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    अयोध्या। पुण्यतिथि पर विशेष :श्रीराम मंदिर आंदोलन के पुरोधा वर्ष 2002 में जिनकी एक घोषणा से हिल गयी थी दिल्ली की सरकार।

    .......... स्वामी परमहंस रामचंद्र दास की पुण्यतिथि समारोह में शामिल होंगे सीएम योगी आदित्यनाथ जी महाराज। 

    अयोध्या। राम मन्दिर आंदोलन के महानायक महंत परमहंस रामचंद्र दास की तपोस्थली दिगंबर अखाड़ा में रविवार को प्रदेश के यसस्वी मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी जी श्रीराम मंदिर निर्माण आंदोलन के शलाका पुरुष प्रतिवाद भयंकर स्वामी श्री रामचंद्र परमहंस की पुण्यतिथि पर आयोजित समारोह में शामिल होंगे। गौरतलब हो कि श्री राम मन्दिर आंदोलन के महानायक परमहंस महाराज श्रीराम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष थे। उन्होंने सन 1949 से रामजन्म भूमि आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की तथा 1975 से उन्होंने दिगम्बर अखाड़े के महंत का पद संभाला। वे न केवल आजीवन इसके लिए संघर्षरत रहे बल्कि उन्होंने आंदोलन में अहिंसा को ही हथियार बनाया। परमहंस महाराज ने किशोरावस्था में साधु जीवन स्वीकार कर लिया और उनका नाम रामचन्द्र दास हो गया। बताते है कि वे जब कक्षा 10 में पढ़ते थे, तभी पास के किसी ग्राम में यज्ञ देखने गए। वहां सन्तों के सम्पर्क में आ गए और हृदय में वैराग्य जागृत हो गया था। महाराज जी अपने बारे में कहा करते थे ‘रामचंद्रदास नाम है। राम की नगरी में वास है। रामानंद का शिष्य हूं। राम का भक्त हूं। राम का मंत्र लिया है। रामकाज में ही लगा हूं। इस जीवन के बाद मोक्ष चाहता हूं लेकिन मेरी इच्छा है कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण देखूं, मथुरा और वाराणसी में भी जीर्णोद्धार होता हुआ देखूं और आखिर में अखंड भारत का नजारा देखते हुए ही देह त्यागूं।’

    1975 में श्री पंच रामानन्दीय दिगम्बर अखाड़ा की अयोध्या बैठक में महाराज श्री महन्त बनाये गए। कालांतर में वृन्दावन में वे अखिल भारतीय श्री पंच रामानन्दीय दिगम्बर अणि अखाड़ा के सर्वसम्मति से श्री महन्त चुने गए। 1989 में परमहंस महाराज को श्रीराम जन्मभूमि न्यास का कार्याध्यक्ष घोषित किया गया था। बाद में वे श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण समिति के अध्यक्ष भी चुने गए। भारत के विभाजन की पीड़ा उनके भीतर बहुत गहरी थी। वे कहते थे कि मुसलमानों को पाकिस्तान मिल गया। हिंदुओं को हिंदुस्तान, लेकिन हिंदुस्तान में हिंदुओं को ही अपने हक के लिए ऐसे लड़ना पड़ता है, जैसे यह मुगल या अंग्रेजों का राज ही हो। वे देश के बंटे हुए नक्शे को तत्कालीन नेताओं की भारी भूल मानते थे। उनके शब्द हैं-‘बंटवारे के समग्र दुष्परिणाम यह हैं कि यह देश लावारिसों की धर्मशाला बनकर रह गया है।’ राम मंदिर पर कोई भी आड़ा-तिरछा सवाल उनके तेवर में तपन ला देता था।

    जगद्गुरु रामानन्दाचार्य पूज्य स्वामी भगवदाचार्य जी महाराज ने आपको 'प्रतिवाद भयंकर' की उपाधि से सुशोभित किया था। धर्मसम्राट पूज्य स्वामी करपात्री जी महाराज ने परमहंस महाराज के बारे में कहा था कि यह व्यक्ति केवल विद्वान ही नहीं अपितु पुस्तकालय है। परमहंस मुसलमानों का उल्लेख आते ही सनातन धर्म का विशाल छाता खोलकर खड़े हो जाते थे-‘मैं मुसलमानों का विरोधी बिल्कुल नहीं हूं। अलग-अलग पूजा पद्धतियों सहित मिलजुलकर रहने की हमारी परंपरा है। लेकिन यहां के मुसलमानों को दूसरे देशों से सबक लेना चाहिए। इराकी पहले इराकी है, फिर मुसलमान। ईरानी पहले ईरानी हैं, फिर मुसलमान। इंडोनेशिया में भी देश पहले है, मजहब बाद में। जबकि भारत में उल्टी गंगा बह रही है। मैं तो भारत के मुसलमानों को मोहम्मद पंथी हिंदू और ईसाइयों को जीसस पंथी हिंदू मानता हूं। देश हर हाल में पहले होना चाहिए।’

    बता दे कि परमहंस महाराज ने श्रीराम जन्मभूमि में पूजा-अर्चना के लिए 1950 में जिला न्यायालय में प्रार्थना पत्र दिया। अदालत ने उस प्रार्थना पत्र पर अनुकूल आदेश दिया और निषेधाज्ञा जारी की। मुस्लिम पक्ष ने उच्च न्यायालय में अपील की। उच्च न्यायालय ने अपील रद्द करके पूजा-अर्चना बेरोक-टोक जारी रखने के लिए जिला न्यायालय के आदेश की पुष्टि कर दी। इसी आदेश के कारण आज तक श्रीराम जन्मभूमि पर श्रीरामलला की पूजा-अर्चना होती रही। परमहंस जी महाराज की दृढ़ संकल्प शक्ति के परिणाम स्वरूप ही निश्चित तिथि, स्थान एवं पूर्व निर्धारित शुभ मुहूर्त 1989 को शिलान्यास कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। 30 अक्टूबर 1990 की कारसेवा के समय अनेक बाधाओं को पार करते हुए अयोध्या में आए हजारों कार सेवकों का उन्होंने नेतृत्व व मार्गदर्शन भी किया। दो नवम्बर 1990 को परमहंस जी का आशीर्वाद लेकर कार सेवकों ने श्रीराम जन्मभूमि के लिए कूच किया।

    महंत सुरेश दास कहते है कि उनके गुरु परमहंस जी ने मार्च 2002 में शिलादान पर अदालत द्वारा लगायी गई रोक के समय 13 मार्च को एक घोषणा की। परमहंस की इस घोषणा ने सारे देश व सरकार को हिलाकर रख दिया। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें शिलादान नहीं करने दिया गया तो वे रसायन खाकर अपने प्राण त्याग देंगे। स्वामी परमहंस बीमार होकर भी वे अपने संकल्प को दृढ़ता के साथ व्यक्त एवं देश, धर्म-संस्कृति की रक्षा हेतु समाज का मार्गदर्शन करते रहे। सन 2003 को यह महान संत इस संसार को त्यागकर भगवान के धाम चले गए। परमहंस अमर हैं और उनका आंदोलन अमिट। उनके दृढ़ संकल्प का ही परिणाम है कि अयोध्या में आज भव्य राममंदिर का निर्माण तीव्रगति से हो रहा है।

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