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    शिंजो आबे का बलिदान, नहीं भूलेगा जापान

    राकेश अचल का लेख। जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे दुनिया में चौतरफा फैली नफरत की भेंट चढ़ गए।उनकी हत्या ठीक उसी तरह हुई जिस तरह 74 साल पहले भारत में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हुई थी। शिंजो आबे और गांधी में फर्क सिर्फ इतना था कि वे खानदानी राजनीतिज्ञ थे और महात्मा नहीं थे। दुनिया में जापानी राष्ट्रवाद सबसे अलग और अनुकरणीय माना जाता है। जापान बुद्ध का अनुयाई देश है। वहां हिंसा अतीत का काला अध्याय है। जापान ने एटमी हथियारों की मार को झेला है। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि जापान में भी कोई गांधी की तरह गोली का शिकार बनेगा। लेकिन हत्यारे भूल जाते हैं कि बारूद कभी मनुष्यता को भस्मीभूत नहीं कर सकती।

    शिंजो क्या थे और क्या नहीं थे, ये बताने की जरूरत नहीं है। उन्होंने अपने कार्यकाल में जापान को बनाने में अभूतपूर्व योगदान दिया। उन्होंने जापान को एक अलग पहचान देने की कोशिश की और शायद यही कोशिश शिंजो की हत्या की एक वजह हो। जापानी मीडिया के पास भारतीय मीडिया की तरह तीसरी आंख नहीं है अन्यथा अब तक हम शिंजो की हत्या का सच जान चुके होते।

    भारत -जापान संबंध बनाने में शिंजो की लंबी भूमिका रही है। मोदी युग के पहले से वे भारत के खैर ख्वाह रहे हैं। डॉ मनमोहन सिंह के जमाने से शिंजो का भारत आना जाना लगा रहा। मोदी युग में ये प्रगाढ़ता और बढ़ रही थी। शिंजो की छवि बड़ी मोहक रही है। उन्हें सत्ताच्युत नहीं किया गया था।वे स्वास्थ्य कारणों से खुद कुर्सी से हटे थे।ऐसा कम ही होता है।

    शिंजो ने भारत के साथ अनेक परियोजनाओं पर काम शुरू किया था, वे अब अधर में हैं। उनकी हत्या से भारत स्तब्ध है। शिंजो का जाना इस बात का प्रमाण है कि फांसीवाद जिंदा है।उसे मारना आसान नहीं। ये लड़ाई अनवरत जारी है।भारत के लिए नफरत पहले से एक बड़ा मुद्दा है। संदर्भ के लिए बता दूं कि एक प्रमुख राजनीतिक परिवार में जन्मे आबे 1993 के चुनाव में प्रतिनिधि सभा के लिए चुने गए थे। सितंबर 2005 में उन्हें प्रधान मंत्री और एलडीपी अध्यक्ष के रूप में बदलने से पहले सितंबर 2005 में प्रधानमंत्री जुनिचिरो कोइज़ुमी द्वारा मुख्य कैबिनेट सचिव नियुक्त किया गया था। बाद में उन्हें राष्ट्रीय डायट के एक विशेष सत्र द्वारा प्रधान मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया, जो जापान के सबसे युवा और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पैदा होने वाले पहले व्यक्ति प्रधान मंत्री बने। 

    आबे ने कार्यालय में एक वर्ष के बाद ही प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया था जिसका कारण चिकित्सा जटिलताताएँ थीं, ऐसा उनकी पार्टी के उस वर्ष के हाउस ऑफ काउंसिलर्स चुनाव हारने के तुरंत बाद हुआ था। इसके बाद, उन्हें यासुओ फुकुदा द्वारा प्रतिस्थापित किया गया, जो पांच प्रधानमंत्रियों की श्रृंखला में पहले बने, जो सोलह महीने से अधिक समय तक कार्यालय बनाए रखने में विफल रहे थे।

    अपनी बीमारी से उबरने के बाद, आबे ने सितंबर 2012 में दूसरी बार एलडीपी अध्यक्ष बनने के लिए एक मतपत्र में पूर्व रक्षा मंत्री शिगेरू इशिबा को हराकर अप्रत्याशित राजनीतिक वापसी की। दिसंबर में आम चुनाव में एलडीपी की शानदार जीत के बाद वे 1948 में शिगेरू योशिदा के बाद कार्यालय में लौटे और ऐसा करने वाले वे पूर्व प्रधान मंत्री बने। उन्होंने 2014 और 2017 के चुनावों में एलडीपी को दो और जीतों का नेतृत्व किया तथा इस प्रकार जापान के सबसे लंबे समय तक रहने वाले राष्ट्रपति बने। अगस्त 2020 में, आबे ने अपने बीमारी का हवाला देते हुए राष्ट्रपति मंत्री के रूप में अपने दूसरे इस्तीफ़े की घोषणा की।डायट के मुख्य कैबिनेट सचिव योशीहिदे सुगा को अपना उत्तराधिकारी चुने जाने पर उन्होंने 16 सितंबर को अपना इस्तीफ़ा दे दिया था।

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