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    विशेष कालम: आनन्द पुरोहित की कलम से ...

    विशेष कालम: हमें इस देश और देश के संविधान के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए आखिर हम इस धरा पर श्वास ले रहे हैं और खुशकिस्मती के पीने का पानी भी मिल ही जाता है। भोजन भी मिलता है भले आपकी योग्यता और क्षमता के अनुसार न हो। आप मेहनत करें, टैक्स भरें और आपके टैक्स के पैसे सरकार वोट पाने के लिए मुफ्त की योजनाओं में उड़ाती रहे, आप तो बस बने रहिए मुख्य धारा में।

    आप आखिर कर भी क्या सकते हैं, स्कूल में आपको फीस देना है, किसी प्रकार की छात्रवृति नही है क्योंकि आपके बाप दादा पढ़े लिखे और समझदार थे, कोई शिक्षक था, कोई वैद्य था, कोई कर्मकांडी, कोई ज्योतिषी था।उन्होंने समाज और राष्ट्र निर्माण में महत्ती भूमिका इसी दिन के लिए तो निभाई थी। अंकों के खेल में उलझा तथाकथित स्वर्ण समाज सोशल मीडिया पर अंक प्रतिशत के साथ फोटो लगा रहा है लेकिन कुछ समय बाद या तो इन बच्चों को देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ेगा जहाँ उनके टेलेंट की कद्र होगी वहाँ जाएंगे या फिर किसी छोटी मोटी नौकरी में एक सेल्स मैन या क्लर्क बन गुजारा करेंगे। इसमें भी सरकारी नौकरी की सोचना पाप है क्योंकि हम न तो पेपर चुरा सकते हैं, न बड़े पैमाने पर नकलों की सेटिंग कर सकते हैं। पिछले कुछ सालों से सवर्ण समाज के प्रशासनिक अधिकारी बनना कम हुवे हैं ये परिणामों में देखा होगा।

    क्या बुद्धिमता का स्तर गिर गया है ?

    नहीं, ऐसा नहीं है। असल में हमें जीवन यापन करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है और दूसरी और ये विभिन्न प्रकार के माफिया, गेन्स्टर, पैसों के बल पर और ताकत के बल पर कब्जाए जनप्रतिनिधि पदों वाले लोग अपने बच्चों को ख्याति प्राप्त विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में और विदेशों में पढ़ा रहे हैं। यहाँ पब्लिक को उलझाए रखते हैं और पैसा कमाते हैं, उसी पैसों से अपने बच्चों को डिग्रियां दिलाते हैं और फिर अगली पीढ़ी आ जाती है राज करने को। जब तक हम कुटुम्ब कबीले से ऊपर उठकर समग्र राष्ट्र चिन्तन नहीं करेंगे ऐसा ही होता रहेगा और इससे भी बदतर समय आएगा।

    लेकिन ये चिन्तन करेगा कौन ? ये भी मध्यम वर्गीय परिवार के हिस्से ही आता है क्योंकि उच्च वर्ग को कोई फर्क नहीं पड़ता और निम्न वर्ग अपने जीवन का संघर्ष कर रहा है। यहाँ उच्च और निम्न का अर्थ आर्थिक स्थिति से है। जो व्यक्ति या संगठन निम्न वर्ग को उच्च बनाने के सपने दिखाकर आगे बढ़ता है उनके 5000 करोड़ के बंगले बन जाते हैं और भोली भाली जनता उनके नारे लगाकर अपने आप को गौरवान्वित महसूस करती है। 75 साल हो गए हम खुद अपनी सरकार चुन रहे हैं और कर क्या रहे हैं फ्री में टीवी, फ्री कम्प्यूटर, फ्री मोबाइल, फ्री स्कूटी ...

    ये क्या मजाक है, क्यों नहीं स्वावलम्बी बना रहे हैं ? क्यों मुफ्तखोर बना रहे हैं ? लेने वाले लेकर खुश और देने वाले देकर खुश। बस बात वही है कि भेड़ को सर्दी लगे तो कम्बल ओढा तो लेकिन कम्बल उसी की ऊन से बनी है ये उस भोली भेड़ को पता नहीं है। संविधान समानता के लिए बना है, देश के सभी नागरिक जाति, धर्म, रंग और लिंग के आधार पर समान है ऐसा लिखा हुआ है। लेकिन क्या ये सच है ?

    बड़े बड़े संस्थानों में आरक्षित सीटों पर प्रवेश पा चुके लड़के लड़कियां 4 या 5 साल के इंजीनियरिंग और मेडिकल के कोर्स कितने साल में पूरा करते हैं कभी जानकारी जुटाना। ऐसे बड़े संस्थान से ये कोर्स करवाने के लिए सरकार कितना खर्च करती है और तथाकथित उच्च वर्ग के बच्चों से कितना शुल्क लेती है और ये बैक पर बैक लगवाने वालों से क्या लेते हैं। बस ये आरक्षण का कुचक्र कभी इस देश को आगे नहीं बढ़ने देगा और देश से प्रतिभा पलायन जारी रहेगा। हम केवल चिन्तन कर सकते हैं करना तो हमारे हाथ में है नहीं, वो तो उन नेताओं के हाथ में है जिन्हें हम उनकी 3 महीने के लिए बजने वाली डुगडुगी, दारू, पैसे और मुफ्त की चीजों में वोट देकर अपना प्रतिनिधि बनाकर भेज देते हैं। संसद में और विधानसभा में मेज थपथपाकर अपना वेतन और भत्ता मजे से बढ़ा लेते हैं और जनता को मुफ्त में कुछ बाँट देते हैं। लम्बे समय के लिए कोई योजना है भी नहीं क्योंकि जब स्कूल के फॉर्म में जाति पूछी जाती है और उसके आधार पर वजीफा मिलता है तो फिर समानता तो ढकोसला ही रहा ना। ये आरक्षण का दीमक देश को चाट रहा है और हम मूकदर्शक हैं।

    क्योंकि  , भारत भाग्य विधाता

    आनन्द पुरोहित

    नागौर

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