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    शाहजहांपुर। सुनासिर नाथ मंदिर : पर शिव भक्तों की होती हैं, सभी मुरादें पूरी।

    ........ सावन माह में शिवभक्तों का उमड़ता है, जन सैलाव होती हैं, सभी मनोकामनाएं पूरी । 

    शाहजहांपुर। बंडा के खुटार रोड से लगभग 9 किलोमीटर दूर पर बसा सुनासिर नाथ का यह पावन स्थल आस्था और श्रद्धा का केंद्र है। गोमती नदी की अविरल धारा के समीप स्थित यह मंदिर हजारों लाखों लोगों की आस्था एवं विश्वास से जुड़ा हुआ है। सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ यहां आने आने वाले भक्तों की प्रत्येक मनोकामनाएं पूर्ण होती है। खुटार बंडा के अलावा यहां पर आसपास के साथ साथ गैर जनपदों से बड़ी संख्या में भोले नाथ के भक्त दर्शन के लिए आते हैं। 

    पूर्णिमा तथा अमावस्या पर यहां बड़ी संख्या में मेला लगता है। और अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए लोग भगवान शिव के चरणों में मां गोमती का जल लेकर जलभिषेक के साथ बेल पत्र, भांग, धतूरा दूध चढ़ाते हैं, सबसे ज्यादा भीड़ यहां श्रावण मास और महाशिवरात्रि पर्व में होती है। पूजा अर्चना करने के लिए भक्तों की लंबी लंबी कतारें लग जाती है। तथा दूर दराज से जल लेकर आने वाले कांवड़िए यहां जल चढ़ाते हैं। वैसे तो यहां सालभर शिवभक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन सावन माह में दूर दूर से यहां भोले नाथ के भक्त जलभिषेक करने आते हैं। यहां बने छोटे-छोटे मंदिर श्रद्धालुओं की मनोकामनाओं की पूर्ति होने पर उनके द्वारा बनवाये गये हैं। 

    • क्या है, सुनासिर नाथ की कहानी ।

    मंदिर के मंहत रमेश गिरी बताते हैं,कि इंद्र ने गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या के साथ छल किया था। इससे क्रोधित होकर गौतम श्रषि ने अपने पत्नी अहिल्या के साथ  इंद्र को भी श्राप दिया था। श्रापमुक्ति के लिए इंद्र ने इस स्थान पर तपस्या की थी। और भगवान शिव ने प्रकट होकर इंद्र को 101 शिवलिंग की स्थापना करने को कहा था। तब भगवान शिव ने इंद्र का शरीर सूना कर दिया था। तभी से इसका नाम सुनासिर नाथ पड़ गया। मंहत ने बताया यहां पर मौजूद वृक्ष इंद्र का शरीर हैं। और भगवान शिव अपने परिवार के साथ यहां विराजमान हैं। प्रतिबर्ष महाशिवरात्रि पर्व  से एक दिन‌ पहले कुंड में भरे जल को निकालकर साफ सफाई की जाती है। महाशिवरात्रि पर मंदिर को झालर व लाइटों से सजाया जाता है जो आकर्षक का केन्द्र बन रहता है।

    • क्या है, भोले के श्रद्धालुओं की मान्यता पुरानी सुनासिर नाथ का इतिहास ।

    ऐतिहासिक धरोहर को छिपाए सुनासिर नाथ मंदिर का इतिहास बरसों पुराना है। बताते है कि मंदिर से 500 मीटर पहले ही सुनासिर नाथ मंदिर था। उसी स्थान पर श्रद्धालु पूजा अर्चना करते थे। उस दौरान मुगल शासक के लोगों के द्वारा उस स्थान से भगवान शिव की प्रतिमा को हटाने का हर संभव प्रयास किया था।‌ लेकिन भगवान शिव की प्रतिमा अपने स्थान से हिली भी नहीं। तब मुगलों ने भगवान शिव के स्थान को अपवित्र करने के इरादे से प्रतिबंधित पशु का वध करा दिया था। उसी रात भगवान शिव की प्रतिमा स्वयं ही खिसककर गोमती नदी के किनारे जाकर स्थिर हो गयी। तब से उस स्थान को पुरानी सुनासिर कहा जाने लगा।

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