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    बकलोल के बाद धक्का-मुक्की की राजनीति।

    राकेश अचल का लेख। मुझे नहीं पता कि ' बकलोल ' संसदीय शब्द है या नहीं लेकिन मै इसका इस्तेमाल प्रे करता रहता हूँ ,क्योंकि ये आम बोलचाल का शब्द है। इस शब्द को लेकर ' प्रेजिडेंट ' के हिंदी अर्थ को लेकर कोई विवाद नहीं है। विवाद था भी सो उसे कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी ने राष्ट्रपति [अभी प्रेसडेंट के लिए यही शब्द प्रचलित है ]महोदया से क्षमा याचना कर समाप्त कर दिया है। हम यदि शब्दों के बजाय मुद्दों पर संसद और सड़क पर लड़ें तो बेहतर है .पर ऐसा होता नहीं है। 

    बात मध्यप्रदेश  की है, बीते रोज यहां पंचायत चुनाव के समय प्रदर्शनकारी पूर्व मुख्यमंत्री के साथ पुलिस की धक्का-मुक्की और जबाब में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह द्वारा एक पुलिस अफसर की कालर पकडे जाने को लेकर राजनीति शुरू हो गयी है। देश में संसद हो या सड़क ,जब तक राजनीति न हो किसी को चैन ही नहीं मिलता भोपाल के दृश्य देखकर मुझे सरकार और दिग्विजय सिंह दोनों पर तरस भी आया और गुस्सा भी, इससे ज्यादा मेरे जैसा एक आम आदमी कर भी क्या सकता है  ? दिग्विजय सिंह 75 साल के हैं और उन्हें इस तरह के प्रदर्शनों में संयमित रहना चाहिए। धक्का-मुक्की में यदि कहीं उन्हें चोट लग जाये तो तकलीफ हो सकती है। पुलिस में अब उनकी पीढ़ी के अफसर और जवान नहीं हैं। 

    मध्य्प्रदेश में सत्तारूढ़ दल हाल के स्थानीय निकाय चुनाव में कांग्रेस की विजय से घायल नाग की तरह फुफकारते नजर आये, पंचायत चुनावों में हर जिले में सत्तारूढ़ दल के नेता ही नहीं बल्कि मंत्री,विधायक और सांसद तक निर्वाचित सदस्यों को हाथ पकड़कर मतदान केंद्र में ले जाते देखे गए, और धक्का-मुक्की भी शायद इसीलिए हुई। सवाल ये है कि पंचायत चुनाव जब दलगत आधार पर हुए ही नहीं तो सत्तारूढ़ दल के मंत्री,विधायक और सांसद इतनी मेहनत क्यों कर रहे थे ? लगता है कि सरकार ने सभी जिलों में मंत्रियों और पार्टी के विधायकों और सांसदों को जिला पंचायत अध्यक्ष का पद हथियाने के लिए सुपारी दी गयी थी। 

    जिला पंचायत अध्यक्ष पद हथियाने के लिए सत्तारूढ़ दल ने परमपरानुसार साम,दाम,दंड और भेद का इस्तेमाल किया, कहीं निर्वाचित सदस्यों को बंदी बनाया तो कहीं उनका अपहरण कराया गया। कहीं प्रलोभन दिए तो कहीं कीमत अदा की  गयी। ऐसा कांग्रेस के समय भी होता था और आज भी हो रहा है ,इसलिए इस बात पर लिखने-पढ़ने का कोई अर्थ नहीं रह जाता, भांग पूरे कुएं में घुली है। सवाल तो ये है कि कांग्रेस ने इस कदाचार को रोकने के लिए अपने प्रदर्शन की तैयारी मजबूती से नहीं की और यदि की भी तो उसमें  दिग्विजय सिंह जैसे बुजुर्ग नेताओं को शामिल कर उसे कमजोर और बदनाम करा लिया। 

    दिग्विजय सिंह  कांग्रेस के सबसे ज्यादा विवादास्पद किन्तु लोकप्रिय नेता हैं। वे दस साल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और उन्होंने एक संकल्प के तहत एक निश्चित समय तक कोई चुनाव नहीं लड़ा, 2018  में कांग्रेस के सत्ता में आने से लेकर सत्ता से जाने तक में दिग्विजय सिंह की भूमिका रेखांकित की गयी। दिग्विजय सिंह को उनकी मुंह बोली बहन भाजपा की वरिष्ठ नेता सुश्री उमा भारती ने मिस्टर ' बंटाधार ' का जो खिताब दिया वो दिग्विजय सिंह के साथ राहु की छाया की तरह चस्पा है। बावजूद इसके दिग्विजय सिंह की उग्रता कम नहीं हुई, वे पार्टी के अकेले ऐसे नेता हैं जो भीड़ में जा घुसते हैं और पुलिस से हाथापाई करने से भी नहीं चूकते। 

    पुलिस से हाथापाई करने में प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह भी कभी नहीं चूके। जब वे विपक्ष में थे तो वे भी दिग्विजय सिंह की तरह पुलिस से भिड़ते दिखाई देते थे। नेताओं को  पुलिस के बजाय आपस में भिड़ना चाहिए। पुलिस तो सरकार के अधीन होती है ,उसका काम ही सरकार की सेवा करना है। लिस के बिल्ले पर ' देशभक्ति,जनसेवा ' का जुमला तो देखने के लिए लगा हुआ है। पुलिस सत्तारूढ़ दल के इशारे पर कुछ भी कर सकती है|  गनीमत है कि पुलिस ने दिग्विजय सिंह की पसलियां नहीं तोड़ीं अन्यथा यदि सरकार का निर्देश होता तो ये भी मुमकिन है, जैसे देश में ' मोदी है तो मुमकिन है'  वैसे ही मध्यप्रदेश में ' मामा है तो मुमकिन है '  का सूत्र प्रभावी है |दिग्विजय सिंह को याद रखना चाहिए कि यूपी में राहुल गांधी तक को पुलिस ने बेरहमी से धकिया दिया था। 

    बात अकेले मध्यप्रदेश की नहीं है। देश में जितने भी भाजपा शासित राज्य हैं वहां यही सब हो रहा है। कर्नाटक में सत्तारूढ़ दल के नेता की हत्या का मामला हो या गुजरात में जहरीली शराब से तमाम मौतों का मामला। लेकिन किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं, सबके सब परम स्वतंत्र हैं। भाजपा के पास सत्ता में सभी भरत नहीं हैं जिन्हें राजमद नहीं होता। भरत के अलावा दूसरे लोग भी हैं और जिन्हें सत्ता का नशा जल्द चढ़ जाता है |.मध्य्प्रदेश  में लगातार पंद्रह साल सत्ता में रही भाजपा का नशा 18  महीने के लिए हिरण भी हुआ था किन्तु खरीद-फरोख्त ने भाजपा को दोबारा सत्ता में वापस कर नशे की ये खुराक दोबारा मुहैया करा दी। 

    भाजपा इस समय देश में नया इतिहास लिख रही है, इसलिए कांग्रेस को बहुत सम्हलकर नेतागीरी करना चाहिए | संसद में यदि कांग्रेस की नेता सोनिया गाँधी को निशाने पर लिया जा सकता है तो मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह को कैसे छोड़ा जा सकता है ? मध्यप्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने साथी दिग्विजय सिंह की तरह सड़क पर लड़ने का माद्दा नहीं रखते, इसलिए उनकी पसलियां टूटने का खतरा न के बराबर है। ये खतरा दिग्विजय सिंह के साथ ज्यादा है। कायदे से जो उग्रता वे दिखा रहे हैं वो उग्रता उनके विधायक बेटे को दिखाना चाहिए। उसके लिए ये अवसर है। 

    भोपाल में दिग्विजय सिंह के साथ पुलिस की या पुलिस के साथ दिग्विजय सिंह की हाथापाई की घटना को लेकर मेरी तरह मुमकिन है और लोग भी चिंतित हों, मुमकिन है कि कुछ लोग इसकी निंदा भी करें। किन्तु मै किसी की निंदा करने के बजाय सभी से संयम बरतने की अपेक्षा कर सकता हूँ। यदि संयम टूटेगा तो सिस्टम के साथ लोकतंत्र भी कलंकित होगा। सत्तारूढ़ दल को भी चाहिए कि वो व्यवस्था के नाम पर हठधर्मिता से दूर रहे और पुलिस का कम से कम इस्तेमाल करे। बाकी ' समरथ को नहीं दोष गुसाईं ' तो है ही .सरकार के हाथ कौन पकड़ सकता है ?

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