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    सुरपति के अनुचर आ जाओ।

    राकेश अचल का लेख। देश को अब किसी सियासी चमत्कार की नहीं बल्कि उन बादलों की प्रतीक्षा है जो आमजन को उमस और गरमी से राहत दिला सकें। भारत देश का एक बड़ा हिस्सा गर्म तबे की तरह तप रहा है। धमनियों में बहने वाला रक्त स्वेद बनकर निरर्थक बह रहा है ,लेकिन सुरपति के अनुचर बादलों का अभी कहीं ,कोई अता-पता नहीं है, जैसे नेताओं को जनता पर दया नहीं आती ,बादलों को भी नहीं आ रही है। 

    एक जमाना था जब बादल साहित्यकारों के प्रिय प्रतिमान हुआ करते थे। जिस कवि ने बादलों पर कविता नहीं लिखी ,उसे कवि माना ही नहीं जाता था। संस्कृत में कालिदास ने तो पूरा ' मेघदूतम  ' ही लिख डाला था। बादलों को दूत बनाने वाले कालिदास अमर हो गए तो कलिकाल में बाबा नागार्जुन ने भी गवाही दे दी की उन्होंने भी ' बादल को घिरते देखा है '. बाबा लिखते हैं कि -

    ' अमल धवल गिरि के शिखरों पर,

    बादल को घिरते देखा है।

    छोटे-छोट मोती जैसे

    उसके शीतल तुहिन कणों को,

    मानसरोवर के उन स्वर्णिम

    कमलों पर गिरते देखा है।

    बादल को घिरते देखा है।'

    बाबा से पहले सुकुमार कवि सुमित्रानंदन पंत को बादलों ने लुभाया. उन्होंने लिखा-

    'सुरपति के हम हैं अनुचर ,

    जगत्प्राण के भी सहचर ;

    मेघदूत की सजल कल्पना ,

    चातक के चिर जीवनधर;

    मुग्ध शिखी के नृत्य मनोहर,

    सुभग स्वाति के मुक्ताकर;

    विहग वर्ग के गर्भ विधायक,

    कृषक बालिका के जलधर !'

    अंजना वर्मा को 'स्कॉटलैंड में बदल' अलग तरीके से दिखे .उन्होंने लिखा -

    'बादलों की नावें 

    आसमान की नीली झील में 

    पहाड़ों के द्वीपों पर लंगर डालती हैं 

    पर रुकती नहीं अधिक देर तक

    अथक नाविक है मेघ

    ढूँढ़ते हुए सत्य का किनारा 

    अपने को मिटा देगा 

    अपने को शून्य बना देना ही

    अनन्त होना है 

    शून्यता ही मंज़िल है ज्ञान की '

    इस सन्दर्भ में ' गोरा और बादल ' का जानबूझकर जिक्र नहीं कर रहा ,डरता हूँ कि कहीं फिल्मों के जरिये इतिहास पढ़ने वाले नाराज न हो जाएँ। दरअसल बादल होते ही ऐसे हैं कि उनके बारे के कोई भी लिखे बिना रह नहीं सकता, चाहे फिर लिखने वाले सूर्यकांत त्रिपाठी निराला हों या या महादेवी वर्मा। बाल साहित्य में तो बादल खिलोने की तरह हैं, लेकिन विज्ञान में बादलों की हैसियत हमारे समाज जैसी है। वैज्ञानिक भी बादलों को वर्गों में बांटे बैठे हैं। 

    विज्ञान की नजर में बादल उच्च,मध्यम और निम्न प्रकार के होते हैं। विज्ञान बादलों को वर्षा और हिमपात का स्रोत मानता है। विज्ञान के लिए बादल दूत नहीं है ,खिलोने भी नहीं है। वैज्ञानिकों को बादलों में बैसि आकृतियां नहीं दिखाई देतीं जैसी कि बच्चों को दिखाई देती हैं। भूरे,काळा बदल कभी हिरण बन जाते हैं तो कभी हाथी,कभी चिड़िया बन जाते हैं तो कभी कुछ और हवा में ऐसे तैरते हैं जैसे नदी में नाव उड़ते ऐसे हैं जैसे विहंग दल- बादल तो बादल हैं उनका क्या  कहना ?  वैज्ञानिकों ने बादलों को ' पक्षाभ' और ' कपासी ' नाम जरूर दिए हैं। 

    बदल अपनी हैसियत के हिसाब से ऊपर-नीचे उड़ते हैं। उच्च बदल यदि १६ हजार फुट से भी ज्यादा ऊंचे जाकर उड़ते हैं तो माध्यम बादल उससे कम, निम्न बादल २ हजार फीट से ऊपर नहीं जाते और पानी बरसाने लगते हैं .कभी रुक कर तो कभी झूमकर,  भारतीय फिल्मों के गीतकार बादलों और वर्षा को अपने हिसाब से इस्तेमाल करते हैं। साहिर लुधियानवी कहते हैं -'दो बूँदे सावन की

    इक सागर की सीप में टपके और मोती बन जाये

    दूजी गंदे जल में गिरकर अपना आप गंवाये'

    बादल यानि मेघ सबके लिए महत्वपूर्ण हैं। साहित्यकार के लिए ही नहीं, वैज्ञानिक के लिए ही नहीं बल्कि किसान के लिए भी बादलों की अपनी महत्ता है। जेठ माह के बीतते ही आषाढ़ के पहले दिन से किसान बादलों का इन्तजार ऐसे करता है जैसे कोई अपने प्रिय अतिथि का इन्तजार करता है। सरकार ने तो बादलों के आने -जाने पर नजर रखने के लिए बाकायदा एक मौसम विभाग ही बना रखा है जो बताता है कि इस बार मानसून कैसा रहेगा।  यानि बादलों के आने के मौसम को मानसून कहा जाता है। मानसून के हिसाब से अर्थनीतियाँ बनतीं हैं,तैयारियां की जातीं हैं, यानि बादलों की भी जासूसी की जाती है। 

    बादल संज्ञा भी है और सर्वनाम भी ,क्रिया भी है प्रतिक्रिया भी, बादल नाम भी है और उपनाम भी बादल विशेषण भी है और क्रिया विशेषण भी, बादल उमड़ते-घुमड़ते हैं तो गरजते भी हैं, बरसना तो उनका काम है ही वे फटते भी हैं, बादल केवल पानी वाले ही नहीं होते वे संकट के भी हो सकते हैं और युद्ध के भी, यानि बादल तो बादल होते हैं। वे केवल भारत में ही नहीं होते दुनिया के हर हिस्से में होते हैं और उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं जितने हमारे यहां होते हैं। बादल बहुरूपिया ही नहीं बहुनामी भी होते हैं, मुझे ही बादलों के एक दर्जन से अधिक नाम याद हैं जैसे -' अब्र, अभ्र, घटा, घनश्याम, जीमूत, तोयद, तोयधर, पयोधर, धर, घन, वारिद, मेघमाला, मेघावली, कादंबिनी, जलधरमेघ, जलद, पर्जन्य, जगजीवन, अंबुद, अंबुधर, नीरद, धराधर, वारिवाह, पयोदि, सारंग, जलचर, धाराधर, नीरधर, पयोद, बलाधर, बदली, बलाहक, वारिधर, घनमाला, ये नाम तो हमने अपनी माध्यमिक कक्षाओं में बादल पर निबंध लिखने के लिए याद किये थे, मुमकिन है कि बादलों के और भी नाम हों। 

    पंजाब में बादल गांव भी है और राजनीति भी, पत्रकारिता में भी बादल और बरखा दोनों मौजूद हैं। साहित्यकारों में तो बादल हैं ही, बादल घमंडी भी होते हैं। बाबा तुलसीदास ने ऐसा कहा .' घन घमंड नभ गरजत घोरा' हिंदी का बादल अंग्रेजी में 'क्लाउड' हो जाता है। यानि बादलों की कथा हरी कथा कि तरह अनंत है। 

    बादल स्वप्न में भी आते-जाते हैं, सपने में बादलों का आना शुभ माना जाता है। कहते हैं सपने में बादल का दिखाई देना उन्नति होने का संकेत है। कश्मीर की कली में बादल दीवाना हो जाता है ' दीवाना हुआ बादल,सावन की घटा छाई' , बादलों का मौसम बरखा कहलाता है। बरखा से लोग अपनी-अपनी तरह से मनुहार करते हैं। कोई कहता है कि- 'बरखा रानी जरा जम के बरसो,तो कोई कहता है बरखा रानी जरा थम के बरसो' , अर्थात बादल और बरखा का रिश्ता चोली-दमन का रिश्ता है। जब एक है तभी दूसरा है, आज ऐसे ही रिश्तों की दरकार है लेकिन ये रिश्ते घृणा के शिकार हो रहे हैं, आइये बादलों से ही कुछ सीख लें। 

    राकेश अचल (वरिष्ठ पत्रकार)

    Initiate News Agency (INA)

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