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    कर्नाटक में नफरत के जहर का असर

    राकेश अचल का लेख। कर्नाटक में भारतीय जनता युवा मोर्चे के एक जिला सचिव प्रवीण नेट्टारू की निर्मम तरीके से हत्या कर दी गई। दुकान बंद कर घर लौटते वक्त उन पर धारदार हथियारो  से वार किया गया। हत्या के पीछे पीएफआई का नाम सामने आ रहा है। प्रवीण की हत्या एक नामालूम भाजयुमो नेता की हत्या ही होती यदि इसका सम्बन्ध नूपुर से बाबस्ता न होता, अब सवाल ये है कि जहाँ ये ह्त्या हुई है वहां भाजपा की सरकार है इसलिए इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाये ?

    कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले में बीजेपी के 32 साल के युवा नेता प्रवीण नेट्टारू की मंगलवार को हत्या कर दी गई। प्रवीण भाजपा युवा मोर्चा के जिला सचिव थे। प्रवीण ने 29 जून को राजस्थान में मारे गए कन्हैयालाल की हत्या के विरोध में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखी थी और एक महीने के अंदर ही उनकी हत्या कर दी गयी।  केंद्र सरकार को अब मान लेना चाहिए कि नफरत का जहर राजस्थान ,गुजरात या मध्यप्रदेश में ही नहीं बल्कि कर्नाटक में भी फ़ैल चुका है, फैला तो बांग्लादेश तक है किन्तु फिलहाल बात भारत की जा रही है। 

    'जी न्यूज'  में लम्बे अरसे तक खबरों का अपनी तरह से डीएनए करने वाले सुधीर चौधरी को हैरानी है कि प्रवीण  की हत्या के बाद भी आरोपी संगठन को प्रतिबंधित क्यों नहीं किया गया ? प्रतिबंधित संगठन को सिमी का नया संस्करण बताया जा रहा है। इस हत्या के बाद सरकार क्या करे और क्या होना चाहिए इस बारे में हम सुधीर चौधरी की तरह कोई मश्विरा नहीं दे सकते। किन्तु हम भी सवाल उठा सकते हैं कि राज्य सरकार ने प्रवीण की सुरक्षा क्यों नहीं की ? क्या इस वारदात के बाद कोई राज्य सरकार से इस्तीफे की मांग कर सकता है ?

    भाजपा की बर्खास्तशुदा प्रवक्ता नूपुर शर्मा द्वारा बोये गए नफरत के बीज अब दरख्त बन चुके हैं। एक कन्हैया नहीं बल्कि एक से ज्यादा कन्हैया इस नफरत की आग में अपने प्राणों की आहुति दे चुके हैं ,लेकिन किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा कि नूपुर शर्मा का क्या किया जाये ? नूपुर देश की सबसे बड़ी  अदलात की शरण में हैं। उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगी है। वे सरकारी संरक्षण में हैं क्योंकि उन्हें भी जान से मारने की धमकियां दी गयीं हैं।  धमकियां तो बहुत से लोगों को मिलती हैं किन्तु सरकार और अदालत का संरक्षण नूपुर जैसे खुशनसीब लोगों को ही मिलता है। 

    कर्नाटक में प्रवीण के हत्यारे फौरन पकडे जाएँ ,पकड़े जाना ही चाहिए ,लेकिन इसके इतर इस बात पर गौर क्यों नहीं किया जा रहा की बढ़ती हुई नफरत की आग अब कैसे रोकी जाये ? क्या इसके लिए इस्लामिक बुद्धजीवियों को पहल करना चाहिए या फिर कानून को और सख्त होना चाहिए ? कानून नफरत की आग को फैलने से रोक पाता ?  होता तो  ये काम कभी का हो चुका होता। ये काम कानून के बूते का नहीं है। ये काम इनसानों को ही करना होगा ,अन्यथा खूंरेजी का ये सिलसिला मुसलसल चलता रहेगा, कहीं न कहीं कन्हैया  या प्रवीण जैसे निर्दोष मारे जाते रहेंगे। हत्यारों को भी समझना चाहिए कि इस खून खराबे से कोई अल्लाह -ईश्वर खुश होने वाला नहीं है ,क्योंकि सब उसी के बन्दे हैं। 

    धार्मिक असहिष्णुता किसी भी व्यवस्था के लिए खतरा है। लोकतंत्र के लिए तो ये खतरा और ज्यादा है। लेकिन लगता है की लोकतंत्र के रक्षक इस बात को लेकर बहुत ज्यादा फिक्रमंद नहीं हैं। शायद उनका एजेंडा ही यही है कि देश में धार्मिक उन्माद और वैमनष्यता बनी रहे ताकि सियासी रोटियां पकती रहें। किन्तु मनुष्यता इसकी इजाजत नहीं देती। कमान से निकला तीर और जुबान से निकले शब्द वापस नहीं लौटते और अगर लौटते भी हैं तो अपना काम पूरा करके लौटते हैं। नूपुर शर्मा ने भी अपने कहे के लिए खेद प्रकट कर दिया था किन्तु बात नहीं बनी  | जबकि बात बन जाना चाहिए थी। 

    मौलिक सवाल जस का तस है। सवाल ये है कि हम जानबूझकर कोई ऐसा कृत्य करें ही क्यों जिससे लोग भड़कें,  लोगों को सरकारें नहीं भड़कातीं.लोग खुद भड़कते हैं। कोई अदालत इसे नहीं रोक सकती, क़ानून का इकबाल इतना बुलंद नहीं है कि लोग उससे डरें ,उसका सम्मान करें। कानून के हाथ लम्बे होते हैं लेकिन केवल फ़िल्मी संवादों में, हकीकत में कानून आज भी अंधा है। कानून को वो ही दिखता है जो उसे दिखाया जाता है। यदि ऐसा न होता तो नूपुर शर्मा बाहर और नूपुर शर्मा को धमकाने वाला अंदर न होता ? कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए। नूपुर की गिरफ्तारी को सत्तारूढ़ दल ने शायद अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया हैयदि ऐसा न होता तो नूपुर एक दिन के लिए जेल जाकर भी अपनी कानूनी लड़ाई जारी रख सकती थी। 

    बहरहाल देश में सब कुछ चलता रहेगा और नूपुर शर्मा का प्रसंग भी शायद कभी समाप्त नहीं होगा। कम से कम आम चुनावों तक तो नहीं होगा। क्योंकि नूपुर शर्मा सत्तारूढ़ दल के एजेंडे को पूरा करने के लिए भविष्य का एक बड़ा औजार साबित होने वाली हैं, वे भाजपा के लिए भविष्य की वीरांगना हो सकतीं हैं। इसीलिए भाजपा परोक्ष रूप से नूपुर शर्मा के लिए हर तरीके से लड़ाई लड़ रही है। भाजपा की हर लड़ाई तरीके से ही लड़ी जाती है। अकेले नूपुर प्रसंग में ही नहीं भाजपा सोनिया गाँधी के प्रकरण में भी अपनी 'ईडीशाही '  को पूरी गंभीरता से इस्तेमाल कर रही है। 

    सरकार का काम सरकार कर रही  है और उसमें हस्तक्षेप का हमें न हक है और न हम ऐसा करने का दुस्साहस कर सकते हैं। हम अपना काम कर रहे हैं वो   भी बिना किसी नफा-नुक्सान की फ़िक्र किये बिना, लोकतंत्र को बचाने के लिए हम जैसा आम आदमी या तो मौन रह सकता है या फिर लिख पढ़ सकता है |  सड़कों पर उतरना तो सबने कमोवेश बंद ही कर दिया है | ये बात अलग है कि अमेरिका ,श्रीलंका के बाद ईरान की संसद में आम जनता घुस चुकी है  | भारत में ये नौबत न आये इसके इंतजाम अभी से किये जाने चाहिए | दही और मही पर जीएसटी लगाने वाली सरकार से हम ज्यादा उम्मीद नहीं कर सकते  | अराजकता की और बढ़ रहे मुल्क का भगवान ही ईश्वर है ,क्योंकि हमारे हुक्मरान तो '  न भूतो न भविष्यति '  वाले रामौतार हैं, किसी ईश्वर से कम नहीं। 

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