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    सुप्रीम कोर्ट, ' कोर्ट ' ही है ' कोठा ' नहीं

    राकेश अचल का लेख। भारत के सप्रीम कोर्ट को लोग स्वतंत्र भारत में कोठा कहने का दुस्साहस भी करेंगे,ये किसी ने सोचा भी नहीं होगा। ये दुस्साहस भारत को हिन्दूराष्ट्र बनाने की नयी ललक ने प्रदान किया है। हाल ही में भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की खिंचाई  कर दी तो पूरी की पूरी नव हिन्दू सेना सुप्रीम कोर्ट के प्रति आक्रमक हो उठी है। 72  साल के सुप्रीम कोर्ट के लिए ये सबसे अप्रिय और असहज घड़ी हो सकती है। 

    देश की न्याय व्यवस्था को लेकर देश में मत भिन्नता आज से नहीं आजादी के समय से ही हैं किन्तु पूरा देश, देश की मौजूदा न्याय प्रणाली के प्रति आस्थावान है। ये हकीकत है कि भारत की न्याय व्यवस्था भी देश की सियासत की तरह परिवारवाद की शिकार है किन्तु इसका आशय ये बिलकुल नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट सिर्फ इसी वजह से कोर्ट के बजाय कोठा हो गया है। कोर्ट को कोठा कहना न्याय व्यवस्था के प्रति अनास्था के साथ ही कोर्ट की घनघोर अवमानना भी है। 

    सुप्रीम कोर्ट के तमाम फैसले ऐसे होते हैं जिनकी आलोचना होती है,अनेक फैसले जनता के गले नहीं उतरते। ऐसे फैसलों की समीक्षा खुद कोर्ट करता है, न्यायवेत्ता करते हैं और पूरे सम्मान के साथ अपने तर्क रखते हैं ,किन्तु ऐसे विवादास्पद फैसलों के लिए ,टिप्पणियों के लिए कोर्ट को कोठा कोई नहीं कहता। क्योंकि कोर्ट अंतत: कोर्ट है कोठा नहीं। ये अलग बात है कि यदा-कदा ऐसा करने की कोशिश सत्ता की और से की गयी और इसके लिए फैसला देने वाले माननीय देशव्यापी आलोचना के शिकार हुए। 

    सुप्रीम कोर्ट ने एक धर्म विशेष पर टिप्पणी के लिए नूपुर शर्मा को फटकारा ,क्योंकि उस टिप्पणी की वजह से कथित रूप से देश का वातावरण वैमनष्यतापूर्ण  हुआ और उदयपुर में हुई हत्या जैसी नृशंसताएं सामने आयीं। सत्तारूढ़ दल को कोर्ट से शायद ऐसी उम्मीद नहीं थी। सत्तारूढ़ दल सोच रहा होगा की कोर्ट नूपुर शर्मा की तारीफ़ करेगा और उसे हर सुविधा देगा .लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को डाटा ,उसकी सुरक्षा को लेकर फ़िक्र नहीं की ये तमाम बातें ऐसी हैं जो कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में हैं। मुमकिन है कि व्यावहारिक दृष्टि से कुछ चीजें सहीं न हों तो उनके खिलाफ फिर  से कोर्ट से निवेदन किया जा सकता था ,लेकिन ये तो नहीं होना चाहिए जो हो रहा है। 

    दुर्भाग्य ये है कि कांग्रेस हो या भाजपा दोनों ने जब-जब तानाशाह बनने की कोशिश की संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर किया। अब तो न्यायपालिका को भी नहीं बख्शा जा रहा है, ये गड़बड़ी तब और तेज हुई जब सुप्रीम कोर्ट से निवृत माननीयों को सियासत के सुख तश्तरी में रखकर पेश किये जाने लगे। रंजन गोगोई और शरद अरविंद बोवड़े के आचरण से देश के सुप्रीम कोर्ट की छवि को काफी नुक्सान भी हुआ ,बावजूद इसके मै ये मानने के लिए तैयार नहीं हूँ कि देश का सुप्रीम कोर्ट अब कोर्ट नहीं बल्कि कोठा हो गया है। जो ऐसा कहते या मानते हैं उनसे मेरी असहमति ही नहीं बल्कि खुला विरोध भी है। देश के सुप्रीम कोर्ट कि संरचना संघीय कोर्ट की तरह है। 26 जनवरी 1950 से लेकर आज तक इस सर्वोच्च न्यायालय में 47 विद्वान मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपनी निर्विवाद सेवाएं दे चुके हैं. जो अपवाद हैं, वे अपवाद हैं ,उन्हें अलग से रेखांकित करने की जरूरत नहीं ,क्योंकि देश के पहले मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एच जे कनिया से लेकर एनवी रमन तक सभी ने इस इजलास को समृद्ध किया है। देश का कोई ऐसा भूभाग नहीं है जिससे इस सर्वोच्च पद पर प्रतिनिधित्व न हुआ हो। मौजूदा मुख्य न्यायाधीश समेत शायद ही कोई ऐसा हो जिसके उत्तराधिकारी के रूप में उसके सगे-संबंधी  बैठे हों। 

    इस सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति वायवी चंद्रचूड़ यदि २६९६ दिन रहे तो  न्यायमूर्ति केएन सिंह 17  दिन भी रहे। देश के सुप्रीम कोर्ट में कुल न्यायाधीशों की संख्या 34 है ,इनमें  से एक भी ऐसा नहीं है जिसका सार्वजनिक विवादास्पद हो। एक-दो के फैसले राजनीतिक दृष्टि से आलोचना के कारण बने हैं किन्तु इससे समूचे सुप्रीम कोर्ट की छवि प्रभावित हुई हो ये नहीं कहा जा सकता। इसलिए पूरे परिदृश्य में जिन माननीय न्यायमूर्ति ने नूपुर शर्मा को लताड़ा उनकी जन्मकुंडली खोलकर बैठना धूर्तता की पराकाष्ठा है। वे यदि सचमुच दागी हैं तो वे इस पद पर कैसे हैं ? क्या सरकार की आँखें बंद हैं ?

    देश में लोकतंत्र बचाये रखने में देश के सुप्रीम कोर्ट की अहम भूमिका रही है। बीते 72  साल में ऐसे अनेक अवसर आये जब लगा कि सरकार और सुप्रीम कोर्ट आमने-सामने हैं लेकिन अंतत: टकराव टला.सरकार ने अपने प्रतिकूल फैसलों को संसद की ताकत से भले बदला हो किन्तु कभी सीधे सुप्रीम कोर्ट को अपना तोता -मैना बनाने की कोशिश नहीं की, और यदि की भी तो उसे मुंह की खाना पड़ी। उदाहरणों के लिए आपको अतीत की खिड़कियाँ खोलना पड़ेंगीं। हकीकत ये है कि हमारे देश का सुप्रीम कोर्ट अभी भी अभिनंदन के योग्य है क्योंकि उसने कभी सत्तारूढ़ दल के सामने समर्पण की मुद्रा अख्तियार नहीं की ,निजी तौर पर यदि किसी ने कुछ किया है तो उसने अपना सम्मान खो भी दिया। 

    सुप्रीमकोर्ट के अवकाश कालीन न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति और जेबी पारदीवाला के फैसले का सम्मान नूपुर शर्मा और पूरे देश को करना चहिये ,ये नहीं मानना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट ने ये फटकार इस्लामी राष्ट्रों को खुश करने के लिए लगाईं है। ये काम सुप्रीम कोर्ट का नहीं,केंद्र सरकार का है। कोर्ट अपना काम कर रहा है,सरकार को अपना काम करना चाहिए जो वो नहीं कर रही है। नूपुर  के खिलाफ आधा दर्जन से ज्यादा मामले दर्ज हैं किन्तु उसे  अब तक गिरफ्तार नहीं किया गया ,उल्टे उसे संकट  में देख सुरक्षा और प्रदान की गयी। नूपुर की जगह यदि आप या मै होते तो शायद ये सुविधा हमारे हिस्से में नहीं आती, नूपुर को सुरक्षा मिले ,जरूर मिले ,क्योंकि ये उसका अधिकार है लेकिन उसकी आड़ में देश के सुप्रीम कोर्ट को निशाने पर लिया जाये ये अशोभनीय और अनावश्यक है, इसे रोका जाना चाहिए। 

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