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    कानपुर। माहे मुहर्रम विशेष रूप से इसके पहले अशरे की पवित्रता का ख़्याल रखा जाये :- मौलाना अब्दुल्लाह क़ासमी

    ............. इस्लामी नये साल 1444  हिजरी की आमद पर जमीयत उलेमा शहर कानपुर ने गाईडलाइन जारी की

    इब्ने हसन ज़ैदी\कानपुर। कुरान के अनुसार  4 पवित्र महीने जीकादा, ज़िलहिज्जा, मुहर्रम और रजब हैं। यह महीने एहतराम वाले हैं। जिनमें इबादत का सवाब और गुनाहों का अज़ाब दूसरों महीने से बढ़कर होता है। इसलिए भी यह महीने पवित्र कहलाते हैं, पहले नबियों की शरीयतों में भी इन महीनों में जंग करना हराम और मनाही थी, यहां तक कि मक्का के लोग भी किसी हद तक इस निषेधाज्ञा का लिहाज करते थे, इनमें से एक महीना मुहर्रमुल हराम है जो और भी कई ऐतिहासिक परंपराएं अपने अंदर शामिल रखता है और इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है। 

    इसी महीने की 1 तारीख को दूसरे खलीफा सैयदना उमर बिन खत्ताब रजि की शहादत हुई और नवासा ए रसूल सैयदना हजरत हुसैन की मज्लूमाना शहादत भी हुई। इसी में आशूरा के दो रोजे भी रखे जाते हैं जो रमजान के रोजे़ के बाद सबसे ज्यादा फज़ीलत वाले हैं।बराबर हालात पर नजर जमाए हुए हैं, इस पर नोटिस ले रहे हैं। पिछले दिनों मुहर्रम  के कुछ पारंपरिक कार्यक्रमों पर भी जिस अंदाज से रोक लगाने की कोशिशें हुई हैं। बुजुर्गों की फिक्र के मुताबिक जमीअत उलमा इस आचरण से सहमति नहीं रखती। हम ऐसा प्रयास करने वाले संकीर्ण मानसिकता के लोगों की निंदा करते हैं और दिल से दुआ करेंगे कि वह भी हक बात कहने वाले और इंसाफ करने वाले बन जाएं भविष्य में मुसलमानों के संबंध से होने वाले पारंपरिक कार्यक्रमों को किसी तरह प्रभावित करने की कोशिश हुई तो जमीयत उलेमा हर स्तर पर जाकर कानूनी कार्रवाई करने से भी पीछे नहीं हटेगी।

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