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    महल की छाया से मुक्त भाजपा

    राकेश अचल का लेख। खबर छोटी है लेकिन महत्वपूर्ण है। भाजपा ने बड़ी हिकमत अमली से महल की इच्छाओं पर पानी फेरते हुए ग्वालियर में महापौर पद के लिए अपनी पसंद का प्रत्याशी तय कर लिया, न सिर्फ तय कर लिया बल्कि उसके नाम पर महल की भी मुहर लगवा ली, हालाँकि इसकी कोई जरूरत नहीं थी। ग्वालियर में महापौर पद के प्रत्याशी का नाम सबसे अंत में घोषित किया गया है। श्रीमती सुमन शर्मा अब ग्वालियर में कांग्रेस की श्रीमती शोभा सिकरवार का मुकाबला करेंगी। 

    ग्वालियर में दो साल पहले तक भाजपा के एक छात्र नेता केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर थे किन्तु दो साल पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होने के बाद उनका ये एकाधिकार कम हो गया, पार्टी के अधिकाँश फैसलों में सिंधिया की सहमति, इच्छा का भी ख्याल रखा जाने लगा। लेकिन तोमर और सिंधिया के बीच गतिरोध पहली बार महापौर प्रत्याशी को लेकर सार्वजनिक हुआ। पूरे एक पखवाड़े तक ग्वालियर में प्रत्याशी के नाम की घोषणा अटकी रही। इस मसले पर भोपाल से दिल्ली तक विचार विमर्श हुआ, लेकिन फैसला आखरी वक्त तक अटका रहा। 

    भाजपा ने अंतत: संगठन में अरसे से सक्रिय श्रीमती सुमन शर्मा को अपना प्रत्याशी बनाया। सुमन महिला मोर्चा में तो सक्रिय थीं हीं सार्वजनिक जीवन में भी उनकी छवि एक भद्र महिला नेत्री की रही है। उनके ससुर डॉ धर्मवीर भाजपा से दो बार विधायक और एक बार महापौर रह चुके हैं। डॉ धर्मवीर खांटी के कांग्रेसी नेता थे ,वे आपातकाल के दौरान ग्वालियर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष थे और कांग्रेस में महल के बढ़ते दखल के बाद अस्सी के दशक में कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए थे। मजे की बात ये कि डॉ धर्मवीर का एक बेटा भाजपा में रहा जबकि दूसरा बेटा महल के साथ रहा। 

    ग्वालियर में सिंधिया किसे अपना प्रत्याशी बनाना चाहते थे और क्यों नहीं बना पाए इसकी कहानी लम्बी और दिलचस्प हो सकती है, लेकिन अब भाजपा ने फैसला कर लिए है इसलिए माना जा रहा है कि सिंधिया ने संगठन के फैसले के सामने अपने हथियार रख दिए। वे समझ गए कि भाजपा में ' पावर सेंटर ' बनने के लिए अभी उन्हें और मेहनत करना होगी। पार्टी में फिलहाल कोई नहीं कह सकता कि श्रीमती सुमन शर्मा को महल का समर्थन प्राप्त नहीं है , लेकिन सब जानते हैं कि सुमन शर्मा किस खेमे के सहारे राजनीति में सक्रिय हैं। 

    सुमन शर्मा हाल ही में वैध्वय का शिकार हुईं हैं। उनके पति स्वर्गीय यशवीर शर्मा भाजपा के समर्पित और गुटनिरपेक्ष कार्यकर्ता थे। उन्होंने जीवन भर अपने लिए पार्टी से कुछ नहीं माँगा, लेकिन पार्टी ने उनकी पत्नी श्रीमती सुमन शर्मा को हमेशा पद और प्रतिष्ठा प्रदान की। सुमन ने इस बार भी संगठन के जरिये ही अपनी उम्मीदवारी पेश की थी, जो अनेक स्तरों से होते हुए पार्टी है कमान तक पहुंची थी। लेकिन उनके नाम पर ज्योतिरादित्य सिंधिया और नरेंद्र सिंह तोमर में सहमति अंत तक नहीं बनी। सिंधिया की ओर से जो नाम आये वे तोमर को पसंद नहीं थे और तोमर की और से जो नाम आये वे सिंधिया को पसंद नहीं थे। 

    पार्टी के पास महापौर पद के लिए महिला प्रत्याशियों की लम्बी फेहरिश्त थी ,लेकिन महल इस पद के लिए अपना प्रत्याशी चाहता था। आधा दर्जन से ज्यादा नामों पर विमर्श हुआ और बात सुमन शर्मा पर आकर अटक गयी, सुमन को काँटा बताने में सिंधिया असफल रहे और हारकर उन्हें सुमन शर्मा के नाम पर अपनी सहमति देना पड़ी, नाम तो सुमन के अलावा पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा और साडा के पूर्व पदाधिकारी राकेश सिंह जादौन की पत्नी के अलावा पूर्व राज्य सभा सदस्य श्रीमती माया सिंह का भी लिया गया किन्तु बात नहीं बनना थी सो नहीं बनी। तमाम तर्क-वितर्क हुए लाभ-हानि बताये गए ,तब कहीं जाकर सुमन का नाम घोषित किया गया जा सका। 

    महापौर पद के प्रत्याशियों के नाम तय करने में ऐसी ही जद्दोजहद इंदौर और भोपाल में भी हुयी ,लेकिन ग्वालियर का मामला चर्चित और काबिले नजीर बन गया। भाजपा ने इंदौर में भी जो नाम घोषित किया वो संगठन के लिहाज से आम सहमति का नहीं है लेकिन उसमें कोई कमी भी तो नहीं है। फिर जब एक अनार हो और सौ बीमार हों तो भेषज का निर्णय समझदारी से ही करना पड़ता है। गौर तलब है कि इस बार कांग्रेस ने भाजपा के मुकाबले ग्वालियर में ही नहीं अन्य शहरों में भी बहुत पहले ही घोषित कर दिए थे। 

    ग्वालियर में मामला विकट इसलिए था क्योंकि कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी कांग्रेस विधायक डॉ सतीश सिंह सिकरवार की पत्नी श्रीमती शोभा सिकरवार को बनाया था। डॉ शोभा दो बार की पार्षद रह चुकीं हैं साथ ही उनके विधायक पति का अपना आभा मंडल है, वे जुझारू और जमीनी नेता हैं और विधायक बनने से पहले ही भाजपा छोड़ कांग्रेस में न सिर्फ शामिल हुए बल्कि उन्होंने भाजपा के ही नहीं बल्कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक प्रत्याशी को पराजित  भी किया था। भाजपा ऐसे में कोई जोखिम नहीं लेना चाहती थी, इसलिए भी फैसला करने में उसे नानी याद आ गयी। 

    ग्वालियर में पार्टी की जीत-हार में महल की एक निश्चित और सीमित भूमिका से कोई इंकार नहीं कर सकता, इस बार भी यही हो रहा है। कांग्रेस प्रत्याशी के खिलाफ पार्टी में जो कथित असंतोष है उसको भुनाने के लिए भाजपा नेता सक्रिय हो चुके हैं कांग्रेस विधायक प्रवीण पाठक  से लेकर जिलाध्यक्ष डॉ देवेंद्र शर्मा को भी श्रीमती शोभा सिकरवार की उम्मीदारी रास नहीं आयी किन्तु किसी में इतना साहस नहीं था कि जो पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष कमलनाथ के फैसले का विरोध कर पाता, पार्टी के पास वैसे भी कोई दूसरा सबल नाम था भी नहीं जो इस चुनाव में धनबल और बाहुबल के मामले में भाजपा का मुकाबला कर सकता। 

    पिछले चार दशकों  में सिंधिया जब कांग्रेस में थे तब भी ग्वालियर में कांग्रेस एक बार भी महापौर पद का चुनाव नहीं जीत पाई, तब भी जब पार्षद महापौर चुनते थे और तब भी जब महापौर को जनता सीधे चुनती थी। महापौर का पद भाजपा के कब्जे में ही रहा ,तब भी जब कांग्रेस और भाजपा के बीच एक-दो पार्षदों का ही अंतर् था। कांग्रेस की संगठनात्मक शक्ति कभी भी भाजपा का मुकाबला नहीं कर पायी ,लेकिन इस बार कांग्रेस चाहे तो मुकाबला कांटे का हो सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार सिंधिया कांग्रेस में नहीं हैं। कांग्रेस और भाजपा प्रत्याशियों  की अपनी राजनितिक विरासत भी है, जो रंग दिखाएगी, जैसे भाजपा प्रत्याशी के ससुर भाजपा के विधायक रहे हैं वैसे ही कांग्रेस प्रत्याशी के ससुर गजराज सिंह भी भाजपा के विधायक रहे हैं। फिर कांग्रेस प्रत्याशी के पति भी विधायक हैं ,इसलिए चुनाव में रंग तो आना ही है। 

    राकेश अचल (वरिष्ठ पत्रकार)

    Initiate News Agency (INA)

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