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    धार्मिकता भावनाओं पर प्रहार

    राकेश अचल का लेख। धार्मिक भावनाओं को भड़काना और उन्हें आहत करना अब किसी एक समाज,धर्म या देश का मुद्दा नहीं है बल्कि इसने अब वैश्विक स्वरूप अख्तियार कर लिया है। आने वाले दिनों के लिए ये एक खतरनाक संकेत है, इन संकेतों को समझा जाना चाहिए, इस समस्या का एक ही उपाय है कि  हम या तो अपनी सहनशीलता बढ़ाएं या फिर ऐसे मामलों को पागलपन की श्रेणी में डालकर उनकी अनदेखी करें। आहत होकर हम कोई दूसरे तरह की प्रतिक्रिया करते हैं तो इससे मनुष्यता कलंकित होती है। 

    हाल ही में धार्मिक भावनाओं को लेकर हमारे अपने देश में नूपुर ध्वनि और उसकी निंदनीय तथा कायरतापूर्ण प्रतिक्रिया पूरी दुनिया ने देखी। इन घटनाओं ने पूरे देश को न सिर्फ शर्मसार किया बल्कि समाज में वैमनस्य और असुरक्षा भी बढ़ाई, इस माले को लेकर देश की सबसे बड़ी अदलात की भी लानत-मलानत की गयी,लेकिन सरकार खामोश बैठी रही। जबकि किया धरा सब सरकारी पार्टी के ही तरफ से था ,लेकिन अच्छी खबर ये है कि  कनाडा में हिन्दुओं की एक आराध्य  देवी ' काली ' के सिगरेट पीते पोस्टर पर भारत सरकार ने सीधे नोटिस लिया है और कनाडा सरकार के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। 

    कनाडा में बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं ,इसलिए वहां काली के इस तरह के पोस्टर को लेकर प्रतिक्रिया स्वाभाविक है। कनाडा के भारतीय भारत के भारतीयों की तरह धर्मभीरु तो नहीं हैं लेकिन जैसे यहां कुछ तत्व हैं वैसे वहां भी हैं जो विघ्न पैदा करने में यकीन रखते हैं। इस विवादित पोस्टर से कनाडा के भारतीयों को भले ही कोई आपत्ति न हो किन्तु भारत में बैठे श्रृद्धालुओं को तो आपत्ति भी हो सकती है और उन्हें घर बैठे माहौल बिगाड़ने का एक मौक़ा भी मिल सकता है। ये बात और है कि  हमारे आराध्य सिगरेट से कहीं ज्यादा घातक मादक पदार्थों को स्वीकार करते हुए दिखाई देते हैं। 

    भारत में मैंने बचपन में अपने गांव में काली को मद्यपान करते और फिर उसका प्रसाद आचमन करते खूब देखा है। महाकाल की नगरी में शनि महाराज अब तक न जाने कितने लीटर मदिरा पान कर चुके हैं। मंदिर के पुजारी भक्तों को प्रसाद में मदिरा देते हैं और चढ़ावे में मदिरा लेते हैं, शिव रात्रि पर भांग और गांजा हमारे लिए महाप्रसाद होता ही है, लेकिन ये हमारा अंदरूनी मामला है, कोई दूसरा आदमी हमारे देवी देवताओं को सिगरेट कैसे पिला सकता है ? ये दरअसल एक फ़िल्म का पोस्टर है, जिसकी निर्देशिका लीना मणिमेकलाई हैं। शनिवार को लीना ने अपनी फ़िल्म 'काली' का एक पोस्टर ट्वीट किया था, उनके अनुसार ये एक परफार्मेंस डॉक्यूमेन्टरी है। हिंदू धर्म को मानने वाले कई लोग इस पोस्टर का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। 

    अच्छी और सुकून की बात ये है कि लीना मैडम दूसरे धर्म की नहीं हैं,अन्यथा बवाल और बड़ा हो सकता था। अतीत में मकबूल फ़िदा हुसैन इस तरह के प्रयोगों की वजह से भारतीय हिन्दू समाज की आलोचना के शिकार बने और अंतत: उन्हें कतर में जाकर रहना पड़ा। ताजा मामले में कनाडा में भारतीय उच्चायोग ने एक बयान जारी कर कहा, "हमें कनाडा के हिंदू समुदाय के नेताओं की ओर से एक फिल्म के पोस्टर पर देवी-देवताओं के अपमानजनक प्रस्तुतीकरण को लेकर शिकायत मिली है जो टोरंटो के अगा ख़ान म्यूज़ियम के 'अंडर द टेंट प्रोजेक्ट' का हिस्सा है."भारत की और से उच्चयोग ने कहा है कि  "टोरंटो में मौजूद हमारे काउंसुलेट जनरल ने इवेंट के आयोजकों को इन चिंताओं से वाकिफ़ करा दिया है। हमें ये भी जानकारी मिली है कि कई हिंदू समूहों ने कार्रवाई किए जाने की मांग को लेकर कनाडा में प्रशासन से संपर्क किया है। हम कनाडा की सरकार और इवेंट के आयोजकों से ऐसी भड़काने वाली चीज़ें वापस लेने की अपील करते हैं। 

    इस तरह की आपत्तियां समायिक हैं ,लेकिन हकीकत ये है कि हिन्दू देवी देवताओं कि अपमान के मामले में हम हिन्दू ही सबसे आगे हैं। बंगाल चुनाव कि समय देश और दुनिया ने भाजपा की चुनावी रैलियों में भगवान राम और हनुमान को पैदल चलकर वोट मांगते देखा था। लेकिन उस समय हमारे समाज की भावनाएं आहत नहीं हुई।  हमारी भावनाएं भी अपने मन से आहत होतीं हैं। उन्हें आहत होने कि लिए अदृश्य निर्देशों का पालन करना पड़ता है, हम हिन्दू बढ़ती मंहगाई और मठे पर ही नहीं अस्पताल कि बिस्तर पर भी जीएसटी लगाने और वसूलने से आहत नहीं होते लेकिन भगवान के प्रतीकों कि साथ कथित प्रयोगों से आहत हो जाते हैं। 

    इस मामले में मुझे अपने मित्र ओपी श्रीवास्तव की ये बात जंचती है कि अब धर्म को भी समय कि साथ अपने आपको परिष्कृत करना चाहिए। समय बदल रहा है, समय कि साथ धर्म नहीं बदल रहा, धर्म का बदलना आसान भी नहीं है ,क्योंकि उसका अपना एक ढांचा है उसे बदलना आसान भी नहीं है। हम ईंट-पत्थर कि ढांचे तो भीड़ की दम पर गिरा सकते हैं किन्तु धर्म कि ढांचे को नहीं गिरा सकते, यहीं से कटटरता का जन्म होता है और यही कटटरता कन्हैया लाल की हत्या पर जाकर रुकती है। यही कटटरता नूपुर शर्मा की जान की दुश्मन बन जाती है, जबकि धर्म में  इतनी गुंजाइशें हैं कि  वो बड़ी से बड़ी गलती को क्षमा कर सके। 

    बहरहाल ये मामला संवेदनशील है इसलिए मै इसमने ज्यादा दखल नहीं देता, काली को सिगरेट पीते देख मुझे भी अटपटा लगा ,वे सिगरेट पीते हुए न भी दिखाई जातीं तो भी आकर्षित और मोहक लगतीं लेकिन लीना  जी की लीला वे ही जानें, हमारे लिए रचनात्मकता किसी की भावनाओं को आहत करने का औजार कभी नहीं रही .रचनात्मकता को इस तरह से प्रदर्शित भी नहीं किया जाना चाहिए .कनाडा भारत की तरह धर्मान्धता का पोषक देश नहीं है. वहां विवधता में एकता साफ़ देखी  जा सकती है। कनाडा हर साल 40  लाख नए लोगों को अपने यहां रहने का अवसर देता है ,इसलिए उम्मीद की जाना चाहिए की कनाडा में लीला मैडम की फिल्म का पोस्टर वैसे हालात पैदा नहीं करेगा जैसे की भारत में एक बेचारी नूपुर शर्मा की टिप्पणी से पैदा हो चुके हैं। वैसे लीना भारतीय है और अब तक दर्जनों फ़िल्में ना चुकी हैं। वे छोटी-छोटी फ़िल्में बनतीं हैं,कविताएं लिखतीं है और उन्हें विवादास्पद तथा अस्पृश्य विषय ज्यादा पसंद हैं। 

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