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    फिर एक बार, राम पहुंचे शबरी के द्वार, नाम द्रौपदी, पर काम शबरी का।

    अतुल कपूर (स्टेट हेड)

    विशेष आलेख: वर्ग विहीन समाज की पुनर्स्थापना के लिए लगता है श्रीराम ने एक बार फिर शबरी को खोज लिया। राम नाम के पुण्य प्रताप से सत्ता के शीर्ष पर पहुंची भाजपा ने रामराज्य की पुनर्स्थापना के स्वप्न को साकार करने के लिए राष्ट्रपति चुनाव के लिए एक ऐसी ही तपस्विनी महिला द्रौपदी मुर्मू के नाम की घोषणा की तो पक्ष और विपक्ष के लोग आश्चर्यचकित रह गए। यह नाम कहीं चर्चा में नहीं था। भाजपा के ही कई नामी-गिरामी चेहरे जो राष्ट्रपति पद के लिए सपने संजोए हुए थे अचानक "उनके दिल के अरमां आंसुओं में बह गए"। विपक्षी दल भी हक्के-बक्के रह गए।

    दरअसल इतिहास कभी-कभी अपने को दोहराता है। बनवास कालीन राम के क्रांतिकारी कामों में सामाजिक रूढ़ियों और प्रचलित अंध मान्यताओं के विरुद्ध भीलनी शबरी के घर पहुंच कर उसके झूठे बेर खाना तत्कालीन सामाजिक परंपराओं में परिवर्तन का शंखनाद था। राम का उपेक्षित वर्ग के प्रति यह अपार स्नेह पुरानी रूढ़ियों पर करारी चोट थी।

    "ताहि देइ गति राम उदारा।

    सबरी के आश्रम पगु धारा।।

    सबरी देख राम गृह आए।

     मुनि के वचन समुझि जिय भाये।।

     पानि जोरि आगे भाई ठाड़ी।

     प्रभहिं बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी।।

     केहि विधि अस्तुति करौं तुम्हारी। अधम जाति में जड़मति नारी।।


    इस प्रसंग में श्रीराम का उत्तर उनके क्रांतिकारी सिद्धांतों की घोषणा है। वे शबरी से कहते हैं -

    कह रघुपति सुनु भामिनी बाता।

     मानउं एक भगति कर नाता।।

     जाति पांति कुल धर्म बडाई। 

    धन बल परिजन गुन चतुराई।। 

    भगति हीन नर सोहइ कैसा।

     बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।।

    नए समाज की संरचना के प्रयास में रख भगवान राम का यह परीक्षण भी सफल रहा। उन्हें वनवास काल में धीरे-धीरे अनुभव होने लगा कि बड़े-बड़े तिलकधारी, विख्यात तपोधानी, राजा महाराजा ऋषि-मुनियों से भी अधिक उपयोगी यह नीच और उपेक्षित कहे जाने वाले लोग सिद्ध हो सकते हैं। असुरता के निवारण और दुष्टों के दमन  हेतु श्री राम को उपेक्षित और दलित वर्ग का ही अधिक सहयोग मिला। सामाजिक परिवर्तन के इस महा अभियान में उनके साथ न तो कोई राजे महाराजे आए और न ही धनकुबेर।

    दलित वर्ग को गले लगाने और उसे समानता के अधिकार से विभूषित करने की प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की यह नई रणनीति श्री राम के शबरी के द्वार पहुंचने की पुनरावृति नहीं तो और क्या है?

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