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    बर्बरता का भयावह और पाशविक रूप।

    राकेश अचल का लेख। देश में नफरत और बर्बरता लगातार बढ़ रही है। राजस्थान के उदयपुर में कन्हैया लाल  दर्जी इस बर्बरता की भेंट चढ़ गए। पुलिस ने आरोपी तो गिरफ्तार कर लिए लेकिन बर्बरता को कौन गिरफ्तार करेगा ? बर्बरता तो  दिलों में है, दिमाग में हैं .बर्बरता ने इमोशन की हत्या पहले ही कर दी है। इस बर्बरता की पोषक सियासत तो है ही मजहब भी है, अब मजहब ही हमें आपस में बैर करना सिखा रहा है। 

    उदयपुर की वारदात को लेकर यदि आज न लिखता तो तय था कि लोग मुझे जी भरकर गालियां देते। क्योंकि हत्यारे मुस्लिम हैं, उनका मुस्लिम होना इस मामले की गंभीरता को और बढ़ा रहा है। बर्बरता फादर स्टेन की हत्या से होती हुई दर्जी कन्हैया लाल की गर्दन तक आ पहुंची है। बर्बरता का न कोई मजहब है और न बिरादरी, बर्बरता मनुष्यता का सबसे विकृत चेहरा है। बर्बर मनुष्य न भारतीय दंड संहिता से डरता है और न  बुलडोजर से। 

    नूपुर शर्मा के एक बयान से इस्लाम के आस्थावान इतने आहत हो जायेंगे कि एक निर्दोष की जान ले लेंगे ,ये चिंता का विषय है। मै आज भी कहता हूँ कि मनुष्य की किसी टिप्पणी से दुनिया के किसी भी मजहब का कोई भगवान न आहत होता है और न अपमानित होता है। भगवान,अल्लाह,गॉड ,जो भी है सुप्रीम है। उसने हमें बनाया है ,हमने उसे नहीं बनाया। इसलिए वो हमारी किसी टिप्पणी से कभी आहत हो ही नहीं सकता। आहत तो हम होते हैं क्योंकि हम धर्मांध हो चुके हैं, हमें धर्म के नशे में मनुष्यता बहुत बौनी दिखाई देती है। ये नशा व्यक्ति के सर पर चढ़े या सत्ता के सर पर खतरनाक है। 

    अब किसी का समर्थन या विरोध दोनों खतरनाक हैं। आप चाहे नूपुर शर्मा के साथ खड़े हों चाहे तीस्ता सीतलबड़ के साथ, आप किसी न किसी के निशाने पर आ सकते हैं। अब संघर्ष विचारों का नहीं अदावतों का हो गया है। प्रतिकार न मजहबी लोगों को पसंद है और न सत्ताओं को, वे प्रतिकार करने वाले के साथ किसी भी घटिया और घ्रणित स्तर तक जा सकते हैं। ये अतीत का भी सच है और वर्तमान का भी सच, भविष्य का भी सच हो तो कोई बड़ी बात नहीं है। समय के साथ हमें जितना परिपक्व होना था,जितना उदार होना था,जितना मानवीय होना था ,हम नहीं हो पाए, जो हो रहा है वो उलटा हो रहा है। हम ज्यादा अपरिपक्व हो रहे हैं,हम ज्यादा अनुदार हो रहे हैं ,ज्यादा अमानवीय हो रहे हैं। 

    कन्हैया लाल की हत्या के बाद सबसे बड़ी जिम्मेदारी हत्यारों के समाज और उनके मजहब के लोगों की बनती है कि वे इन हत्यारों का बायकाट करें, इन्हें सजा दिलाने में क़ानून की मदद करें। इस मामले में नूपुर शर्मा के समर्थकों का भी दायित्व बनता है कि वे इस वारदात को सियासी हथियार बनाकर सत्ता के खिलाफ मोर्चा न खोलें। लेकिन मोर्चा खुलेगा,बल्कि खुल ही गया है। लोग मोर्चे पर तैनात भी कर दिए गए हैं। गनीमत है कि राजस्थान की पुलिस ने आनन-फानन में आरोपियों की गिरफ्तारी कर ली ,अन्यथा गजब हो जाता, सरकार के खिलाफ गजब करने  की वजह सबको चाहिए। 

    बर्बरता जमीन देखकर काम नहीं करती ,लेकिन जब समाज में वैमनष्य बढ़ाना हो तो वो कहीं भी अपना रौद्र रूप दिखा सकती है। जो वारदात उदयपुर में हुई वो देश के किसी भी हिस्से में होती तो भी उतनी ही निंदनीय होती जितनी आज है। वारदात दो सिरफिरों ने की लेकिन उसका इस्तेमाल लोग अपने-अपने ढंग से कर रहे हैं। इसे भी रोका जाना चाहिए। ये बर्बरता का दूसरा चेहरा है, ऐसे माहौल में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर काम करने की जरूरत है, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वारदात के बाद जितना कुछ किया वो ठीक है, वे यदि ऐसे मौके पर प्रधानमंत्री से अपील की मांग करते हैं तो मान लेना चाहिए कि उनके हिसाब से इसकी जरूरत है। अन्यथा वे सोनिया से अपील का आग्रह न करते। 

    दुर्भाग्य ये है कि हमारे पंत प्रधान जब बोलना होता है तब बोलते नहीं हैं ,और यदि बोलते भी हैं तो विदेश जाकर बोलते हैं। उन्हें स्वदेश में बोलने में ज्यादा रूचि नहीं है, बेचारे बोलें भी तो क्या बोलें ? नूपुर शर्मा जैसे बोल बचन करने वाले भी तो उनके अपने हैं। खैर पंत प्रधान बोलें या न बोलें लेकिन ऐसी वारदातों के बाद सबको बोलना चाहिए। वारदात की निंदा के साथ ही समाज में शांति बनाये रखना सबका दायित्व है ,ये काम अकेले कोई भी और कहीं की भी सरकार नहीं कर सकती, बर्बरता के खिलाफ जो जहाँ है ,वहां से बोले और बिना डरे हुए बोले, आज के माहौल में बोलना ही सबसे बड़ा उपचार है। दुर्भाग्य से लोगों ने बोलना बंद कर दिया है। जो लोग बोलते नहीं हैं वे अपने ढंग से प्रतिकार करना चाहते हैं। 

    समाज में बर्बरता के खिलाफ न सिर्फ एकजुट होना आवश्यक है बल्कि अनिवार्य भी है। एहतियात बस इतनी बरती जाये कि हम घटनास्थल को सियासत का तीर्थ न बनाएं। बर्बरता के शिकार हुए कन्हैया लाल कि मौत का सियासी इस्तेमाल न करें। अन्यथा कल को लोग कन्हैया लाल को हीरो बनाकर अपने धंधे में जुट जाएँ। कन्हैया लाल या उसके बेटे ने तो सोचा भी नहीं होगा कि नूपुर का समर्थन करने से उनकी जान चली जाएगी। उन्हें यदि इसका आभास  होता तो मुमकिन  है कि वे ऐहतियात बरतते, कन्हैया लाल एकदम निर्दोष व्यक्ति थे। उनके साथ जो हुआ ,वो अकल्पनीय,निंदनीय और पाशविक है। हमें इसी पाश्विकता से जूझना है, अपने आसपास जागरूक रहकर ऐसी प्रवृत्तियों को पनपने से रोकें ,तभी बात बनेगी। 

    देश का दुर्भाग्य है कि आजकल सोशल मीडिया पर परस्पर विरोधी विचारों के लोग एक -दुसरे के दुश्मन बनते जा रहे हैं, और तो और गली, मुहल्ले के निजी समूहों में भी प्रतिकार उग्र हो रहा है। निजी प्रेम दांव पर लगा है, लोग दुआ-सलाम करना तक भूल रहे हैं। अन्धेरा आँखों में ही नहीं बल्कि दिल में भी उतर रहा है। आप जिसके समर्थक हैं,बने रहें लेकिन अपने पड़ौसी के दुश्मन तो न बनें। सियासत यही दुश्मनी बढ़ा रही है, पहले ऐसा नहीं था।  सौजन्य अपनी जगह था और सियासत अपनी जगह, अब दोनों एक--दूसरे के खिलाफ खड़े हैं। 

    राकेश अचल (वरिष्ठ पत्रकार)

    Initiate News Agency (INA)

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