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    नई दिल्ली: शोधकर्ताओं ने विकसित की अत्यंत महीन प्रोटीन फिल्म।

    नई दिल्ली: एक नये अध्ययन में भारतीय शोधकर्ताओं ने उत्कृष्ट थर्मल, मैकेनिकल और पीएच स्थिरता के साथ अल्ट्रा-थिन हेट्रो-प्रोटीन फिल्म (झिल्ली) विकसित की है, जो बायोमेडिकल और खाद्य पैकेजिंग उद्योगों में पतली फिल्मों के अनुप्रयोगों के विस्तार का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। यह अध्ययन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से सम्बद्ध गुवाहाटी स्थित स्वायत्त संस्थान इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी इन साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी (आईएएसएसटी) के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। 

    आईएएसएसटी में भौतिक विज्ञान प्रभाग के शोधकर्ताओं ने दो ग्लोब्यूलर प्रोटीन - बोवाइन सीरम एल्ब्यूमिन (बीएसए) और लाइसोजाइम (एलआईएस) से युक्त अत्यधिक महीन मोनोलेयर प्रोटीन झिल्ली विकसित की है। उन्होंने लैंगम्यूर-ब्लॉडगेट (एलबी) तकनीक का उपयोग किया है, जिससे नैनोमीटर के स्तर पर महीन फिल्म प्राप्त की जा सकती है।

    नई विकसित झिल्ली अन्य प्रोटीन या प्लास्टिक झिल्लियों की तुलना में मुलायम एवं बारीक हैं। शोधकर्ताओं ने इस झिल्ली की स्थिरता एवं इससे संबंधित गुणों का पता लगाने के लिए परिवर्तनशील पीएच स्थितियों में इस जटिल फिल्म की विभिन्न संरचनाओं और भौतिक गुणों का पता लगाया है। उनका कहना है कि अन्य झिल्लियों की तुलना में इस झिल्ली का लचीला होना फायदेमंद है, और यह पृथक प्रोटीन फिल्मों का बेहतर विकल्प बन सकती है। 

    शोधकर्ताओं का कहना है कि हाइड्रोफोबिक इंटरैक्शन के साथ इलेक्ट्रोस्टैटिक आकर्षण के परिणामस्वरूप दो प्रोटीनों के बीच जटिल गठन 9.2 के अद्वितीय पीएच पर हुआ है। यह मोनोलेयर संरचना एयर-वाटर इंटरफेस में बनी है, जिसे आगे के अध्ययन के लिए 18 mN/m के सतही दबाव पर सिलिकॉन अधःस्तर (substrates) में रूपांतरित किया गया है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि वायु-जल इंटरफेस में मोनोलेयर्स अत्यधिक स्थिर फिल्म बनाने वाले जटिलता के कारण पर्याप्त रूप से लंबे समय तक अपनी आंतरिक संरचना को पकड़े रख सकते हैं।बीएसए और एलआईएस के प्रोटीन का यह संयोजन पतली फिल्म प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विभिन्न प्रोटीन संरचनाओं की अधिक स्थिर एवं अपघटनीय महीन झिल्ली के निर्माण में उपयोगी हो सकता है, जिसके विभिन्न अनुप्रयोग हो सकते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रोटीन कॉम्प्लेक्स में पैरामीटर परिवर्तन या विभिन्न फैटी एसिड या पॉलीओल मोएट (ग्लिसरॉल, स्टार्च, जिलेटिन, आदि) के समावेश जैसे विविध भौतिक-रासायनिक तरीके झिल्ली को विविध अनुप्रयोगों के लिए सक्षम बना सकते हैं। 

    आईएएसएसटी में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ सारथी कुंडू के नेतृत्व में पीएचडी शोधार्थी रक्तिम जे. सरमा द्वारा किया गया यह अध्ययन शोध पत्रिका ‘फूड हाइड्रोकोलॉइड्स’ में प्रकाशित किया गया है।

    Initiate News Agency (INA) , नई दिल्ली

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