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    राष्ट्र-चिंतन: मांस,मदिरा, साड़ी,गाड़ी और होटल बना झारखंड भाजपा की पहचान

    • ईसाई-कसाई की अराजकता भाजपा के काल बनी 
    • ईसाई-कसाई के समर्थकों,दलबलुओं के कब्जे में भाजपा 
    • बाबूलाल मरांडी, दीपक प्रकाश, अर्जुन मुंडा के रहते भाजपा इसी तरह हारती रहेगी 

    आचार्य श्री विष्णुगुप्त (वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीति विशेषज्ञ)

    विशेष लेख। झारखंड के मांडर विधान सभा उप चुनाव में भाजपा की करारी हार न केवल अपमानजनक है बल्कि भाजपा के कमजोर होने का भी प्रमाण है। भाजपा की करारी हार भी उस स्थिति में हुई है जब भाजपा में एक से बढ़कर एक महारथी हैं और सबके सब महारथी अपने आप को अति महान और बड़े जनाधार वाले नेता कहते हैं, मानते हैं तथा वैसा ही आचरण करते हैं। भाजपा के महारथियों की जरा सूची देखिये। भाजपा के महारथियों में बाबूलाल मरांडी हैं, अर्जुन मुंडा हैं, दीपक प्रकाश है, पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास हैं, संगठन महामंत्री धर्मपाल हैं, क्षेत्रीय संगठन महामंत्री नागेंद्र हैं। इन सभी महारथियों ने चुनाव परिणाम आने से पूर्व यह दावा किया था कि भाजपा मांडर में कोई एक-दो हजार नहीं बल्कि बीस हजार से ज्यादा वोटों से चुनाव जीतेगी। मांडर विधान सभा चुनाव परिणाम आने पर उल्टा हुआ और भाजपा प्रत्याशी गंगोत्री कुजुर बीस हजार से ज्यादा वोटों से चुनाव हार गयी। आरती कुजुर की हार के लिए सिर्फ और सिर्फ भाजपा के बड़े-बड़े ईसाई-कसाई समर्थक अहंकारी, हवाहवाई व दलबदलुओं को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। भाजपा कार्यकर्ताओं से लोग प्रश्न पूछते थे कि जब आपके नेता ही ईसाई और कसाइयों के चरणागत होते हैं तो फिर हम क्यों भाजपा को वोट दें, ईसाई और कसाई से हम दुश्मनी क्यों मोल लें, आखिर मुझे तो गांव में इन्ही के साथ रहना होगा। निश्चिततौर पर मांडर विधान सभा सीट पर भाजपा प्रत्याशी की हार भाजपा के लिए बहुत बड़ा सबक है। हेमंत सोरेन सरकार में भाजपा सभी उप चुनाव हार चुकी है।

    फिर भी केन्द्रीय नेतृत्व इस हार के कारणों की पड़ताल नहीं करेगा और अंहकारी, हवाहवाई तथा दलबलुओं से भाजपा मुक्ति पाने की इच्छा भी नहीं रखती है। झारखंड में भाजपा की पहचान मांस, मदिरा,साड़ी, गाड़ी और होटल बन गया है। झारखंड के भाजपा कार्यकर्ता इसके लिए दोष केन्द्रीय नेतृत्व को ही देते हैं। भाजपा कार्यकर्ताओं का सीधा आरोप है कि केन्द्रीय नेतृत्व ने युवा नेतृत्व उभारने में असफल रहा है, जनाधार वाले और परिश्रमी नेताओं की फौज खड़ी करने की जगह अंहकारी, हवाहवाई और दलबदलुओं को स्थापित किया है। भाजपा कार्यकर्ताओं के  आरोपों को नकारा नहीं जा सकता है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश दलबदलू हैं। दीपक प्रकाश एक क्षेत्रीय पार्टी मे जाकर लौटे हैं। दीपक प्रकाश की ख्याति केन्दी्रय नेताओं के सम्मान में सक्रिय रहने की है। दीपक प्रकाश की रांची से बाहर कोई खास पहचान नहीं रही है। लेकिन दीपक प्रकाश के विद्यार्थी कार्यकाल में जयप्रकाश नड्डा से परिचय काम आ गया, थोड़ी बहुत मदद इनकी झारखंड के तत्कालीन प्रभारी ओम माथुर ने कर दी थी, इसी कसौटी पर दीपक प्रकाश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी बन गये और राज्य सभा में भी पहुंच गये। बाबूलाल मरांडी की अपनी कोई पहचान नहीं थी। विश्व हिन्दू परिषद और  ने इनकी जिंदबी बदली थी। भाजपा ने इन्हें पहले केन्द्रीय मंत्री और फिर मुख्यमंत्री बनाया। फिर भी बाबूलाल मरांडी विश्वासघात किया और अपनी क्षेत्रीय पार्टी बना डाली, सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि भाजपा को मिटाने की कसमें भी खूब खाते थे और भाजपा के लिए शर्मनाक गालियां और मुहावरे प्रस्तुत करते थे। वर्षो बाहर रहने के बाद भाजपा में लोटे और फिर निर्णायक भूमिका इनको चरणों में प्रस्तुत कर दी गयी। बाबूलाल मरांडी ने अपनी पार्टी का विस्तार और सक्रियता ईसाई और कसाई जनाधार में सुनिश्चित की थी। मरांडी को खासकर चर्च से व्यापक समर्थन मिलता था। भाजपा के लोग दबे जबान से बोलते हैं कि बाबूलाल मरांडी अप्रत्यक्षतौर पर ईसाई और कसाई का समर्थन अभी भी करते हैं। इधर बाबूलाल मंराडी ने अपने पुराने समर्थकों को भाजपा में वापसी कराने के अभियान में सक्रिय है। खासकर प्रवीण सिंह की भाजपा में वापसी के पीछे मरांडी और रवीन्द्र राय की भूमिका रही है। प्रवीण सिंह सर्व शक्ति संपन्न और शक्ति प्रदर्शन करने वाले नेता रहे हैं, पर प्रवीण सिंह की वापसी भाजपा के लिए घाटे का प्रसंग है।इन्हें भाजपा ने विधान पार्षद बनाया था फिर भी प्रवीण सिंह नीतीश कुमार की पार्टी जद यू में जाकर भाजपा की कब्र खोदने की कसमें खाते थे। रघुवर दास की सरकार के समय ईसाइयों और कसाइयों की अराजकता का दमन करने की कोई खास प्रयास नहीं हुए थे।

    भाजपा और संघ कभी चर्च को सीधे चुनौती देते थे। उस काल में आदिवासी क्षेत्रों में संघ और भाजपा की उपस्थिति बहुत ही शक्तिशाली और गंभीर होती थी। भाजपा और संघ के लोग चर्च के खिलाफ सीधी लड़ाई लड़ते थे और चर्च के धर्मातरंण को असफल करते थे। सत्ता सुख के कारण भाजपा और संघ के लोग शहरीकरण में तब्दील हो गये। इस कारण आदिवासी क्षेत्रों में चर्च को पूरी छूट मिली और चर्च का एकाधिकार बन गया। बड़े पैमाने पर चर्च ने धर्मातंरण किया। धर्मातंरण के खिलाफ उठने वाली इक्का-दुक्का आवाजों को खामोश करने का काम होता है। प्रिया मुंडा नामक एक मुंडा लड़की ने जब चर्च के धर्मातरंण करतूत के खिलाफ और चर्च से अपनी संस्कृति को बचाने की लड़ाई लडी तो फिर उस पर मुकदमें दर्ज करवा दिये गये। प्रिया मुंडा ने अपने खिलाफ दर्ज मुकदमों और सुरक्षा के प्रश्न पर विधायक नीलकंठ मुंडा और बाबूलाल मरांडी, दीपक प्रकाश आदि सभी लोगों से गुहार लगायी पर कोई लाभ नहीं हुआ। गुमला-लोहरदगा क्षेत्रों में विकास भारती की उपस्थिति भी विचारणीय है। विकास भारती का सरगना अशोक भगत हैं। अशोक भगत को पदमश्री भी मिला है। अशोक भगत दावा करते थे कि उन्होंने विकास भारती के माध्यम से भाजपा को खाद-पानी दिया और ईसाई व कसाई की साजिशें विफल की, धर्मातंरण को रोका। पर सच्चाई यह है कि कभी  गुमला और लोहरदगा में भाजपा ही नहीं बल्कि संघ काफी मजबूत हुआ करती थी और कई विधान सभा सीटें भी जीतती थी। सिमडेगा और विशुनपुर विधान सभा सीटें भाजपा कई बार जीती थी। पर सिमडेगा और विशुनपुर विधान सभा सीटों पर भाजपा लगातार हार रही है। आज भाजपा गुमला लोहरदगा में बेहद कमजोर है। विकास भारती में सेक्युलर और जातिवादी लोग हावी है। खुद अशोक भगत रांची में रहकर भाजपा और संघ को राजनीति का पाठ पढ़ाते हैं। अशोक भगत पर उंगली उठाने की शक्ति किसमें है?

    कई ऐसी आदिवासी लोकसभा सीटें हैं जो भाजपा के लिए खतरे की घंटी हैं। चाईबांसा-सिंहभूम और राजमहल लोकसभा सीट पर भाजपा मोदी लहर में भी जीत नहीं पा रही है। सबसे बडी बात खूंटी लोकसभा सीट की है। पूर्व मुख्यमंत्री रहे अर्जुन मुंडा मात्र डेढ हजार वोटों से जीत पाये थे। लोहरदगा लोकसभा सीट पर भी भाजपा की जीत मात्र डेढ हजार वोटों से हुई थी। पिछली रधुवर दास सरकार की हार के पीछे आदिवासी विधान सभा सीटों पर मिली हार ही कारण थी। संथाल परगना क्षेत्र, कोल्हान क्षेत्र और पलामू क्षेत्र की सभी आदिवासी विधान सभा सीटें भाजपा हार गयी थी। सिर्फ दो आदिवासी विधान सभा सीट खूंटी और तोरपा में ही भाजपा को जीत मिली थी। कभी एक दर्जन से उपर आदिवासी विधायक भाजपा के होते थे। यहां दो उदाहरण महत्वपूर्ण हैं। एक बार मैंने अर्जुन मुंडा से यह प्रश्न किया था कि खूंटी क्षेत्र में ईसाई और कसाई का उत्पात बढ़ा है और हिन्दू गांव छोडकर भाग रहे हैं। इस पर अर्जुन मुंडा का उत्तर था कि ईसाई और कसाई का उत्पात जितना बढ़ेगा उतना ही अधिक हिन्दुओं का वोट हमें मिलेगा, आप अपने काम में मन लगाइये। झारखंड का एक सांसद पांच साल तक अपने क्षेत्र में नहीं गया और न ही जनता का फोन तक उठाता था। जब 2019 में फिर से वोट मांगने गया तब उस सांसद से जनता ने क्षेत्र में नहीं आने और फोन नहीं उठाने का जवाब मांगा। जवाब में उस सांसद का कहना था कि तुम लोग मुझे वोट थोड़े ही देते हो, तुम लोग मोदी को वोट देते हो, मोदी का वोट देना तुम लोगों की मजबूरी है, मैं फिर काम क्यों करू? आश्चर्य जनक ढंग से वह सांसद 2019 में भी लगभग चार लाख वोटों से चुनाव जीत गया।

    भाजपा के पास आज हिन्दुत्ववादी आदिवासी चेहरे का घोर अभाव है। कडि़या मुंडा एक हिन्दुत्ववादी आदिवासी चेहरा जरूर थे पर उम्र की कसौटी पर उन्हें दरकिनार कर दिया गया। जब तक भाजपा आदिवासी क्षेत्रों में अपनी दमगार उपस्थिति दर्ज नहीं करायेगी और ईसाई-कसाई समीकरण के खिलाफ शक्तिशाली राजनीति नहीं करेगी तब तक झारखंड में भाजपा इसी तरह हारती रहेगी, सत्ता से दूर रहेगी। ईसाई-कसाई हिंसा और अराजकता के कारण झारखण्ड में भी पश्चिम बंगाल जैसी स्थिति कायम हो गयी है।भाजपा को अब बाबूलाल मरांडी, दीपक प्रकाश और अर्जुन मुंडा जैसो की जगह नया नेतृत्व उभाने की जरूरत है। पर दुर्भाग्य से केन्द्रीय नेतृत्व इस पर मंथन करने के लिए भी तैयार नहीं है। भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व तब इस पर गंभीर होगा जब भाजपा अगले लोकसभा चुनाव में झारंखड में बूरी तरह पराजित हो जायेगी।

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