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    अयोध्या। बढ़ती जनसंख्या, घटते वृक्षों के चलते प्रकृति व प्रर्यावरण को खतरा।

    .......... प्रकृति और पर्यावरण से की गई छेड़छाड़ का खामियाजा सभी भुगत रहे हैं

    अयोध्या। ईश्वर ने पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवो को जीने के लिए पंचतत्व रूपी सभी सुविधाएं उपलब्ध करा दिया है किंतु उससे भी मानव का पेट नहीं भरता है और अपने लाभ की चीज का तहस-नहस कर रहा है। जिसके चलते प्रकृति और पर्यावरण प्रदूषित होती जा रही है। जिसका खामियाजा मनुष्य ही नहीं सभी जीव जंतु भुगत रहे हैं। बढ़ती जनसंख्या व घटते वृक्षों के चलते प्रकृति व प्रर्यावरण को खतरा।

    पूरी दुनिया में विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है किंतु इससे काम चलने वाला नहीं है। पर्यावरण दिवस के दिन भी पेड़ लगाने की जगह पेड़ काटने का काम किया जाता है। पर्यावरण की सुरक्षा के लिए ईमानदारी के साथ कार्य करने की जरूरत है। कथनी करनी के अंतर को दूर करना होगा केवल भाषण बाजी से काम नहीं चलेगा । देखा जा रहा है कि वृक्षारोपण के लिए बड़े पैमाने पर प्रचार प्रसार किया जा रहा है किंतु वृक्ष किस जमीन पर लगेगा उसका गाटा नंबर खाता नंबर भी निर्धारित होना चाहिए। वृक्षों की कटाई चल रही है। लगाए गए वृक्षों की देखभाल नहीं हो पाती है। बढ़ती जनसंख्या के कारण आज हम ज्यादा परेशान हैं। जैसा कि एक किसान के पास 100 बीघा खेत  था और अगर उसके चार लड़के हो गए और उन चारों के चार- चार लड़के हो गए तो एक किसान के पास कितना खेत बचा। जब खेती करने भर के लिए ही खेत नहीं है तो वृक्ष किस जमीन पर लगेगा। इस पर भी विचार करने की जरूरत है। बढ़ती जनसंख्या के कारण लोग शहर की तरफ पलायन कर रहे हैं। रोड़े चौड़ीकरण हो रही है। कालोनिया बनती जा रही है। आवास खूब बन रहे हैं। ऐसे में पृथ्वी के सांस लेने की जगह को हम बंद करते जा रहे हैं। कंक्रीटो का जाल बिछा रहे हैं। पहाड़ों को नष्ट करते जा रहे हैं ।जल को प्रदूषण करते जा रहे हैं। जितने विकास की बात करते हैं कल कारखाने लग रहे हैं तो उससे निकलने वाले धुंए, जहरीली गैस पर्यावरण को ही नुकसान पहुंचाती हैं। यूक्रेन और रूस के युद्ध से पर्यावरण को कितना नुकसान हो रहा है इसका अंदाजा लगाना कठिन है। यदि ऐसे ही रहा तो लोगों को सांस लेने में परेशानी होगी। जब वृक्ष नहीं रहेंगे तो जल भी नहीं रहेगा। जल नहीं रहेगा तो हम आप भी नहीं रहेंगे। इस पर भी ध्यान देने और विचार करने की जरूरत है। 

    विश्व में पर्यावरण की खुद की सेहत बिगडती जा रही है। इससे बडी विडंबना और क्या हो सकती है कि आज जब ये विश्व पर्यावरण दिवस को मनाए जाने की खानापूर्ति की जा रही है। तो प्रकृति भी पिछले कुछ वर्षों से धरती के अलग अलग भूभाग पर, कहीं ज्वालामुखी फटने के रूप में, तो  कहीं सुनामी, कहीं भूकंप, कहीं चक्रवात और कहीं ऐसे ही किसी प्रलय के रूप में इस बात का ईशारा भी कर रही है कि अब विश्व समाज को इन पर्यावरण दिवस को मनाए जाने जैसे दिखावों से आगे बढ कर कुछ सार्थक करना होगा। 

    विश्व के बडे-बडे विकसित देश और उनका विकसित समाज   तमाम सुविधाएं उठाते हुए स्वार्थी और उपभोगी होकर जीवन बिता रहा है जो पर्यावरण के लिए घातक साबित हो रहे हैं। 

     विकास की जो इबादत लिखी जा रही है उससे  पर्यावरण और धरती के लिए लिए घातक सिद्ध हो रहा है।

    •  पर्यावरण प्रदूषण के मूल को समझना होगा।

    कोरोना संक्रमण समय में न जाने कितने लोगों ने ऑक्सीजन के अभाव में अपने प्राण त्याग दिए हैं, इस ऑक्सीजन के अभाव में न जाने कितने परिवार उजाड़ गए, हजारों लोगों ने अपनों को खोया है; ये सब मानव द्वारा प्रकृति और पर्यावरण से की गयी छेड़छाड़ का ही नतीजा है। मानव जाति ने जगह-जगह से प्रकृति का सत्यानाश किया है पर्यावरण को प्रदूषित किया है। इस धरा से पेड़-पौधों को नष्ट किया है। पहाड़ों के साथ छेड़छाड़ किया है। नदियों के मूल बहाव को रोका है।  बड़ी-बड़ी नदियां अपनी अंतिम सांसें गिन रही हैं। अगर हम प्रकृति की सांसें रोकेंगे तो प्रकृति  अपना रूप धारण कर लिया तो क्या होगा। जितना इंसानी जाति ने प्रकृति के साथ गलत किया है, अगर उसका एक प्रतिशत भी प्रकृति करवट लेती है तो धरती से इंसान का अस्तित्व मिट जाएगा। जितना क्रूर हम प्रकृति और पर्यावरण के लिए हुए हैं अगर जिस दिन प्रकृति ने अपनी क्रूरता दिखाई उस दिन इस धरती पर प्रलय होगी। 

    अभी समय है, जरूरी है, हम प्रकृति और पर्यावरण की मूलता को नष्ट करने की जगह उसका संरक्षण करें, नहीं तो आने वाले दिनों में पीने के पानी की कमी से लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। जैसा कि हमने ऑक्सीजन तो कृत्रिम बना लेते हैं, लेकिन पीने के पानी को बनाने की कोई कृत्रिम तकनीक नहीं है। इसलिए समय रहते हमें प्रकृति की ताकत को समझना होगा नहीं तो बहुत देर हो जायेगी।

     प्रकृति के स्वरुप को अपने हिसाब से नहीं बदल सकते, अगर हमने प्रकृति और पर्यावरण के स्वरुप को बदलने का प्रयास किया तो आने वाली पीढ़ियों और इस धरती पर रहने वाली मानव जाति और जीव-जंतुओं, पक्षियों के लिए नुकसानदेह होगा।

    अगर धरती का तापमान 2 डिग्री से ऊपर बढ़ता है तो  बड़ा परिवर्तन हो सकता है।  समुद्र तल की ऊंचाई बढ़ना, बाढ़, सूखा, जंगलों में आग जैसी आपदाएं बढ़ सकती हैं।   चीन अमेरिका, भारत बड़ा कार्बन उत्सर्जन करने वाला देश है। अगर विश्व के ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाले देश कॉर्बन उत्सर्जन में आने वाले समय में कटौती करते हैं तो यह विश्व के पर्यावरण और जलवायु के लिए निश्चित ही सुखद होगा। 

    बात वायु प्रदूषण की हो  तो बड़े-बड़े शहरों में अनगिनत उपकरण धूंआ उगल रहे हैं,  कारखानों  की चिमनियों  प्रदूषण को बढ़ावा दे रहे हैं। पर्यावरण की सेहत को नुकसान पहुंचा रहे हैं।  जहरीली गैसों  और अन्य खतरनाक जहरीले तत्वों का उत्सर्जन लगातार बढ़ रहा है। जो कि मुख्य कारण है वायु प्रदूषण का। वर्तमान में देखा जा रहा है कि क्रेन और रूस के युद्ध में जिस तरह से बमबारी हो रही है उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पूरी दुनिया में पर्यावरण को कितना नुकसान हो रहा है आम लोगों को सांस लेने में परेशानी हो रही है। आज जरूरत है  वायु-प्रदूषण से होने वाले स्वास्थ्य-जोखिम के बारे में जागरूकता बढ़ानी चाहिए जो केवल भाषण बाजी से काम नहीं चलेगा बल्कि मूल रूप में पर्यावरण के संरक्षण के लिए कार्य करने की जरूरत है कथनी और करनी को अंतर को भी मिटाना होगा।  लेकिन विडंबना है कि इस पर अमल नहीं हो रहा है।   ईधन की गुणवत्ता को बढ़ाकर पॉल्यूशन को काफी हद तक कंट्रोल करने पर जोर देना चाहिए। जिससे उसमें उपलब्ध जरूरी तत्वों की मात्रा आवश्यकता से अधिक न हो। प्रदूषण करने वाले तत्वों की कमी कैसे की जाए इस पर  मिलकर काम करना चाहिए। कम पॉल्यूशन करने वाले  का अधिक प्रयोग करना चाहिए।

    देव बक्श वर्मा 

    Initiate News Agency (INA), अयोध्या

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