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    हे पार्थ ! क्या खाते हो रुपया ?

    राकेश अचल का लेख। पार्थ नाम बहुत ऐतिहासिक है ,शायद इसीलिए पश्चिम बंगाल के मंत्री पार्थ चटर्जी ने भी भ्र्ष्टाचार के मामले में भाजपा की बराबरी करने के लिए अपने और अपने चाहने वालों के  घर में रुपयों का पहाड़ बना लिया। पार्थ के घर ईडी का छापा परोक्ष रूप से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के घर छापा है। पार्थ की करीबी के  घर मिले नोटों की गिनती के लिए ईडी को मशीन का सहारा लेना पड़ रहा है। कोई पार्थ से पूछकर बताये कि क्या वे रूपये खाते हैं ?

    भ्र्ष्टाचार के मामले में अभी तक प्रतिस्पर्द्धा कांग्रेस और भाजप्पा के बीच ही चल रही थी, किन्तु अब इसमें तृण मूल कांग्रेस भी शामिल हो गयी है। मध्य प्रदेश में जैसा व्यापम  घोटाला एक दशक पूर्व हो चुका है वैसा ही भर्ती घोटाला अब पश्चिम बंगाल में पकड़ा गया है। मध्यप्रदेश में नोट गिनने की मशीनें सिर्फ इसलिए नहीं आयीं क्योंकि यहां घोटाले के इपिक सेंटर पर ईडी को भेजा ही नहीं गया ,फिर भी खबरें खूब चलीं कि मध्यप्रदेश में भी व्यापम घोटाले से मिला रुपया गिनने के लिए श्यामला हिल वालों के यहां एटीएम लगी हुई थी। राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष को एक करने का अभियान चलने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के राज्य में भर्ती घोटाले की भनक मिलने के बाद  प्रवर्तन निदेशालय ने   कई ठिकानों पर छापेमारी की। 

    बंगाल के एक मंत्री पार्थ चटर्जी की करीबी अर्पिता चटर्जी के घर से ईडी  ने करीब 20 करोड़ नगद मिले। 20 करोड़ रुपए के नोट गिनने के लिए मशीन के साथ बैंक के अधिकारियों को भी लगाया गया। अर्पिता मुखर्जी के घर से 20 मोबाइल फोन भी जब्त किए गए हैं। मंत्री पार्थ चटर्जी के घर भी छापा मारा गया। ईडी पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग और पश्चिम बंगाल प्राथमिक शिक्षा बोर्ड में भर्ती घोटाले से जुड़े अलग-अलग जगहों में तलाशी अभियान चला रहा है। फिलहाल इस पूरे विवाद से टीएमसी ने खुद को दूर कर लिया है, जो विवाद पार्टी और सरकार के लिए किरकिरी का सबब बन सकता है, इस  मुद्दे से बचने की जद्दोजहद शुरू हो गयी है। 

    तृण मूल कांग्रेस ने एक आधिकारिक बयान जारी खुद को इस घोटाले से दूर कर लिया है, कहा गया है कि पार्टी  का इन पैसों से कोई लेना देना नहीं है, जांच में जिनके भी नाम सामने आए है जवाब देना उनका और उनके वकीलों का काम है। टीएमसी अभी पूरे मामले को करीब से देख रही है. समय आने पर प्रतिक्रिया दी जाएगी। अब ममता की पार्टी ने तो ये कह  कर पल्ला झाड़ लिया, लेकिन बंगाल में बीजेपी ने इसे बड़ा मुद्दा बनाने में जरा भी देरी नहीं की।  बीजेपी नेता शुभेंदू अधिकारी ने ट्वीट कर कहा कि अर्पिता मंत्री की करीबी हैं। 

    मध्यप्रदेश के बाद बंगाल में भर्ती घोटाले से अवैध कमाई की पुष्टि से जाहिर हो गया है कि देश में अब कोई भी दूध का धुला नहीं है। दूध से धुले नेताओं का युग बीत चुका है। ईडी चाहे तो हर राज्य में ऐसे घोटाले उजागर कर सकती है ,क्योंकि देश में इन दिनों विधायक और सांसद ही करोड़ों में बिक रहे हैं  ,किन्तु ईडी को शिकार चिन्हित कर दिए जाते हैं। ईडी अपने आप कुछ नहीं कर सकती। ईडी एक पालतू श्वान है ,जो मालिक की ' छू ' सुनकर ही अपने शिकार पर झपट्टा मरती है। पिछले आठ साल में ईडी ने भाजपा शासित एक भी सूबे में इस तरह की कार्रवाई नहीं की। हालाँकि पहले इस तरह की कार्रवाइयां हुईं। मध्यप्रदेश में तो तत्कालीन शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा को तो इस मामले में जोड़े जाने के बाद अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा। एक आईएएस अफसर अरविंद जोशी गुमनाम मौत मर गए। 

    मै शुरू से कहता आया हूँ कि राजनीति में अधिकाँश लोग या तो रुपया कमाने आते हैं या फिर अपना जमा किया हुया रुपया बचाने के लिए आते हैं। राजनीति है ही रुपया कमाने की मशीन, कोई अपने लिए रुपया कमाता है तो कोई पार्टी के लिए, पकड़ा जाता है तो सब पल्ला झाड़ लेते हैं ,शहादत देना पड़ती है उस आदमी को जो कमाए गए रूपये का असल मालिक नहीं होता। मध्यप्रदेश में करोड़ों रुपया कमाने वाले मंत्री ,आईएएस अफसर और ठेकेदारों की एक लम्बी फ़ौज थी और है। बंगाल का मामला सामने आने के बाद लगता है कि ऐसी फौजें हर सूबे में होती होंगीं। बिना इनके सरकारें चल ही नहीं सकतीं। 

    अवैध रूप से धन कमाने की इन फौजों के खिलाफ केंद्र की मुहिम का स्वागत किया जाना चाहिए,पर ऐसा होगा नहीं, हो भी नहीं सकता क्योंकि ये कार्रवाई दलगत विद्वेष की गरज से की जाती है। मध्यप्रदेश में डम्पर घोटाले से लेकर व्यापम घोटाले तक में नाम आने के बाद किसी का कुछ नहीं बिगड़ा, सब के सब सत्ता के केंद्र में हैं क्योंकि मोदी जी की कृपा उनके ऊपर बरस रही है, मोदी जी खुद एक सूबे के डेढ़ दशक तक मुख्यमंत्री रहें हैं इसलिए खूब जानते हैं कि राज्यों में धनकुबेर कैसे बना जाता है ? उनकी किस्मत है कि उनके या उनकी सरकार के खिलाफ ईडी का इस्तेमाल होने से पहले ही वे केंद्र की सत्ता में आ गए। लेकिन कहते हैं की - बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ? ऊँट एक न एक दिन तो पहाड़ के नीचे आएगा। 

    देश को रुपया कमाने का रास्ता कांग्रेस ने दिखाया। आपको हिमाचल वाले सुखराम याद होंगे ही ! फिर तो हर पार्टी कांग्रेस के दिखाए इस ' मुद्रा मार्ग ' पर चल पड़ी। बंगारू लक्ष्मण और ठाकुर दिलीप सिंह जो देव जैसों की एक लम्बी फेहरिश्त देश के पास है। हर दल के लोग इसमें शामिल हैं। पकड़े केवल वे लोग जाते हैं जिनका नसीब  खराब होता है, वे खुशनसीब हैं जो इस समय सत्तारूढ़ दल की छत्रछाया में हैं। सत्ता का छाता हर ऐब को छिपा लेता है ,बल्कि रुपया कमाने की सहूलियत भी देता है। सत्ता के संरक्षण के बिना आप एक फूटी कौड़ी भी नहीं कमा सकते, कोई आपको कमाने ही नहीं देगा। 

    बहरहाल केंद्र सरकार आगामी चुनाव से पहले इसी तरह के धनपशुओं को खोज-खोज कर अपना काम आसान करने में जुटी है। जो सत्ता के अनुकूल हैं वे धनपशु बचे हैं और बचे रहेंगे, वे चाहें तो दही,मही बेचकर भी रुपया कमा सकते हैं ,क्योंकि अब इन उत्पादों पर भी जीएसटी लगती है। रूपये कमाने के लिए भ्र्ष्टाचार अनिवार्य शर्त नहीं है, आप ईमानदारी से सरकार के साथ रहकर भी दुसरे अडानी,अम्बानी या बाबा रमदेव बन सकते हैं, कोशिश तो कीजिये, फिलहाल ममता बनर्जी के प्रति देश की सहानुभूति होना चाहिए। 

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