनी फ़िक्र करने लगेंगे। सरकार और सीता जी को शायद अंदेशा था कि छाछ सरकार और सरकारी पार्टी की जड़ों में डाला जा रहा है इसलिए उसने छाछ पर जीएसटी लगाया, छाछ क्या आयुष्मान कार्ड बनने के बाद धड़ाधड़ बीमार हो रहे मुल्क को बचाने के लिए सीता जी ने पांच हजार से ऊपर वाले अस्पताल के कमरों के किराए पर भी जीएसटी लगा दी। 

    बात दरअसल रौनक की हो रही है, रौनक लौट रही है। इसलिए मै जीएसटी का दायरा बढ़ने का विरोध क्यों करूँ ? ये सब तो देशहित में है, देशहित में ही रसोई गैस के सिलेंडर पर पचास रूपये बढ़ाये गए हैं। अरे भाई रसोई घर में गैस की क्या जरूरत ? गाय पालो ,उसके गोबर के कंडे बनाओ और खूब जलाओ, गाय भी खुश और आप भी खुश। सगुन के लिए उज्ज्वला योजना के तहत मिले गैस सिलेंडर को जब तब भरवा लो, बहुत है .देश में रौनक की वापसी के लिए सब कुछ सरकार ही थोड़े करेगी,कुछ आपको,हमको भी तो करना पडेगा। देश में रौनक लौटने के संकेत मिलने लगे हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया और स्मृति ईरानी के चेहरों पर भी रौनक दिखाई देने लगी है. सिंधिया को अब इस्पात और ईरानी को अल्पसंख्यक मंत्रालय का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया है .कायदे से अतिरिक्त मंत्रालयों के लिए दो सांसदों को मंत्री बनाया जा सकता था .यकीनन  इससे सरकार का खर्च बढ़ता,इसलिए ऐसा नहीं किया गया .इतनी  मितव्ययी सरकार के रहते भी रौनक वापस न लौटे तो लानत है ऐसी रौनक को .रौनक को सरकार का साथ हर हाल में देना चाहिए .इस समय सरकार को सबके साथ की जरूरत है,सरकार को जब सबका साथ मिलेगा तभी तो वो सबका विकास कर पाएगी ? 

    सरकार की हर कोशिश रौनक वापसी की दिशा में ही तो है। अब देखिये जिस-जिसके पीछे ईडी लगाई गयी उस,उसके यहां से रौनक गायब हुई और सरकार के पास आ गयी. ईडी इतनी प्रभावी सेवक है कि जिसके पीछे लगती है उसकी ऐसी-तैसी कर देती है। चीन की वीवो कम्पनी के निदेशक के पीछे भी ईडी लगायी गयी और आपको जानकार हैरानी होगी कि वीवो के निदेशक झेंगसेन और झांग भारत छोड़कर चीन भाग गए। हमारी सरकार की उदारता देखिये कि उसने दोनों को भागने दिया .सरकार की पुरानी नीति है कि जो भागना चाहे उसे भागने दिया जाये .पहले भी  देश के अरबों-खरबों की सम्पत्ति खाकर जाने कितने उद्योगपति देश छोड़कर भाग चुके हैं .एक भी भगौड़ा लौटकर वापस नहीं आया .भगौड़े कोई रौनक नहीं हैं जो वापस आ जाएँ ?

    देश में रौनक लौटने के संकेतों के बीच मै तो महुआ मित्रा का मुरीद हो गया हूँ .तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा के मां काली पर दिए बयान के बाद हंगामा थमने का नाम नहीं ले रहा है। देशभर में कई एफआईआर दर्ज होने के बाद भी महुआ अपने बयान से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। महुआ ने कहा, 'मैं मरते दम तक अपने बयान का बचाव करती रहूंगी। मैं ऐसे भारत में नहीं रहना चाहती, जहां सिर्फ  भाजपा का पितृसत्तात्मक ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण हावी रहेगा और बाकी लोग धर्म के इर्द-गिर्द घूमते रहेंगे'। 

    मै महुआ का मुरीद हुआ हूँ उसका समर्थक नहीं हुआ, मुरीद होना और समर्थक होना दो अलग-अलग चीजें हैं। समर्थन और विरोध से जान का जोखिम होता है ,इसलिए आप चाहें तो मेरी तरह किसी के भी मुरीद हो सकते हैं। इस बार महुआ ने अकेली भाजपा को ही नहीं बल्कि ब्राम्हणवादी पितृसत्तात्मक समाज को भी निशाने पर रखा है। महुआ बेहतरीन निशानेबाज है ,पहले भी वो अपने निशानेबाजी का बेहतरीन प्रदर्शन कर चुकी है। देश को एक नहीं अनेक महुआओं कि जरूरत है। महुआ, नूपुर बहन की तरह बजता नहीं महकता है। देश से रौनक की तरह ही भाईचारे कि महक भी नदारद हो गयी है .काश वो भी लौट आये। 

    मुझे उम्मीद है कि देश में देवताओं के चातुर्मासी शयन पर जाने से पहले रौनक और महक वापस लौट आएगी,लुढ़कता हुआ रुपया भी डालर का मुकाबला  करने के लिए तनकर खड़ा हो जाएगा। चौमासे में वैसे भी सब कुछ ठहर सा जाता है। कहीं बाढ़ होती है तो कहीं जल भराव, ऐसे में सरकार को निश्चिन्त छोड़ देना चाहिए। आखिर आप सरकार के भरोसे कब तक रहना चाहते हैं ?सरकार खुद आपके भरोसे है .सरकार को यदि आपके ऊपर भरोसा न होता तो क्या मुमकिन था कि सरकार आपकी कमर तोड़ने के लिए एक के बाद एक नया कर आपके ऊपर लादती रहती? 

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